आंग्ल सिख युद्ध

आंग्ल सिख युद्ध – रणजीत सिंह, बन्दा बहादुर, अमृतसर की संधि ⚔️

आंग्ल सिख युद्ध – दोस्तों, आज हम आंग्ल सिख युद्ध के बारे में जानेंगे और जैसे की हमने आंग्ल मैसूर वाले आर्टिकल में जाना की कैसे अंग्रेजी कंपनी के द्वारा मैसूर साम्राज्य को खत्म करके अपनी राजनीतिक सत्ता बना ली जाती है।  

इसी क्रम में अपनी अपेक्षाओं के अनुसार अंग्रेज सिख साम्राज्य की तरफ भी अपना रुख करते हैं। 

आज हम इसी के बारे में जानेंगे की कैसे सिखों और अंग्रेजों के बीच युद्ध की स्थिति बनी और उन युद्धों से क्या प्रभाव पड़ा था। 

अंग्रेजी कंपनी और सिखों के बीच 2 आंग्ल सिख युद्ध हुए थे, परंतु उन 2 आंग्ल सिख युद्धों को जानने से पहले हमें उनसे पहले की परिस्थितियों को जानना पड़ेगा, तो चलिए दोस्तों, इन युद्धों से पहले क्या पृष्टभूमि थी पहले वो जानते हैं। 

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आंग्ल सिख युद्ध की पृष्ठभूमि ( Background of Anglo Sikh War )

दोस्तों, जैसे की हम जानते हैं जब भारत में धार्मिक सुधार आंदोलन का दौर चल रहा था तब भारत के केंद्र में मुगल शासकों का शासन चल रहा था और इसी धार्मिक सुधार आंदोलनों के क्रम में सिख धर्म का भी उदय हुआ था। 

सिख धर्म के उदय की प्रक्रिया में कुल 10 सिख गुरु हुए जिन्होंने सिख धर्म को आगे बढ़ाने का कार्य किया था, परंतु बीच-बीच में इन सिख गुरुओं व सिख समुदाय और मुगलों के बीच संघर्ष भी होता रहता था। 

इन्हीं संघर्षों में सिखों के पांचवे गुरु अर्जुन देव को मुगल शासक जहाँगीर द्वारा फांसी की सजा दे दी गई थी और सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर को भी मुगल शासक औरंगज़ेब द्वारा मृत्यु दंड दे दिया गया था। 

मुगलों और सिखों के बीच संघर्ष बहुत समय तक चलता रहा था और औरंगज़ेब के समय तो यह संघर्ष बहुत ज्यादा बढ़ गया था और सिखो के आखरी और दसवें गुरु गोबिंद सिंह का संघर्ष भी औरंगज़ेब के रहा था। 

बाद में जब मुगल शासक औरंगज़ेब की 1707 में मृत्यु हो जाती है तब उसके एक वर्ष बाद 1708 में सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह की भी हत्या पठानों के द्वारा हो जाती है। 

बन्दा सिंह बहादुर ( 1708 – 1716 )

जब सिखों के अंतिम गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु हुई उससे पहले उन्होंने यह संदेश दे दिया था की उनके बाद अब से कोई सिख गुरु नहीं होगा अर्थात उनके बाद कोई सिख गुरु नहीं बनेगा। 

गुरु गोबिंद सिंह का एक शिष्य था, जो उन्हें बहुत ही प्रिय था, वह शिष्य आगे चलकर बन्दा सिंह बहादुर के नाम से प्रख्यात हुआ था और क्योंकि गुरु गोबिंद सिंह ने यह संदेश दे दिया था की उनके बाद कोई सिख गुरु नहीं बनेगा इसलिए बन्दा सिंह बहादुर सिखों के एक सेनापति बनकर सामने आए थे। 

बन्दा सिंह बहादुर का प्रारंभिक नाम लक्ष्मण देव था और इसके साथ-साथ वे जम्मू-कश्मीर के क्षेत्र से संबंध रखते थे। 

इनका नाम बन्दा सिंह बहादुर इसलिए पड़ा क्यूंकि गुरु गोबिंद सिंह इन्हें गुरु बख्श सिंह के नाम से पुकारा करते थे, इसके साथ-साथ बन्दा सिंह बहादुर भी अपने आप को गुरु के बन्दे की संज्ञा देते थे इसलिए उनका नाम बन्दा सिंह बहादुर पड़ गया था। 

जैसे की हम चर्चा कर रहे थे की मुगलों और सिखों के बीच संघर्ष चलता रहता था और गुरु गोबिंद सिंह के बाद बन्दा सिंह बहादुर ने सिख धर्म को सुरक्षित रखने की कमान संभाली थी। 

इसी क्रम में उन्होंने अपने प्रारंभिक काल के दौरान मुगलों से युद्ध लड़े जिनमें उन्होंने मुगल सूबेदारों को धूल भी चटाई थी। 

समय के साथ साथ बन्दा सिंह बहादुर सिख धर्म को बचाने का प्रयास मुगलों के विरुद्ध करते रहते हैं और उस समय औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उत्तर मुगल काल भी शुरू हो चुका था। 

तब 1716 में उस समय के मुगल शासक फर्रुखसियर द्वारा बन्दा सिंह बहादुर को मृत्युदंड दे दिया गया था। 

रणजीत सिंह 

जब 1716 में बन्दा सिंह बहादुर की मृत्यु हुई, उसके बाद सिख समुदाय विखंडित होने की स्थिति में आ जाता है, परंतु बाद में जब 1761 में अहमद शाह दुर्रानी और मराठा के बीच तृतीय पानीपत का युद्ध हुआ था, उस युद्ध में मराठाओं की पराजय हो जाती है। 

इस तृतीय पानीपत के युद्ध में जीत के बाद अहमद शाह दुर्रानी अपने क्षेत्रों की तरफ वापस चले जाते है और मराठा भी इस युद्ध के बाद टूटने की स्थिति में आ जाते हैं और क्यूंकि औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल सत्ता तो कमजोर हो ही रही थी, ऐसी स्थिति में सिखों को वापस ऊपर आने का अवसर प्राप्त हुआ था। 

इस क्रम में पंजाब क्षेत्र अलग-अलग मिसल में बंट जाता है, इन मिसल का तात्पर्य यह है की अपने अलग-अलग क्षेत्रों में शासन करना और इन मिसल की संख्या 12 थी यानी पूर्ण पंजाब का क्षेत्र 12 मिसल के हिसाब से 12 अलग-अलग क्षेत्रों में बंट गया था। 

इन 12 मिसल में दो प्रमुख मिसल थे जिनका नाम सुकेरचकिया मिसल और भंगी मिसल था, जिसमें भंगी मिसल 12 मिसल में सबसे बलवान मिसल था और इन भंगी मिसल के सिखों ने अपना क्षेत्रीय विस्तार अफगानिस्तान तक कर लिया था। 

इसके साथ-साथ जो सुकेरचकिया मिसल था, उस मिसल में रणजीत सिंह ने सुकेरचकिया मिसल की कमान संभाली और अपने आप को इतना मजबूत बनाया की धीरे-धीरे समय के साथ-साथ भंगी मिसल का प्रभाव कम होने लग गया और फिर पूर्ण पंजाब से लेकर अफगानिस्तान रणजीत सिंह के पास आ गया था। 

रणजीत सिंह का जन्म 1780 में हुआ था और उनके पिता का नाम महासिंह था, जब वे पूर्ण पंजाब से लेकर अफगानिस्तान तक के राजा बने तो उनके सामने कई चुनौतियां आई। 

ये चुनौतियां थी जैसे की अन्य 12 मिसल के सिखों में अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना और जैसे की हमने ईरान के अब्दाली द्वारा तृत्य पानीपत के युद्ध की भी चर्चा करी इसलिए ईरानी आक्रमणों का भी सामना करने की विभिन्न चुनौतियां रणजीत सिंह के सामने थी। 

बाद में एक घटना होती है जिसके फलस्वरूप सिख समुदाय व सिख धर्म और भी ज्यादा मजबूत हो जाता है, इस घटना में यह हुआ था की एक अफगानिस्तान क्षेत्र में जमन शाह नामक शासक था जिसके रणजीत सिंह के साथ संघर्ष होते रहते थे। 

इन्हीं संघर्षों के क्रम में रणजीत सिंह और जमन शाह के बीच एक संघर्ष में जमन शाह की 12 तोपें चिनाब नदी के अंदर डूब गई थी। 

रणजीत सिंह द्वारा इन 12 तोपों को चिनाब नदी से निकलवाया जाता है और रणजीत सिंह इन 12 तोपों को जमन शाह का लौटा देते हैं, रणजीत सिंह के इस कार्य को देख कर जमन शाह खुश हो जाते हैं और वे रणजीत सिंह को लाहौर क्षेत्र तक उनका क्षेत्रीय विस्तार करने की अनुमति प्रदान कर देते हैं। 

इस प्रकार रणजीत सिंह अपना क्षेत्रीय विस्तार लाहौर क्षेत्र तक कर लेते हैं। 

जब रणजीत सिंह ने अपना विस्तार लाहौर क्षेत्र तक करा तब उनकी दो राजधानी बनी थी, एक राजधानी अमृतसर थी जो उनकी धार्मिक राजधानी थी और दूसरी राजधानी लाहौर थी जो उनकी राजनीतिक राजधानी थी। 

अंग्रेजों की सिखों से संघर्ष की शुरुआत 

दोस्तों, जब रणजीत सिंह सिख साम्राज्य को सुदृढ़ और मजबूत बना रहे थे और अपना विस्तार कर रहे थे तब अंग्रेज भी भारत के दूसरे क्षेत्रों पर अपनी राजनीतिक सत्ता कायम कर रहे थे और कुछ क्षेत्रों में तो कर भी चुके थे जैसे की प्लासी और बक्सर की लड़ाई के द्वारा बंगाल का क्षेत्र और आंग्ल मैसूर युद्ध के द्वारा मैसूर का क्षेत्र। 

अब अंग्रेजों की नज़र सिख साम्राज्य पर भी थी। 

अमृतसर की संधि ( 1809 )

इस अमृतसर की संधि का तात्कालिक कारण भारत से बाहर फ्रांस और रूस के बीच 1807 में तिलसित की संधि का होना था। 

इस तिलसित की संधि के अनुसार रूस और फ्रांस दोनों मिलकर भारत पर जमीन मार्ग के जरिये आक्रमण करने वाले थे और क्यूंकि उस समय अंग्रेजों ने प्लासी की लड़ाई, बक्सर की लड़ाई और आंग्ल मैसूर जैसे युद्धों के द्वारा भारत के काफी बड़े क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था, तो वे रूस और फ्रांस के इस आक्रमण को लेकर चिंतित थे। 

तब अंग्रेजों ने अपनी विशेष नीतियां चलाई और 1807 में रणजीत सिंह को संधि का प्रस्ताव भेजा की अगर रणजीत सिंह पर कोई आक्रमण होता है तो अंग्रेज उनकी मदद करेंगे और अंग्रेजों पर कोई आक्रमण होता है तो रणजीत सिंह उनकी मदद करेंगे। 

इसके साथ-साथ सतलुज नदी के पश्चिमी क्षेत्रों पर रणजीत सिंह का शासन रहेगा और सतलुज नदी के पूर्वी क्षेत्रों पर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण रहेगा। 

रणजीत सिंह अंग्रेजों के इस संधि प्रस्ताव को स्वीकारने के लिए दो शर्ते रखते हैं, जो कुछ इस प्रकार है:

1.जब भी कभी अफगानों और सिखों में लड़ाई होती है तो अंग्रेज उसमे कोई दखलअंदाज़ी नहीं करेंगे। 
2.अंग्रेजों को सतलुज नदी का मालवा क्षेत्र का राजा रणजीत सिंह को ही मानना होगा। 
आंग्ल सिख युद्ध – Anglo Sikh War in Hindi

तब रणजीत सिंह की ये शर्तें अंग्रेज नहीं मानते है और दोनों पक्षों में यह संधि नहीं हो पाती है, इसके एक वर्ष बाद 1808 में रणजीत सिंह मालवा पर अधिकार करने की कोशिश करते हैं, जिसमे अंग्रेज उन्हें सफल नहीं होने देते हैं। 

तब 1809 में अंग्रेजों और रणजीत सिंह के बीच यह अमृतसर की संधि होती है। 

इस संधि में यह तय किया जाता है की सतलुज नदी के पश्चिमी क्षेत्रों पर रणजीत सिंह का शासन रहेगा और सतलुज नदी के पूर्वी क्षेत्रों पर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण रहेगा। 

इस संधि में चार्ल्स मैटकाफ ( Charles Metcalfe ) ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से नेतृत्व किया था। 

रणजीत सिंह के वंशज 

बाद में 1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु हो जाती है, रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनके जो वंशज आते हैं वे ज्यादा कुशल शासक के रूप में नहीं शासन कर पाते हैं और थोड़े-थोड़े समय के लिए ही शासन कर पाते हैं। 

रणजीत सिंह के बाद उनके वंशज कुछ इस प्रकार हैं:

1.खड़क सिंह 
2.नव निहाल सिंह 
3.चंद कौर 
4.शेर सिंह 
5.दिलीप सिंह 
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रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद मात्र 4 से 5 वर्ष के भीतर ही इतने सारे शासक आते-जाते रहते हैं। 

बाद में रणजीत सिंह के वंशजों में दिलीप सिंह 1843 में राजा बनकर आते हैं, परंतु जब वे शासक बनते हैं तब उनकी आयु बहुत ही कम होती है मात्र 5 वर्ष, जिसके कारण वे एक अल्पवयस्क शासक के रूप में राजा बनते हैं। 

दिलीप सिंह की कम आयु की वजह से महारानी जिन्दल उनकी संरक्षिका के रूप में उनकी शासन व्यवस्था संभालती है और इस प्रकार सिख साम्राज्य का शासन चलता रहता है। 

इन सभी घटनाओं के बीच अंग्रेजी गवर्नर लार्ड डलहौज़ी ( Lord Dalhousie ) अपनी हड़प नीति या व्यपगत का सिद्धान्त ( Doctrine Of Lapse ) के माध्यम से भारतीय रियासतों को हड़पने का कार्य कर रहे थे। 

इसी क्रम में सिखों और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच दो आंग्ल सिख युद्ध हुए, आइये जाने:

प्रथम आंग्ल सिख युद्ध ( 1845 – 1846 )

जैसे की हमने जाना की रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनके वंशज ज्यादा कुशल शासक के रूप में उभर कर नहीं आये थे और अंग्रेजों की नज़र तो भारत के हर क्षेत्र पर पहले से ही थी। 

इस क्रम में अंग्रेजों ने पहले ही भारत के दूसरे ज्यादातर क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसके बाद वे सिख साम्राज्य या लाहौर साम्राज्य क्यूंकि सिख सतलुज नदी के पश्चिम में लाहौर क्षेत्र पर ही शासन कर रहे थे, उस क्षेत्र पर भी अधिकार करना चाहते थे। 

उस समय अंग्रेजी गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ( Lord Hardinge ) थे और अंग्रेजी कंपनी ने 1845 में सतलुज नदी की सीमा रेखा पर बहुत संख्या में अंग्रेजी सिपाही को भेजना शुरू कर दिया था। 

सिख साम्राज्य या लाहौर साम्राज्य ऐसी स्थिति को देख रहे थे और वे इस बात से चिंतित थे की कहीं अंग्रेजी कंपनी उनके ऊपर आक्रमण न करदे। 

इस क्रम में कुछ सिख सिपाहियों ने सतलुज नदी को पार कर दिया और वे सतलुज नदी के पूर्वी भाग में आ गए थे और क्यूंकि हमने ऊपर जाना की 1809 में अमृतसर की संधि के हिसाब से सतलुज नदी का पश्चिमी क्षेत्र सिखों का और पूर्वी क्षेत्र अंग्रेजों का था। 

जिसके बाद अंग्रेजों ने इसे अमृतसर की संधि का उल्लंघन माना और इसके कारण सिखों और अंग्रेजी कंपनी के बीच प्रथम आंग्ल सिख युद्ध हुआ था। 

इस प्रथम आंग्ल सिख युद्ध में सिखों की तरफ से लगभग 50000 सैनिकों ने भाग लिया था और अंग्रेजों की तरफ से लगभग 20000 से 30000 सैनिकों ने भाग लिया था। 

इस युद्ध में सिखों की सेना का नेतृत्व लाल सिंह और तेजा सिंह कर रहे थे। 

ये दोनों सिख सेनापति ज्यादा सक्षम नहीं थे और इसके साथ-साथ इन दोनों सिख सेनापतियों ने अंग्रेजों के साथ हाथ मिला लिया था। 

इन कारणों की वजह से अंग्रेजों को इस युद्ध में विजय प्राप्त हुई और सिखों को हार का सामना करना पड़ा था। 

लाहौर की संधि ( 1846 ) 

अंग्रेजों की विजय के साथ जब इस प्रथम आंग्ल सिख युद्ध का अंत हुआ तब 1846 में सिखों और अंग्रेजों के बीच लाहौर की संधि हुई थी। 

इस संधि की शर्तें कुछ इस प्रकार हैं:

1.अंग्रेजों ने दिलीप सिंह को ही राजा बनाए रखा। 
2.अंग्रेजों ने महारानी जिन्दल जो दिलीप सिंह की संरक्षिका थी उनको भी उसी पद पर बनाए रखा अर्थात जो राजनीतिक स्थिति पहले थी, इस संधि के बाद उसे अंग्रेजों के द्वारा नहीं बदला गया था। 
3.सिखों को अपनी सेना की संख्या को कम करने और उसके बदले कुछ अंग्रेजी सैनिक रखने को कहा गया था। 
4.सिख साम्राज्य में ब्रिटिश प्रतिनिधि के रूप में हेनरी लॉरेंस को भेजा गया था। 
5.अंग्रेजों ने युद्ध की क्षतिपूर्ति के लिए 1 करोड़ से ज्यादा की राशि की मांग सिख साम्राज्य से की थी, सिख साम्राज्य अंग्रेजों को इतने सारे पैसे नहीं दे पाए इसलिए अंग्रेजों ने सिख साम्राज्य के जम्मू-कश्मीर वाले भाग को गुलाब सिंह को बेच दिया और इसके बदले में गुलाब सिंह ने अंग्रेजों को 75 लाख की राशि दी थी। 
6.ब्यास नदी और सतलुज नदी के मध्य जालंधर दोआब का क्षेत्र अंग्रेजों ने अपने अधिकार में ले लिया था। 
आंग्ल सिख युद्ध – Anglo Sikh War in Hindi

भैरोवाल की संधि ( 1846 )

बाद में इस लाहौर की अपमानजनक संधि के बाद सिख काफी नाखुश थे और उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। 

अंग्रेजों ने सिखों के इस विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया था, जिसके बाद अंग्रेजों और सिखों के बीच एक और संधि हुई और ये संधि भी सिखों के लिए बहुत अपमानजनक संधि थी, इस संधि की शर्ते कुछ इस प्रकार हैं:

1.अंग्रेजों के हिसाब से क्योंकि महारानी जिन्दल दिलीप सिंह की संरक्षिका थी और उनके रहते ही ये सिख विद्रोह हुआ, इसलिए अंग्रेजों ने महारानी जिन्दल को संरक्षिका के पद से हटा दिया था और उनकी एक पेंशन निर्धारित करके उन्हें बनारस भेज दिया गया था। 
2.अब किसी न किसी को तो दिलीप सिंह का संरक्षक बनाना था इसलिए अंग्रेजों ने ब्रिटिश प्रतिनिधि हेनरी लॉरेंस के अंतर्गत एक परिषद का गठन किया जिसमें 8 सिख सरदार को हेनरी लॉरेंस के नीचे नियुक्त किया गया था और कहा गया की ये परिषद दिलीप सिंह के संरक्षक के रूप में कार्य करेगी। 
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इस प्रकार एक तरह से ब्रिटिश प्रतिनिधि हेनरी लॉरेंस ही पंजाब की शासन व्यवस्था चला रहे थे। 

द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध ( 1848 – 1849 )

प्रथम आंग्ल सिख युद्ध के बाद हुई दो बहुत ही अपमानजनक संधियों के बाद सिख काफी नाखुश थे और इसी क्रम में 1848 के समय अंग्रेजो के नियंत्रण में मुल्तान क्षेत्र के गवर्नर दीवान मुलराज थे। 

ब्रिटिश प्रतिनिधि हेनरी लॉरेंस ने दीवान मुलराज से ज्यादा और बढे हुए राजस्व को माँगा, परंतु दीवान मुलराज ने बढे हुए राजस्व को देने से इंकार कर दिया और ब्रिटिश प्रतिनिधि हेनरी लॉरेंस के विरुद्ध लड़ने की तैयारी कर ली थी। 

ब्रिटिश प्रतिनिधि हेनरी लॉरेंस और अंग्रेजों ने मुल्तान से दीवान मुलराज को हटाकर नए सिख गवर्नर को नियुक्त करने का फैसला लिया क्यूंकि दीवान मुलराज उनकी बात नहीं मान रहा था। 

मुल्तान की प्रजा ने अंग्रेजों के इस फैसले को नहीं माना और वहां की प्रजा दीवान मुलराज के साथ खड़ी हो गयी और उसका सहयोग करने लग गयी थी। 

इस क्रम में अंग्रेजों ने मुल्तान में एक नए सिख गवर्नर को दो ब्रिटिश अफसरों के साथ भेजा जिनका नाम लेफ्टिनेंट पैट्रिक वैन्स ऐगन्यू ( Lt. Patrick Vans Agnew ) और लेफ्टिनेंट एंडरसन ( Lt. Anderson ) था। 

मुल्तान की प्रजा द्वारा इन दोनों ब्रिटिश अफसरों को जान से मार दिया जाता है और इसके साथ साथ कुछ सिख सिपाही भी दीवान मुलराज के साथ जुड़ जाते हैं और अंग्रेजों के विरुद्ध फिर से एक विद्रोह छिड़ जाता है। 

लार्ड डलहौज़ी ( Lord Dalhousie ) उस समय भारत में ब्रिटिश गवर्नर जनरल के पद पर थे और उन्होंने इस सिख विद्रोह के आधार पर अपनी सेना युद्ध करने के लिए भेज दी। 

इस प्रकार सिखों और अंग्रेजों के बीच द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध हो गया था, इस द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध के अंतर्गत कुछ युद्ध हुए थे जो इस प्रकार है:

1.रामनगर का युद्ध 
2.चिलियाँवाला का युद्ध
3.गुजरात का युद्ध 
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दोस्तों, यह जो गुजरात का युद्ध हुआ था, इसमें वर्तमान के गुजरात की बात नहीं की जा रही, यह गुजरात उस समय पंजाब का एक क्षेत्र था, जो वर्तमान समय में पाकिस्तान के अंतर्गत आता है। 

इस द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध में भी अंग्रेजों को विजय प्राप्त हुई थी और सिख सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा था। 

इस युद्ध के बाद पूर्ण पंजाब को अंग्रेजों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में मिला लिया गया था और पंजाब की शासन व्यवस्था संभालने के लिए तीन सदस्यीय बोर्ड का गठन किया गया। 

बाद में 1853 में इस तीन सदस्यीय बोर्ड को समाप्त भी कर दिया गया था जिसके बदले एक चीफ कमिश्नर ( Chief Commissioner ) की नियुक्ति करी गई थी। 

पंजाब के प्रथम चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस ( John Lawrence ) बने थे और ये ब्रिटिश प्रतिनिधि हेनरी लॉरेंस के भाई थे। 

इस द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध के बाद दिलीप सिंह को भी अंग्रेजों द्वारा 50000 की पेंशन के साथ ब्रिटेन में पढाई के लिए भेज दिया गया था।  

दोस्तों, इसके साथ-साथ रणजीत सिंह के पास जो कोहिनूर हीरा था और उनके बाद उनके वंशजों के पास यानी दिलीप सिंह के पास यह हीरा आया था, इस द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध के बाद अंग्रेजों ने यह कोहिनूर हीरा अपने अधिकार में ले लिया था।  

इसके बाद अंग्रेजों द्वारा यह कोहिनूर हीरा ब्रिटेन भेज दिया गया और उस समय महारानी विक्टोरिया के ताज में यह हीरा लगवा दिया गया था और महारानी विक्टोरिया के बाद उनके बाद की महारानियों के पास यह कोहिनूर हीरा रहा था। 

समय के साथ-साथ इस कोहिनूर हीरे को काट-काट कर इसको और अच्छा रूप दिया गया और जहां पहले इस हीरे का वज़न लगभग 38 ग्राम का था, अब यह हीरा लगभग 21 ग्राम का हो गया है और वर्तमान समय में जवैल हाउस, टॉवर ऑफ़ लंदन में इस कोहिनूर हीरे को रखा गया है। 

अगर हम यह बात करें की रणजीत सिंह के पास यह कोहिनूर हीरा कहां से आया था तो इसके लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा, 1739 में जब नादिर शाह के द्वारा भारत पर आक्रमण करके मुगलों से यह कोहिनूर हीरा लूट कर वापस ईरान ले जाया गया था, तब उसकी मृत्यु के बाद उसके वंशजों में उत्तराधिकार बनने के लिए संघर्ष शुरू हुआ था। 

तब उसके किसी उत्तराधिकार ने अपनी सहायता के लिए यह हीरा 1751 में अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह दुर्रानी को दे दिया था और अहमद शाह दुर्रानी की मृत्यु के बाद उसके पोते शुजा शाह दुर्रानी ने यह हीरा 1813 में रणजीत सिंह को दे दिया था और रणजीत सिंह के बाद यह कोहिनूर हीरा अंग्रेजों के पास कैसे चले गया इसके बारे में हमने अभी ऊपर चर्चा की थी। 

इस प्रकार सिख साम्राज्य भी अंग्रेजों के अधिकार के अंतर्गत आ गया था। 

आंग्ल सिख युद्ध – Anglo Sikh War in Hindi

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई आंग्ल सिख युद्ध ( Anglo Sikh War in Hindi ) के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।

बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रथम आंग्ल सिख युद्ध कब लड़ा गया था?

प्रथम आंग्ल सिख युद्ध 1845-1846 में हुआ था।

द्वितीय सिख युद्ध कब हुआ था?

द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध 1848 -1849 में हुआ था।

प्रथम आंग्ल सिख युद्ध के समय पंजाब का शासक कौन था?

दिलीप सिंह 1843 में राजा बनकर आते हैं, परंतु जब वे शासक बनते हैं तब उनकी आयु बहुत ही कम होती है मात्र 5 वर्ष, जिसके कारण वे एक अल्पवयस्क शासक के रूप में राजा बनते हैं। दिलीप सिंह की कम आयु की वजह से महारानी जिन्दल उनकी संरक्षिका के रूप में उनकी शासन व्यवस्था संभालती है। 

लाहौर की संधि कब हुई थी?

अंग्रेजों की विजय के साथ जब इस प्रथम आंग्ल सिख युद्ध का अंत हुआ तब 1846 में सिखों और अंग्रेजों के बीच लाहौर की संधि हुई थी। 

रणजीत सिंह के समय पंजाब में कितने मिसल थे?

इस क्रम में पंजाब क्षेत्र अलग-अलग मिसल में बंट जाता है, इन मिसल का तात्पर्य यह है की अपने अलग-अलग क्षेत्रों में शासन करना और इन मिसल की संख्या 12 थी यानी पूर्ण पंजाब का क्षेत्र 12 मिसल के हिसाब से 12 अलग-अलग क्षेत्रों में बंट गया था। 

प्रथम आंग्ल सिख युद्ध के समय भारत का गवर्नर जनरल कौन था?

उस समय अंग्रेजी गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ( Lord Hardinge ) थे और अंग्रेजी कंपनी ने 1845 में सतलुज नदी की सीमा रेखा पर बहुत संख्या में अंग्रेजी सिपाही को भेजना शुरू कर दिया था। 

द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध के समय गवर्नर जनरल कौन था?

लार्ड डलहौज़ी ( Lord Dalhousie ) उस समय भारत में ब्रिटिश गवर्नर जनरल के पद पर थे और उन्होंने इस सिख विद्रोह के आधार पर अपनी सेना युद्ध करने के लिए भेज दी। 

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