कर्नाटक युद्ध

कर्नाटक युद्ध – Carnatic War in Hindi ⚔️

कर्नाटक युद्ध – दोस्तों, हमने पिछले आर्टिकल में जाना था की कैसे और किन-किन परिस्थितियों में बहुत सारी यूरोपीय कंपनियां भारत में व्यापार की दृष्टि से आती हैं। 

इनमें मुख्यतः पुर्तगाल, डच, ब्रिटेन और फ्रांस की कंपनियों के बारे में हमने चर्चा की थी।

हमने जाना था की जब फ्रांसीसी कंपनी भारत में व्यापार की दृष्टि से आती है, तब वे भी अंग्रेजी कंपनी की तरह भारत में अलग-अलग क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने की रणनीति बनाने लगे और भारत के राजनीतिक एवं आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने लग गए थे। 

इन्हीं सब के कारण से अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी कंपनी के बीच मतभेद उत्पन्न होना शुरू हो गए और ये मतभेद इतने बढ़ गए की युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। 

इसी क्रम में अंग्रेजी और फ्रांसीसी कंपनी के बीच तीन युद्ध हुए, जिन्हें “कर्नाटक युद्ध” के नाम से संबोधित किया जाता है, आज हम इस विषय के बारे में जानेंगे। 

कर्नाटक युद्धकर्नाटक युद्ध का समयकाल
प्रथम 1746-1748
द्वितीय 1749-1754
तृतीय 1756-1763
Carnatic War in Hindi
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प्रथम कर्नाटक युद्ध ( 1746-1748 )

अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी कंपनी के बीच प्रथम कर्नाटक युद्ध दो वर्षों के लिए हुआ था, जो 1746-1748 के बीच हुआ था। 

प्रथम कर्नाटक युद्ध के कारण 

इस युद्ध का कारण कोई भारत में उत्पन्न स्थिति नहीं थी बल्कि भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर यूरोप में ही कुछ ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो गई जिनका प्रभाव भारत में आई अंग्रेजी और फ्रांसीसी कंपनी पर भी पड़ा और इन दोनों के बीच प्रथम कर्नाटक युद्ध हुआ था। 

ऑस्ट्रिया, जो यूरोपीय क्षेत्र के अंतर्गत एक देश था, जहां पर उत्तराधिकार बनने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस के बीच वहां संघर्ष चल रहा था और इसी संघर्ष के चलते भारत में भी इन दोनों देशों के बीच युद्ध हो गया था। 

प्रथम कर्नाटक युद्ध की संधि 

इस युद्ध का समापन “ऐ-ला शापेल” की संधि के द्वारा हुआ था और यह संधि ब्रिटेन और फ्रांस के बीच यूरोप में हुई थी क्यूंकि जैसा की हमने ऊपर जाना की यह युद्ध यूरोप में चल रही स्थितियों के प्रभाव से भारत में हुआ था इसलिए संधि यूरोप में हुई थी। 

यह संधि 1748 में हुई थी। 

प्रथम कर्नाटक युद्ध से जुड़े कुछ बिंदु 

जिस समय यह युद्ध चल रहा था उस समय में फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले थे, और उस ही समय मॉरिशस क्षेत्र के फ्रेंच गवर्नर भी थे जिनका नाम ला बौर्डोनैसो ( La Bourdonnais ) था। 

डूप्ले ने ला बौर्डोनैसो की मदद ली और दोनों ने मिलकर ब्रिटेन पर दबाव बनाने की कोशिश की और इसी क्रम में उन्होंने मद्रास क्षेत्र को ब्रिटेन से ले लिया था और इसके साथ साथ एक सेंट थॉम ( St. Thome ) का युद्ध भी इसी समय हुआ था। 

इस सेंट थॉम युद्ध का कोई विशेष परिणाम नहीं आया और दोनों देशों ने एक दूसरे से छीने हुए क्षेत्र वापस कर दिए जैसे की मद्रास जिसे फ्रांस ने ब्रिटेन से ले लिया था, वह ब्रिटेन को वापस मिल गया और अमेरिका में जो क्षेत्र ब्रिटेन ने फ्रांस से ले लिया था, वह फ्रांस को वापस मिल गया था। 

द्वितीय कर्नाटक युद्ध ( 1749-1754 )

अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी कंपनी के बीच द्वितीय कर्नाटक युद्ध पाँच वर्षों के लिए हुआ था, जो 1749-1754 के बीच हुआ था। 

द्वितीय कर्नाटक युद्ध के कारण 

दोस्तों, जब भी किसी राजा की मृत्यु होती है उससे पहले वह अपना उत्तराधिकार चुन लेता और कभी-कभी राजा की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार बनने के लिए उसके पुत्रों या रिश्तेदारों में संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। 

ऐसी ही कुछ स्थिति भारत के हैदराबाद और कर्नाटक में उस समय बन गई थी जब अंग्रेजी और फ्रांसीसी कंपनी भारत में अपना विस्तार कर रही थी। 

हैदराबाद और कर्नाटक इन दोनों क्षेत्रों में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष शुरू हुआ और अंग्रेजी और फ्रांसीसी कंपनी ने अपने-अपने हितों को देखते हुए अलग-अलग पक्ष का समर्थन दिया और फिर दोनों पक्षों के बीच युद्ध हो गया था। 

द्वितीय कर्नाटक युद्ध की संधि 

जैसे की हमने जाना की यह युद्ध भारत में उत्पन्न हुई स्थितयों के कारण हुआ था इसलिए फ्रांस और ब्रिटेन के बीच इस युद्ध की संधि फ्रांस के कब्ज़े वाले क्षेत्र पांडिचेरी में हुई थी और तब यह युद्ध समाप्त हुआ था। 

यह संधि 1755 में हुई थी। 

द्वितीय कर्नाटक युद्ध से जुड़े कुछ बिंदु 

इस दौरान अम्बूर का युद्ध सबसे महत्वपूर्ण युद्ध था जो दोनों अंग्रेजी और फ्रेंच गुटों के बीच हुआ था ताकि जिनको वे समर्थन दे रहे थे वे हैदराबाद और कर्नाटक की सत्ता हासिल कर सके, इस युद्ध का भी कोई विशेष परिणाम नहीं निकला था।  

तृतीय कर्नाटक युद्ध ( 1756-1763 )

अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी कंपनी के बीच तृतीय कर्नाटक युद्ध सात वर्षों के लिए हुआ था, जो 1756-1763 के बीच हुआ था।

तृतीय कर्नाटक युद्ध के कारण 

दोस्तों, इस युद्ध का कारण भी प्रथम कर्नाटक युद्ध की तरह कोई भारत में उत्पन्न स्थिति नहीं थी, जैसे की हमने ऊपर जाना की प्रथम कर्नाटक युद्ध का कारण यूरोप के एक देश ऑस्ट्रिया में उत्तराधिकार को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच संघर्ष था। 

इसी ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच जो स्थिति थी वह अभी भी शांत नहीं हुई थी और कुछ बिंदुओं को लेकर अभी भी दोनों देशों के बीच संघर्ष चल ही रहा था। 

इसी क्रम में दोनों देशों के बीच यूरोप में “सप्तवर्षीय युद्ध” हुआ था और इस युद्ध का प्रभाव भी भारत में आई इन दोनों देशों की कंपनियों पर पड़ा और भारत में भी इन दोनों देशों की कंपनियों के बीच युद्ध हो गया था। 

तृतीय कर्नाटक युद्ध की संधि 

यह संधि भी प्रथम कर्नाटक युद्ध की तरह भारत से बाहर ही हुई थी क्यूंकि यह युद्ध भी यूरोप की स्थितियों के प्रभाव से ही भारत में लड़ा जा रहा था। 

ब्रिटेन और फ्रांस के बीच यह संधि फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुई थी। 

यह संधि 1763 को हुई थी। 

तृतीय कर्नाटक युद्ध से जुड़े कुछ बिंदु 

इसके दौरान सबसे महत्वपूर्ण युद्ध “वांडीवाश का युद्ध” हुआ था, जो की ब्रिटेन और फ्रांस के बीच 1760 में हुआ था, यह एक ऐसा युद्ध था जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजों को इस युद्ध में विजय प्राप्त हुई थी। 

इस युद्ध के परिणाम के बाद भारत से फ्रांस का वर्चस्व खत्म हो गया था और यह भी तय हो गया था की अब अंग्रेजी कंपनी ही भारत में पूर्णतः अपनी प्रधानता बनाएगी और फ्रांसीसी बहुत थोड़े ही क्षेत्रों में सिमट कर रह गए थे जैसे पांडिचेरी, माहे, कारिकल आदि। 

इस वांडीवाश के युद्ध में फ्रांस की तरफ से कॉम्टे डी लैली ( Comte de Lally ) नेतृत्व कर रहे थे और अंग्रेजों की तरफ से सर आयर कूट ( Sir Eyre Coote ) नेतृत्व कर रहे थे। 


यह भी पढ़े: भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन

बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक के कितने युद्ध हुए?

अंग्रेजी और फ्रांसीसी कंपनी के बीच तीन युद्ध हुए, जिन्हें “कर्नाटक युद्ध” के नाम से संबोधित किया जाता है

कर्नाटक युद्ध के समय फ्रांसीसी गवर्नर जनरल कौन था?

जिस समय यह युद्ध चल रहा था उस समय में फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले थे

कर्नाटक के प्रथम युद्ध के क्या कारण थे?

इस युद्ध का कारण कोई भारत में उत्पन्न स्थिति नहीं थी बल्कि भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर यूरोप में ही कुछ ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो गई जिनका प्रभाव भारत में आई अंग्रेजी और फ्रांसीसी कंपनी पर भी पड़ा और इन दोनों के बीच प्रथम कर्नाटक युद्ध हुआ था। 

ऑस्ट्रिया, जो यूरोपीय क्षेत्र के अंतर्गत एक देश था, जहां पर उत्तराधिकार बनने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस के बीच वहां संघर्ष चल रहा था और इसी संघर्ष के चलते भारत में भी इन दोनों देशों के बीच युद्ध हो गया था। 

कर्नाटक युद्ध क्यों हुआ था?

हमने जाना था की जब फ्रांसीसी कंपनी भारत में व्यापार की दृष्टि से आती है, तब वे भी अंग्रेजी कंपनी की तरह भारत में अलग-अलग क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने की रणनीति बनाने लगे और भारत के राजनीतिक एवं आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने लग गए थे।

इन्हीं सब के कारण से अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी कंपनी के बीच मतभेद उत्पन्न होना शुरू हो गए और ये मतभेद इतने बढ़ गए की युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। 

कर्नाटक के तीसरे युद्ध का प्रमुख कारण क्या था?

इसी ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच जो स्थिति थी वह अभी भी शांत नहीं हुई थी और कुछ बिंदुओं को लेकर अभी भी दोनों देशों के बीच संघर्ष चल ही रहा था। 

इसी क्रम में दोनों देशों के बीच यूरोप में “सप्तवर्षीय युद्ध” हुआ था और इस युद्ध का प्रभाव भी भारत में आई इन दोनों देशों की कंपनियों पर पड़ा और भारत में भी इन दोनों देशों की कंपनियों के बीच युद्ध हो गया था। 

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