बाबरनामा

बाबरनामा – बाबर के भारत के संबंध में विचार, कोहिनूर हीरा, आकलन

बाबरनामा – दोस्तों, आज हम बाबरनामा के संबंध में जानेंगे, हम इस विषय में यह जानेंगे की बाबर के भारत के संबंध में क्या विचार थे जो उसने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में लिखे थे, उसने कोहिनूर हीरे के बारे में बाबरनामा में क्या लिखा और उसने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में भारत आने के लिए क्या क्या लिखा था। 

हमने बाबर के इतिहास वाले आर्टिकल में जाना था की जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने 1526 में मुगल वंश की स्थापना भारत में की थी, उसका जीवन काल भी ज्यादा लम्बा नहीं था, वह केवल 47-48 वर्ष ही जीवित रहा था और भारत में उसने सिर्फ 4 वर्ष ही शासन किया। 

इन 4 वर्षों में भी उसका अधिकांश भाग युद्धों में लड़ते-लड़ते बीता और जो कुछ थोड़ा बहुत समय उसको भारत को जानने में मिला उसके संबंध में उसने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में लिखा था, इसके अलावा उसने अपने जीवन के लगभग 18 वर्षों के संबंध में जानकारी अपनी आत्मकथा बाबरनामा में दी है। 

बाबर की आत्मकथा बाबरनामा को “तुजुक-ऐ-बाबरी” के नाम से भी संबोधित किया जाता है और यह तुजुक-ऐ-बाबरी बाबर के द्वारा तुर्क भाषा में लिखी गई थी क्यूंकि यह भाषा बाबर की मात्र भाषा थी। 

बाबर द्वारा लिखी गई उसकी आत्मकथा को समय-समय पर दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद किया गया था और उसके बाद के मुगल शासकों ने बाबरनामा को 4 बार फ़ारसी में अनुवादित करवाया था। 

वह मुगल शासक जिनके द्वारा फ़ारसी भाषा में बाबर की लिखी हुई किताब बाबरनामा को अनुवादित करवाया गया वह कुछ इस प्रकार है:

मुगल शासकव्यक्ति जिनके द्वारा बाबरनामा को फ़ारसी में अनुवादित किया गया था 
हुमायूँजैना खां, पयंदा हसन 
अकबरअब्दुर्रहीम खान-ए-खाना 
शाहजहाँमीर अबु तलिब तुरबाती 
बाबरनामा – Baburnama in hindi

इन व्यक्तियों के द्वारा इन मुगल शासकों ने बाबरनामा को फ़ारसी भाषा में अनुवादित करवाया था और इस भाषा के अलावा भी समय-समय पर बाबरनामा को कई और भाषाओं में अनुवादित किया गया था जैसे बहुत सारी यूरोपीय भाषाएं, फ्रेंच और अंग्रेजी जैसी भाषाएं। 

अंग्रेजी भाषा में बाबरनामा को एनेट सुसानाह बेवरिज ( Annette Susannah Beveridge ) ने अनुवादित किया था और इन्हीं की अंग्रेजी में अनुवादित बाबरनामा सबसे लोकप्रिय और सटीक मानी जाती है। 

बाबरनामा ( Baburnama in Hindi )

बाबर द्वारा अपनी आत्मकथा बाबरनामा को कुछ इस प्रकार से शुरुआती रूप दिया गया है और उसने लिखा है की 899 के वर्ष में वह रमज़ान माह के दौरान वह 12 वर्ष की आयु में फरगना का शासक बना था। 

यह 899 का वर्ष इस्लाम के हिसाब से बाबर के द्वारा बताया गया है यानी इस्लाम के मुताबिक उस समय जो वर्ष चल रहा था बाबर उस वर्ष की बात बाबरनामा में कर रहा है। 

फरगना के संबंध में बात करे तो वर्तमान समय में यह स्थान उज़्बेकिस्तान ( Uzbekistan ) के अंतर्गत आता है और हमने बाबर के इतिहास वाले आर्टिकल में जाना था की बाबर का जन्म फरगना में ही हुआ था और उसके पिता उमर शेख मिर्ज़ा ही फरगना के शासक भी थे। 

बाबरनामा में बाबर के भारत के संबंध में बिंदु 

बाबर द्वारा अपनी आत्मकथा बाबरनामा में हिंदुस्तान को लेकर यह लिखा गया है की सिंधु नदी को पार करने के पर जो भी क्षेत्र आता है वह हिंदुस्तान है जैसे की पहाड़, पत्थर, पेड़, लोग और उनकी संस्कृति यह सब हिंदुस्तान है। 

इसके साथ बाबर ने हिंदुस्तान के संबंध में यह लिखा है की हिंदुस्तान एक बहुत बड़े क्षेत्रफल का देश है, वहां बहुत सारे लोग व कारीगर हैं, हिंदुस्तान की ज़मीन तीन तरफ से समुद्र से घिरी हुई है जैसे पूर्व, पश्चिम और दक्षिण। 

हमने बाबर के इतिहास वाले आर्टिकल में जाना था की 21 अप्रैल, 1526 में प्रथम पानीपत के युद्ध में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम लोदी को बाबर के द्वारा हराकर दिल्ली पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली गई थी। 

इसके संबंध में बाबर के द्वारा लिखा गया की जब उसने यह युद्ध जीता और भारत पर अपनी सत्ता को स्थापित करा था उस समय पर भारत में 5 मुस्लिम शासक शासन कर रहे थे और इन मुस्लिम शासकों को उसने बाबरनामा में पादशाह कहकर संबोधित किया है। 

इसके साथ ही साथ वह यह भी लिखता है की उस समय दो काफिरों ( इस्लाम को न मानने वाला ) का भी शासन भारत में चल रहा था। 

वह लिखता है की इन सारे शासकों के पास जो उस समय हिंदुस्तान पर शासन कर रहे थे उनके पास बहुत सारा क्षेत्र था, बड़ी-बड़ी सेनाएं उनके पास थीं और ये सारे शासक सम्मान करने लायक शासक थे। 

वह इन शासकों के संबंध में लिखता है जो कुछ इस प्रकार है:

1.दिल्ली पर अफगान शासकों का शासन चल रहा था जैसे की हमने पहले के आर्टिकल में भी जाना था की इब्राहिम लोदी अफगान शासक था और इसको ही बाबर ने हराकर भारत में सत्ता स्थापित करी थी। 
2.गुजरात के क्षेत्र में मुजफ्फर शाह की सत्ता थी, परंतु पानीपत के प्रथम युद्ध से कुछ समय पूर्व मुजफ्फर शाह की मृत्यु हो चुकी थी। 
3.मालवा क्षेत्र में मेहमूद खिलजी की सत्ता थी, यह क्षेत्र वर्तमान में मध्यप्रदेश के अंतर्गत आता है और इसके साथ मेवाड़ क्षेत्र में महाराणा सांगा की सत्ता थी, बाबर ने महाराणा सांगा को काफिर कहकर संबोधित किया है, उसने लिखा है की महाराणा सांगा ने अपनी योग्यता और शस्त्रों के दम पर अपने आप को बहुत ऊपर कर लिया था और मेहमूद खिलजी को पराजित कर दिया था। 

महाराणा सांगा और मेहमूद खिलजी के मध्य गागरोन का युद्ध हुआ था जिसमे महाराणा सांगा ने मेहमूद खिलजी को हराया था और वर्तमान में गागरोन स्थान झालावाड़, राजस्थान के अंतर्गत आता है। 

इस युद्ध के पश्चात् महाराणा सांगा के द्वारा मेहमूद खिलजी को बंदी भी बना लिया गया था और मालवा के बहुत सारे क्षेत्रों के ऊपर कब्ज़ा कर लिया था और बाद में उन्होंने मेहमूद खिलजी को रिहा कर दिया था। 

इस क्रम में महाराणा सांगा ने गागरोन स्थान में एक जल दुर्ग का निर्माण करवाया था जो आहु नदी और काली सिंध नदी के मध्य में स्थित है जहां पर उन्होंने अपने एक विश्वासी सूबेदार को रखा था जिसका नाम मेदनी राय था और इस मेदनी राय के बारे में बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था। 
4.बंगाल में नसरत शाह की सत्ता थी और इसके साथ-साथ बाबर ने बहमनी राज्य के संबंध में भी अपनी आत्मकथा बाबरनामा में लिखा था। 
बाबरनामा – Baburnama in hindi

इस प्रकार बाबर ने 5 मुस्लिम शासकों के बारे में लिखा था जो थे दिल्ली में अफगान शासक, गुजरात में मुजफ्फर शाह, मालवा क्षेत्र में मेहमूद खिलजी, बंगाल में नसरत शाह और बहमनी राज्य। 

हमने ऊपर जाना की बाबर ने इन 5 मुस्लिम शासकों के अलावा दो ऐसे शासकों के बारे में लिखा था जिन्हें उसने काफिर कहकर संबोधित किया था जो कुछ इस प्रकार हैं:

1.पहले शासक के संबंध में हमने ऊपर जाना की बाबर ने मेवाड़ में महाराणा सांगा की सत्ता के बारे में लिखा था और उन्होंने अपनी योग्यता और शस्त्रों के दम पर अपने आप को बहुत ऊपर कर लिया था और लगभग पूरे उत्तर भारत में अपना डंका बजवाया और उनकी सत्ता को ही उत्तर भारत की केंद्र सत्ता माना जा सकता था। 
2.दूसरा बाबर ने विजयनगर जो की दक्षिण भारत की तरफ था उस राज्य को काफिर शासकों की सत्ता वाला राज्य बताया है, विजयनगर को बाबर ने बीजानगर कहकर बाबरनामा में संबोधित किया है। 

दोस्तों, जब 1336 में दिल्ली में सल्तनत काल चल रहा था तब मुहम्मद बिन तुग़लक़ शासन कर रहे थे उनके समय ही 1336 में विजयनगर राज्य के हरिहर और बुक्का ने विजयनगर को स्वतंत्र राज्य के रूप में घोषित कर दिया था। 

इसके बाद बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में लिखा है की 1528 में उसने चंदेरी में युद्ध लड़ा और ऐसा तूफ़ान मचाया की अल्लाह की कृपा के कारण कुछ ही समय में चंदेरी में विजय प्राप्त कर ली थी, चंदेरी वर्तमान समय में मध्य प्रदेश के अंतर्गत आता है। 

उसने लिखा की मेदनी राय जो महाराणा सांगा का विश्वाशी था वह चंदेरी पर शासन कर रहा था और उस पर बाबर ने विजय हासिल कर ली थी और वहां के काफिरों को मृत्यु दे दी गई थी। 

बाबरनामा में बाबर का हिंदुस्तान के लोगों के ऊपर विचार 

बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में यह लिखा है की भारत के लोगों में कोई आकर्षण नहीं है, वहां के लोगों में सुंदरता की कमी है, वहां के लोग सुंदर नहीं होते हैं। 

वहां के लोग असभ्य हैं, उनमे कोई तेहज़ीब और बुद्धि नहीं है, इसके साथ-साथ वहां के लोगों में कोई योग्यता नहीं है, वहां के छोटे वर्ग के लोग यानी किसान आदि नग्न अवस्था में घुमते हैं। 

वह लिखता है की हिंदुस्तान में अच्छा भोजन भी नहीं है, अच्छे अंगूर नहीं हैं, खरबूजे नहीं हैं, हम्माम भी नहीं है यह गर्म पानी के स्नान के संबंध में होता है, ठंडा पानी और बर्फ नहीं है, न अच्छे घोड़े हैं, न ही अच्छे कुत्ते हैं और न ही अच्छे शिक्षण संस्थान हैं। 

इसके साथ-साथ वह लिखता है की हिंदुस्तान काफी बड़े क्षेत्रफल और आबादी वाला देश है और यहाँ अपार सोना और चांदी है और काफी धनाढ्य प्रदेश है हिंदुस्तान। 

वह लिखता है हिंदुस्तान में लोगों ने धन की गणना का उत्कृष्ट मॉडल अपनाया हुआ है जैसे 100000 इतनी राशि को हिंदुस्तान में 1 लाख कहा जाता है, 100 लाख को 1 करोड़, 100 करोड़ को 1 अरब, 100 अरब को 1 खरब, 100 खरब को 1 नील, 100 नील को 1 पद्म, 100 पद्म को 1 शंख। 

इस बिंदु के संबंध में वह लिखता है की हिंदुस्तान में इतनी बड़ी गणना के मॉडल यह बताते हैं की हिंदुस्तान में अपार धन है और हिंदुस्तान एक धनाढ्य प्रदेश है। 

इस बिंदु से हम यह समझ सकते है की यही सोना और चांदी और धन की लालसा में बाबर और उसके जैसे कितने ही बाहरी आक्रमणकारी भारत को लूटने और सत्ता की चाह में भारत आये थे। 

इसके साथ साथ उसने लिखा उसने पहली बार हाथी को देखा और लिखा की इस जीव के आगे एक सूंड होती है जिसे अगर काट दिया जाए तो वह जीवित नहीं रह सकता, मोर के बारे में लिखते हुए कहा की यह एक कमाल का पक्षी है, आम को हिंदुस्तान का सबसे अच्छा फल बताया, गैंडे के संबंध में बताया की ये जानवर 3 भैंसो के बराबर है। 

बाबरनामा में बाबर के भारत के ऊपर विचारों का हमारे द्वारा आकलन 

बाबर के द्वारा भारत के छोटे वर्गों यानी किसान आदि के बारे में लिखा गया की वे नग्न अवस्था में घूमते हैं और वह लिखता है की हिंदुस्तान में लोग शरीर के निचले हिस्से में एक कपडा बाँध कर रखते हैं, जिसे वे लंगोट कहते हैं। 

इसके संबंध में हमारा यह मत है की भारत में पुराने समय से ही लंगोट की परंपरा चली आ रही है और वर्तमान समय में भी गांवों में लंगोट को पहना जाता है। 

जबकि बाबर जिन क्षेत्रों से भारत आया था वे क्षेत्र बहुत गर्म प्रदेश थे जिससे की वहां के लोगों को अपना शरीर पूरा ढक के रखना पड़ता था शायद इसलिए बाबर को यहां का रहन-सहन अलग प्रतीत हुआ होगा। 

बाबर ने यह भी लिखा था की हिंदुस्तान में अच्छे शिक्षण संस्थान नहीं है, इसके संबंध में हमारा मत यह है की एक समय पर भारत का नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया के सबसे प्रमुख शिक्षण संस्थानों में से एक था।  

दुर्भाग्यवश जब प्राचीन इतिहास में भारत में तुर्क आक्रमण हुए थे उस समय बख्तियार खिलजी जिसे हम एक अज्ञानता से भरा एक मूर्ख की संज्ञा देना चाहेंगे, उसने पूरे नालंदा विश्वविद्यालय को जला कर राख कर दिया था। 

उस नालंदा विश्वविद्यालय में भारत के पूर्वजों का अपार ज्ञान का भण्डार था, और अगर यह घटना नहीं हुई होती तो इस ज्ञान के भंडार से कितना अपार ज्ञान आज वर्तमान समय में सबको मिल पाता। 

कहा जाता है की इस घटना में लाखों किताबें जल कर खाक हुई थी, जिस कारण बहुत लंबे समय तक उस आग के अंश जल रहे थे। 

बाबर ने यह भी लिखा था की हिंदुस्तान के लोग अयोग्य हैं, इसमें हमारा मत है की बाबर ने ही कहीं और लिखा था की जब आगरा में उसका निर्माण कार्य चल रहा था तब वहां प्रतिदिन 680 व्यक्ति काम करते थे और ये लोग भारत के ही हो सकते थे परंतु बाबर ने यह स्पष्ट नहीं किया की ये लोग भारत के ही थे। 

परंतु इस बिंदु के प्रमाण का अनुमान हम इस बात से लगा सकते हैं की जैसा की हमने ऊपर जाना की बाबर ने भारत में बहुत सारे कारीगरों की बात अपनी आत्मकथा में की थी और हिंदुस्तान में तब लोग ज्यादातर पीढ़ी दर पीढ़ी के हिसाब से कार्य करते थे जैसे कोई व्यक्ति एक कार्य करता है तो उसका बेटा भी वही कार्य करता है। 

उस समय तक हिंदुस्तान में जाति व्यवस्था यानी जन्म के आधार पर काम करने की व्यवस्था आ चुकी थी यानी अगर पिता कोई कार्य करता है तो उसके वंशज भी वही कार्य करते थे, परंतु यह व्यवस्था प्राचीन काल से भारत में नहीं थी। 

भारत में प्राचीन काल से जाति व्यवस्था नहीं बल्कि वर्ण व्यवस्था थी जिसमें एक व्यक्ति को उसके कार्य के हिसाब से एक वर्ण में रखा जाता था जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। 

जैसे किसी परिवार में चार पुत्र है और चारों अलग कार्य कर रहे हैं तो उन्हें अलग-अलग वर्णों में रखा जाता था जैसे एक पुत्र ज्ञान दे रहा है तो वह ब्राह्मण कहलाता था, इससे कोई मतलब नहीं था की वह पंडित हो या न हो, यही तो कर्म आधारित यानी वर्ण व्यवस्था थी। 

एक पुत्र शस्त्र चलाता था तो उसका वर्ण क्षत्रिय कहलाता था और एक पुत्र व्यापार करता था तो उसका वर्ण वैश्य कहलाता था और अगर एक पुत्र सफाई संबंधी कार्यों को करता था तो वह शूद्र वर्ण कहलाता था, तो इस प्रकार एक ही परिवार के चार पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-अपने कार्यों के हिसाब से कहला सकते थे और यही भारतीय व्यवस्था थी। 

परंतु समय के साथ साथ यह व्यवस्था जन्म आधारित यानी जाति व्यवस्था होती चली गई और बाबर द्वारा भी यह लिखा गया था की हिंदुस्तान में लोग जाति व्यवस्था के आधार पर कार्य करते हैं। 

इसके साथ साथ भारत के कारीगरों ने बहुत संरचनाओं का निर्माण किया था जैसे संस्कृत पाठशाला का निर्माण अजमेर के शासक बीसल देव चौहान के समय कराया गया और मेवाड़ के शासक महाराणा कुंभा के समय मेवाड़ में 32 दुर्गों का निर्माण करवाया गया था यह सारे प्रमाण बताते हैं की हिंदुस्तान के कारीगर योग्य एवं कुशल थे। 

बाबर के द्वारा भारत के बारे में इतने नकारात्मक बिंदु उसने भारत में अपने बहुत ही छोटे 4 वर्ष के शासनकाल के समय लिखे थे जिनमे उसने अधिकांश समय युद्ध लड़ने में ही बिताये, शायद इसी वजह से वह भारत को ज्यादा अच्छे से नहीं जान पाया होगा। 

पुर्तगाली व्यापारी भी भारत में उस समय तक व्यापार के लिए भारत में आ गए थे और बाबर ने अपनी आत्मकथा में उनके संबंध में नहीं लिखा, इसके साथ-साथ उसने भारत के प्रमुख स्थानों जैसे कश्मीर के संबंध में भी नहीं लिखा था, ऐसी ही बहुत सारे बिंदु बाबर ने भारत के संबंध में नहीं लिखे थे। 

शायद अगर वह अपना जीवन ज्यादा जीता और यदि उसका शासनकाल भारत में और ज्यादा समय तक रहता तो वह यहां के लोगों, स्थानों, संस्कृति को और अच्छे से जान पाता और तब उसके विचार भारत को लेकर अलग हो सकते थे। 

बाबरनामा में बाबर का भारत में बुलावे को लेकर बिंदु 

बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में यह लिखा है की उसको उस समय के मेवाड़ के शासक महाराणा सांगा ने भारत में आने का निमंत्रण दिया था। 

उसने लिखा था की महाराणा सांगा ने उस समय के दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम लोदी के विरुद्ध उससे मदद मांगी थी और अपना एक दूत उसके पास भेजा और भारत में आने का निमंत्रण दिया था और कहा की दिल्ली में बाबर का शासन रहेगा और महाराणा सांगा की सीमा आगरा क्षेत्र तक रहेगी। 

बाबर ने लिखा था की जब वह इब्राहिम लोदी से पानीपत का प्रथम युद्ध लड़ने के लिए गए तब न ही महाराणा सांगा के आने के संकेत दिखाई दिए और न ही जाने के संकेत दिखाई दिए और उसने महाराणा सांगा पर वचन न निभाने का आरोप लगाया था। 

एक इतिहासकार जिनका नाम प्रोफेसर रशब्रुक विलियम्स है उन्होंने भी अपनी किताब एन एम्पायर बिल्डर ऑफ़ सिक्सटीन्थ सेंचुरी ( An Empire Builder of the Sixteenth Century ) में यह लिखा है की महाराणा सांगा ने अपना बाबर को दिया हुआ वचन की वो बाबर का इब्राहिम लोदी के विरुद्ध साथ देंगे वह वचन उन्होंने नहीं निभाया था। 

परंतु महाराणा सांगा के जो उस समय के पुरोहित थे उन्होंने अपनी किताबों में इस संबंध में कुछ अलग जानकारी दी हुई है जो मेवाड़ का संक्षिप्त इतिहास है। 

उन पुरोहित की किताबों से यह जानकारी प्राप्त होती है की बाबर ने महाराणा सांगा से मदद मांगी थी इब्राहिम लोदी के विरुद्ध लड़ने के लिए। 

इस प्रकार बाबरनामा के हिसाब से महाराणा सांगा ने बाबर से मदद मांगी थी और मेवाड़ के पुरोहित की किताब के हिसाब से बाबर ने महाराणा सांगा से मदद मांगी थी। 

अगर हम इस बिंदु के निष्कर्ष में जाना चाहे की कौनसी बात सही है तो हम एक तीसरी किताब राजस्थान का इतिहास जो गोपीनाथ शर्मा द्वारा लिखी गई है उसकी सहायता ले सकते हैं। 

इस किताब में गोपीनाथ शर्मा ने बहुत सारे स्रोतों के संदर्भ में लिखा है की महाराणा सांगा ने 1517 में इब्राहिम लोदी को खातोली के युद्ध में पराजित किया था, यह खातोली स्थान वर्तमान में राजस्थान के कोटा के अंतर्गत आता है। 

इस किताब में गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है की इसके अगले वर्ष ही यानी 1518 में इब्राहिम लोदी और महाराणा सांगा के बीच एक और युद्ध हुआ जिसे बाड़ी के युद्ध से संबोधित किया जाता है और यह बाड़ी स्थान वर्तमान में राजस्थान की धोलपुर के अंतर्गत आता है। 

इस युद्ध में इब्राहिम लोदी ने महाराणा सांगा के विरुद्ध दो व्यक्तियों को भेजा था जिनका नाम मिया हुसैन और मिया माखन था और इस युद्ध में भी महाराणा सांगा को ही विजय प्राप्त हुई थी और इस युद्ध के संबंध में बाबरनामा में भी बाबर ने लिखा है की यह युद्ध महाराणा सांगा ने जीता था। 

कुछ फ़ारसी स्त्रोत यह कहते है की इस युद्ध में महाराणा सांगा की हार हुई थी परंतु ज्यादातर स्त्रोत इस युद्ध में महाराणा सांगा को ही विजय मानते हैं और बाबरनामा में भी यही बताया गया है की महाराणा सांगा ही इस युद्ध में विजयी थे। 

अब इस बिंदु को लेकर हमारा मत है की जब बाबर 1526 में इब्राहिम लोदी से पानीपत का युद्ध लड़ने आया, उससे काफी पहले ही जैसे की हमने अभी जाना की 1517 के खातोली के युद्ध और 1518 के बाड़ी के युद्ध में महाराणा सांगा ने इब्राहिम लोदी को हरा दिया था, तो फिर महाराणा सांगा को इब्राहिम लोदी के विरुद्ध बाबर से मदद मांगने की कोई जरूरत ही नहीं थी। 

दूसरी ओर महाराणा सांगा ने न केवल इब्राहिम लोदी को हराया था बल्कि अपने आसपास के क्षेत्रों के शासकों को भी पराजित किया था। 

इसके अलावा बाबर एक भारत से बाहर का व्यक्ति था और अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए बाहर के व्यक्ति को ही मदद की आवश्यकता होती है। 

इस प्रकार हम हमारे इस निष्कर्ष में पहुँचते हैं की बाबर ने महाराणा सांगा से इब्राहिम लोदी के विरुद्ध मदद मांगी थी और महाराणा सांगा ने उसकी मदद करने का प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया था परंतु फिर महाराणा सांगा द्वारा बाबर की मदद क्यों नहीं की गई थी। 

इसके संबंध में महाराणा सांगा के पुरोहितों की मेवाड़ का संक्षिप्त इतिहास में यह जानकारी दी गई है की जब महाराणा सांगा ने बाबर की मदद करने का प्रस्ताव स्वीकार किया तब उनके सामंतो ने उनको यह कहकर जाने से रोका की सांप को दूध पिलाने से कोई लाभ नहीं है। 

महाराणा सांगा ने अपने सामंतो की बातों को महत्व देते हुए बाबर की मदद नहीं की और अपने आप को मजबूत बनाने में वे जुट गए और जैसे की फिर बाबर ने 1526 में इब्राहिम लोदी को पानीपत के प्रथम युद्ध में हरा दिया था, तब यह स्थिति भी बन गई थी की अब बाबर और महाराणा सांगा के मध्य भी युद्ध होगा। 

प्रोफेसर रशब्रुक विलियम्स ने अपनी किताब एन एम्पायर बिल्डर ऑफ़ सिक्सटीन्थ सेंचुरी ( An Empire Builder of the Sixteenth Century ) में लिखा है की बाबर को इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खां ने भारत में आने का निमंत्रण दिया गया था और इब्राहिम लोदी के विरुद्ध मदद मांगी थी। 

इसके साथ साथ यह भी लिखा गया है की एक पंजाब के हाकिम जिनका नाम दौलत खां लोदी था उसने भी बाबर को भारत में आने का न्योता दिया था। 

बाबरनामा में बाबर के द्वारा कोहिनूर हीरे से संबंधित बिंदु 

कोहिनूर हीरे के संबंध में बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में लिखा तो है परंतु उसने उस हीरे को कोहिनूर हीरा नहीं कहा है, उस हीरे को कोहिनूर हीरे के नाम से पहचान बाद में मिलती है। 

कोहिनूर हीरे के संबंध में बाबर द्वारा बाबरनामा में शुरुआत कुछ इस प्रकार करी गई है जब उसने 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली पर अपनी सत्ता स्थापित करी थी। 

उसने लिखा की जब उसने इब्राहिम लोदी को पराजित किया तब इब्राहिम लोदी के साथ-साथ बिक्रमजीत जो ग्वालियर का राजा था, और वह हिन्दू है, उसे यमलोक ( नर्क ) में जगह मिली। 

इस बिंदु को लेकर बाबर ने बाबरनामा में यह कहना चाहा है की 1526 के प्रथम पानीपत के युद्ध में उसके विरोधी इब्राहिम लोदी का साथ ग्वालियर के राजा बिक्रमजीत ने दिया था और बिक्रमजीत की मृत्यु भी इस युद्ध में इब्राहिम लोदी के साथ हो गई थी और उसे मृत्यु के बाद नर्क की प्राप्ति हुई, ऐसा बाबर का बाबरनामा में संदेश था। 

थोड़ा सा पीछे जाएं तो जब इब्राहिम लोदी 1517 में दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना था तब वह उसके विरुद्ध जो भी था वह उनको ख़त्म कर रहा था और इसी क्रम में उसका एक विरोधी था जिसका नाम जलाल खां था। 

वह इब्राहिम लोदी से भागकर ग्वालियर के राजा बिक्रमजीत के पास बचने के लिए चला गया था और राजा बिक्रमजीत ने उसे अपने यहाँ शरण दे दी थी। 

इस बात की खबर सुनकर इब्राहिम लोदी ने अपनी सेना आज़म हुमायूँ सरवानी के नेतृत्व में राजा बिक्रमजीत के विरुद्ध भेज दी, बाद में राजा बिक्रमजीत ने आज़म हुमायूँ सरवानी के साथ संधि कर ली और ग्वालियर का दुर्ग इब्राहिम लोदी को दे दिया और इसके साथ इब्राहिम लोदी द्वारा शमशाबाद का दुर्ग जो आगरा के पास में है उसे राजा बिक्रमजीत को दे दिया था। 

इस संधि के द्वारा राजा बिक्रमजीत और इब्राहिम लोदी में संबंध अच्छे हो गए थे और इन्हीं अच्छे संबंधो के कारण उन्होंने बाबर के विरुद्ध इब्राहिम लोदी का साथ पानीपत के प्रथम युद्ध में दिया था, जिसमे दोनों की ही मृत्यु हो गई थी। 

जैसा की हमने जाना की शमशाबाद का दुर्ग जो आगरा के पास में है राजा बिक्रमजीत के पास चले गया था, इसलिए उनका परिवार भी वहीं चला गया था। 

इसके बाद बाबर के द्वारा बाबरनामा में लिखा गया की उसका पुत्र हुमायूँ जब आगरा पहुंचा तब वहाँ राजा बिक्रमजीत का परिवार था जो वहा से भागना चाह रहा था,परंतु हुमायूँ के पहरे ने उनको भागने नहीं दिया था। 

तब राजा बिक्रमजीत के परिवार ने हुमायूँ को बहुत सारा धन दिया और उस धन में एक हीरा भी राजा बिक्रमजीत के परिवार ने हुमायूँ को दिया था। 

यही आगे चलकर “कोह-ए-नूर” या कोहिनूर हीरे के नाम से प्रसिद्ध हुआ था लेकिन बाबरनामा में इस हीरे को कोहिनूर हीरा नहीं कहा गया क्यूंकि यह नाम बाद में इस हीरे को मिला था। 

बाबर ने लिखा की यह वही हीरा था जिसे अलाउद्दीन खिलजी द्वारा लाया गया था। 

यह हीरा अलाउद्दीन खिलजी के पास कहाँ से आया इसके लिए हमें थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा। 

जब दिल्ली सल्तनत में खिलजी वंश का शासन चल रहा था तब अलाउद्दीन खिलजी ने अपने गुलाम जिसका नाम मलिक काफूर था, उसे दक्षिण में वारंगल के अभियान पर भेजा था, वारंगल वर्तमान समय में तेलंगाना के अंतर्गत आता है। 

उस समय वारंगल में काकतीय वंश के राजा प्रताप रूद्र देव शासन कर रहे थे, मलिक काफूर और राजा प्रताप रूद्र देव में बहुत संघर्ष हुआ, परंतु अंत में दोनों में संधि हो गई और राजा प्रताप रूद्र देव ने मलिक काफूर को बहुत सारा धन दिया जिसमे वही हीरा भी था जिसे बाद में कोह-ए-नूर या कोहिनूर हीरा कहा गया था। 

इसलिए बाबर ने बाबरनामा में लिखा था की राजा बिक्रमजीत के परिवार ने हुमायूँ को जो हीरा दिया था यह वही हीरा था जो अलाउद्दीन खिलजी द्वारा लाया गया था। 

दोस्तों, कहा जाता है की सबसे पहले यह हीरा वर्तमान में जो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के वो क्षेत्र जो कृष्णा नदी के किनारे स्थित थे वहां एक कोलूर क्षेत्र में खानों में खुदाई के समय यह कोहिनूर का हीरा निकाला गया था। 

इसके साथ गोलकुण्डा जो तेलंगाना के अंतर्गत आता है वहां पर इस हीरे को लाया गया और गोलकुण्डा से ही खनन किये हुए हीरों को बाहर व्यापार के लिए भेजा जाता था, इसलिए इस हीरे को गोलकुण्डा का हीरा भी कहा जाता है। 

इसके बाद बाबर ने लिखा की जब मैं आगरा पहुंचा तब हुमायूँ ने यह हीरा मुझे दिया था, परंतु मैंने यह हीरा हुमायूँ को वापस दे दिया और जब मैंने इस हीरे के कीमत निकलवाई, तो यह हीरा इतना कीमती निकला की यह पूरे विश्व के लोगों के ढाई दिन तक के भोजन की व्यवस्था कर सकता था। 

इस कोहिनूर हीरे के बारे में अहमद शाह दुर्रानी जो अफगनिस्तान के साम्राज्य का संस्थापक था उसके पोते की पत्नी जिनका नाम वफ़ा बेगम था उन्होंने कहा था की अगर किसी ताकतवर व्यक्ति को चारों दिशाओं में पत्थर फेंकने को कहा जाय और एक पत्थर आसमान की तरफ पूरे जोर से फेकने को कहा जाए। 

इन पत्थरों को फेंकने के बाद जो जगह बनेगी, उस जगह को अगर सोने से भी भर दिया जाए तब भी उसकी इतनी कीमत नहीं होगी जितनी इस कोहिनूर हीरे की कीमत है। 

दोस्तों, हमने ऊपर जाना की बाबर ने इस हीरे को बाबरनामा में कोहिनूर हीरा नहीं कहा बल्कि इस हीरे को बाद में यह नाम मिला तो यह नाम बाद में नादिर शाह द्वारा दिया गया था। 

जब बाबर के वंशज यानी उत्तर मुग़ल काल का दौर चल रहा था तब उस समय मुहम्मद शाह शासन कर रहा था उसे रंगीला बादशाह भी कहा जाता था। 

उसके समय में ईरान के नादिर शाह ने जिसे ईरान का नेपोलियन भी कहा जाता है, उसने मुगल शासक मुहम्मद शाह के समय 1739 में भारत में आक्रमण किया और दोनों के बीच करनाल का युद्ध हुआ जिसमें नादिर शाह को विजय प्राप्त हुई थी। 

फिर नादिर शाह दिल्ली में आया और उसने काफी कत्लेआम मचाया और करीब 20-30 हज़ार लोगों को नादिर शाह ने मार दिया था, तब मुहम्मद शाह का सेनापति निज़ाम-उल-मुल्क नादिर शाह के पास गया और यह कत्लेआम बंद करने का आग्रह किया और इसके बदले नादिर शाह को बहुत सारा धन दिया। 

इसी में नादिर शाह को वह हीरा दिया गया जो मुगलों के पास था और फिर उस हीरे को देख कर नादिर शाह ने उसे “कोह-ए-नूर” व कोहिनूर हीरा का नाम दिया था जिसका अर्थ था रौशनी का पर्वत। 

बाबरनामा – Baburnama in hindi

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई बाबरनामा ( Baburnama in hindi ) के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न

बाबर की आत्मकथा का नाम क्या था?

बाबरनामा, बाबर की आत्मकथा बाबरनामा को “तुजुक-ऐ-बाबरी” के नाम से भी संबोधित किया जाता है और यह तुजुक-ऐ-बाबरी बाबर के द्वारा तुर्क भाषा में लिखी गई थी क्यूंकि यह भाषा बाबर की मात्र भाषा थी। 

बाबरनामा किसकी आत्मकथा है?

बाबरनामा प्रथम मुग़ल बादशाह बाबर की आत्मकथा है।

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