भगवद गीता अध्याय 3

भगवद गीता अध्याय 3 – कर्म योग 🕉📖 

भगवद गीता अध्याय 3 – दोस्तों, आज हम भगवत गीता के तीसरे अध्याय के बारे में पढ़ेंगे जिसका नाम है कर्म योग इससे पहले हमने भगवत गीता के दूसरे अध्याय सांख्य योग को पढ़ा था।

कर्म तो हर समय हम सब करते हैं, ऐसा कोई समय नहीं है जिसमे हम कर्म को किये बिना रह सकें, कुछ कर्म झूठ और फरेब से भरे होते हैं और कुछ कर्म कर्तव्य के लिए किये जाते हैं, तो फिर वे कौन से ऐसे कर्म हैं जो हमें हमारे लक्ष्य तक ले जाते हैं।

इसी कर्म योग को श्री कृष्ण इस अध्याय में अर्जुन को बताते हैं, आइये पढ़े:

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ।।3-1।।

अर्जुन पूछते हैं, हे जनार्दन ! यदि आपको कर्म के मुकाबले ज्ञान बेहतर लगता है, तो फिर हे केशव ! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं, श्रीकृष्ण ज्ञान को कर्म से अच्छा बताते हैं, तो उस स्तिथि में यह प्रश्न उचित लगता है, कि फिर श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म अर्थात युद्ध करने के लिए क्यों कह रहें हैं। 

क्यूंकि अगर ज्ञान की ही बात है तो वह तो अर्जुन श्रीकृष्ण से प्राप्त कर ही रहें हैं, तो अपनों की हत्या करने वाले ऐसे युद्ध में श्रीकृष्ण उन्हें क्यों भेज रहें हैं। 

दोस्तों, कितनी ही बार हमारे मन में ऐसे प्रश्न आते हैं, की कर्म आखिर क्यों किया जाए?

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ।।3-2।।

श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन की बुद्धि मोहित हो रही थी, समझने की जगह वे और भी ज्यादा उलझते जा रहे थे, इसलिए अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं की एक बात बताइये प्रभु जिससे मेरी उलझन दूर हो सके। 

अर्जुन कहना चाहते हैं की उनकी दुविधा को दूर करके श्रीकृष्ण उन्हें एक स्पष्ट बात बताएं, जिस पर वे चल सकें। 

श्रीकृष्ण ने जो अर्जुन को बाते बताई हैं वे जटिल और गहरी हैं, ऊपर-ऊपर से देख कर ऐसा लगता है की यह सब ज्ञान की बातें हैं, इन बातों पर चले तो चले कैसे, और यही दुविधा अर्जुन की भी है और श्रीकृष्ण उत्तर दे रहें हैं। 

श्रीभगवानुवाच 

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।

ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ।।3-3।।

भगवान अर्जुन से कहते हैं की इस दुनिया में दो प्रकार की निष्ठा – दो प्रकार के विश्वास है, जिसमें से एक है सांख्य योग, जिसका संबंध ज्ञान से है और दूसरा कर्म योग है जिसका संबंध सिर्फ कर्म से है। 

निष्ठा का अर्थ है कुछ भी करने की सबसे परिपक्व अवस्था और पराकाष्ठा, अपनी इन्द्रियों को वश में कर परमात्मा का ध्यान लगाना ज्ञान योग से होता है और इसको कहते हैं संन्यास या सांख्य योग। 

दूसरा है कर्म योग जिसका अर्थ है निष्काम कर्म करके फल में इच्छा न रखना। 

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।

न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ।।3-4।।

भगवद गीता अध्याय 3 – मनुष्य न तो कर्मों का शुरू किए बिना निष्कर्मता को अर्थात योग निष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल छोड़ देने से सिद्धि अर्थात सांख्य निष्ठा को ही प्राप्त होता है। 

दोस्तों, ऐसा नहीं की आप कर्म करें ही न और खुद को सन्यासी कहें, ऐसे तो दुनिया चल ही नहीं पायेगी।

अपने कर्तव्यों को छोड़ यदि आप सन्यासी बन जाते हैं और आप समझते हैं की आपको मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी!! ऐसा संभव नहीं है। 

ऐसा नहीं हो सकता की आप कर्मों को त्याग दे और खुद को कर्म योगी कहें, कर्म को न करने से या फिर उसे सदा के लिए त्याग देने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। 

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ।।3-5।।

ऐसा ही नहीं सकता की मनुष्य किसी भी काल में क्षण मात्र भी बिना कर्म किये रह जाए, हमारी दुनिया ऐसी है की हम चाहे या न चाहे कर्म तो हमें करना ही पड़ेगा। 

कर्म न करना भी कर्म करना ही है, जिस तरह से हम इस दुनिया में आए हैं, जिस तरह से प्रकृति ने हमें बनाया है उसका गुण यही है की हम हर समय कर्म करें। 

प्रकृति में कभी कुछ भी रुकता नहीं है, सांसे चलती है, समय चलता है, जीवन का चक्र चलता रहता है और जब तक जीवन रहेगा तो कर्म भी रहेगा, इसलिए यह आवश्यक है की कर्म को समझा जाए और उसे समझ के उसे किया जाए। 

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ।।3-6।।

जो सिर्फ दिखावे के लिए अपनी इन्द्रियों को ऊपर से रोक कर परंतु अंतर्मन से हमेशा उन्हीं के बारे में सोचता है, वह मिथ्याचारी अर्थात ढोंगी कहा जाता है यानी झूठा और घमंडी। 

उदाहरण के लिए जैसे कोई व्यक्ति खाना खाने से मना कर दे लेकिन अंदर ही अंदर खाने के बारे में ही सोचता रहे, तो यह किस तरह का उपवास हुआ, इसे व्रत नहीं माना जाएगा। 

कितने ही साधु सन्यासी आपको मिलेंगे, जो कहते हैं की उन्होंने दुनिया को त्याग दिया है, कर्म को त्याग दिया है, परंतु अगर उनके मन में अभी भी इस दुनिया के लिए इच्छा है, तो श्रीकृष्ण उन्हें झूठा और पाखंडी बताते हैं। 

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।

कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।।3-7।।

हे अर्जुन ! जो पुरुष सच्चे मन से इन्द्रियों को वश में करके उनसे बिना लगाव लगाए कर्म करता हैं, वही कर्म योग का पालन करता है और वही श्रेष्ठ है। 

श्रीकृष्ण एक तरह से चेतावनी दे रहें हैं की इन्द्रियों को तो वश में करना ही है, लेकिन मन का उन इन्द्रियों से किसी भी तरीके से लगाव नहीं होना चाहिए और उसे ही कर्मयोग माना जायेगा। 

जब इन्द्रियां वश में होती हैं तो आप कुछ भी करने में संभव होते हैं, किसी भी तरह की बाधा आपको आपका कर्म करने से रोक नहीं सकती है और अगर आप इन्द्रियों के वश में है तो फिर वह स्वादिष्ट खाने की खुशबू ही क्यों न हो, कोई रूप सी नारी ही क्यों न हो, आसपास का शोर ही क्यों न हो, हर बाधा आपको आपका कर्म करने से रोकेगी। 

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ।।3-8।।

हे अर्जुन ! तुम केवल कर्तव्य निभाओ क्योंकि कर्म न करने के मुकाबले कर्म करना बेहतर है और तुम्हारे कर्म न करने से तुम्हारा जीवित रहना भी तो संभव नहीं है अर्थात तुम शास्त्र उठाओ और युद्ध करो। 

अपना कर्म करो क्योंकि यह कर्म न करने से कहीं ज्यादा अच्छा है कहने का तात्पर्य यह है की कर्म तो बहुत सारे हैं, परंतु उसमें से एक चुना हुआ है, उसी चुने हुए कर्म को ही निर्धारित कर्म कहते हैं। 

अपनी मर्ज़ी से अगर आप कर्म चुन लेंगे, तो उसे निर्धारित नहीं माना जाएगा, आपको अपना कर्तव्य समझ कर अपना कर्म चुनना होगा अथवा जो कर्म आपको मिला है उसे अपना कर्तव्य समझ कर निभाना होगा। 

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ।।3-9।।

भगवद गीता अध्याय 3 – इस श्लोक में श्रीकृष्ण पूरे समाज में भलाई वाले कर्म को समझा रहे हैं, यज्ञ वह होता है जिसमे सब शामिल होते हैं। 

श्रीकृष्ण कहते हैं की यज्ञ के लिए किये जाने वाले कर्मों से ही ये मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है, इसलिए हे अर्जुन ! तुम इच्छाओं को छोड़कर उस यज्ञ के निमित्त ही कर्म करो। 

यज्ञ अर्थात समाज की भलाई के लिए किया गया निस्वार्थ कार्य, हमको भी अपने कर्तव्यों को यज्ञ समझ के कार्यों में अपना योगदान देना चाहिए, जिससे समाज का भला हो सके, इसे ही आप निर्धारित कर्म ही मानिए। 

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ।।3-10।।

प्रजापति ब्रह्मा ने इस दुनिया की शुरुआत में यज्ञ को रचकर अपनी प्रजा से कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा इस वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करेगा। 

घरों में जो यज्ञ किये जाते हैं उन्हें एक धार्मिक कर्म काण्ड न समझ कर उसका महत्त्व समझना चाहिए, यज्ञ हमारे संस्कारों का संगठित रूप है। 

संस्कार का अर्थ है कार्य करने का सबसे उत्तम तरीका, यज्ञ से हम हर विधि को या संस्कार को उचित तरीके से पूरा कर कर्म को शुरू करते हैं, यज्ञ एक तरीके से हमें राह दिखाता है, अगर आगे भी संस्कारों का पालन होगा तो हमारा धेय जरूर पूरा होगा। 

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।।3-11।।

ब्रह्मा कहते हैं कि यज्ञ से सब लोगों को देवताओं को खुश करना चाहिए और वे देवता खुश होकर हम सब की भलाई करेंगे, इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे। 

यज्ञ देवताओं को खुश करने का तरीका है और उसके बदले में देवता आप सब को खुश रखते हैं, आपकी उन्नति करते हैं, इसलिए काम को शुरू या कोई शुभ कार्य करने से पहले ईश्वर का नाम लेने का विधान है। 

यही ईश्वर का नाम जब सही तरीकों या सही पद्धति के साथ किया जाता है तो उसे यज्ञ कहते हैं, यज्ञ को अपने और देवताओं के बीच का एक माध्यम मान लीजिये, जिससे दोनों के बीच संबंध बना रहता है। 

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ।।3-12।।

यज्ञ करके जब आप देवताओं की पूजा करते हैं, तो वे आपके बिना मांगे ही आपकी सभी इच्छाओं को पूरा कर देते हैं, लेकिन जो यज्ञ नहीं करता और उस यज्ञ से देवताओं को प्रणाम नहीं करता लेकिन फिर भी अपनी इच्छाओं को पूर्ण करना चाहता है, उन्हें चोर समझना चाहिए। 

कुछ करने से कुछ मिलता है और कुछ देने से कुछ मिलता है, बिना अर्ग चढ़ाये या बिना पूजा किये अगर कोई चाहता है की उसकी इच्छा पूरी हो जाए। 

बिना कोई काम किये अगर कोई सोचे कि उसका काम बन जाए, तो इसे बेईमानी या चोरी ही तो कहा जाएगा। 

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ।।3-13।।

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं वे तो पाप को ही खाते हैं। 

हम क्या सिर्फ खाना खाकर ज़िंदा रहने और फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाने के लिए ही पैदा होते हैं, ऐसे जीवन का क्या मतलब। 

अपने जीवन का उद्देश्य हमें समझना होगा, इस ब्रह्माण्ड में हम क्यों हैं, क्यों हमें ईश्वर या मोक्ष को प्राप्त करना है यह हमें समझना है और वह समझने के लिए ही यज्ञ जैसे अनुष्ठान किये जाते हैं। 

जो लोग यज्ञ और ईश्वर को याद किये बिना सिर्फ अपने जिंदा रहने में लगे रहते हैं, उन्हें चोर समझना चाहिए। 

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ।।3-14।।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।

तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ।।3-15।।

भगवद गीता अध्याय 3 – अगर अन्न ख़त्म हो जाए तो सब ख़त्म हो जायेंगे, सम्पूर्ण प्राणी जगत हर कोई अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है और वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्मों से होते हैं और कर्मों की उत्पत्ति वेदों से। 

हमारी संस्कृति का सारा ज्ञान वेदों से ही तो आया है, कर्म क्या है उसकी परिभाषा भी वेद से आई है और वेद परमपिता परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं। 

वेद ईश्वर से आया हुआ ज्ञान है, वेद से आगे और वेद से बड़ा कुछ भी नहीं है, दोस्तों, इससे यह सिद्ध होता है कि यज्ञ और ईश्वर में सीधा संबंध है। 

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।

अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ।।3-16।। 

श्रीकृष्ण कह रहे हैं, हे पार्थ ! जो पुरुष परंपरा से नहीं चलता, जो सृष्टि चक्र और प्रकृति के नियमों के अनुसार नहीं चलता अर्थात जो अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापयुक्त पुरुष व्यर्थ ही जीता है। 

ऐसा इंसान सिर्फ इन्द्रियों के वश में रहकर ही जिंदा रहता है, जीता है और मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, उसके जीवन मृत्यु का चक्कर चलता ही रहता है, ऐसे इंसान के जीने और मरने का कोई मतलब नहीं है। 

वेदों में और ग्रंथों में ज्ञान और नियम बनाए हैं उनका मतलब है और उस मतलब के अनुसार हमें अपना जीवन जीना चाहिए। 

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।

आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ।।3-17।।

श्रीकृष्ण कहते हैं की जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मा में तृप्त और संतुष्ट हो उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है, आत्मा का अर्थ यहाँ सबसे बड़ा सच है और जो सत्य को समझता है, सत्य में ही खुश होकर ही रहता है, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। 

जिसको ज्ञान प्राप्त हो चुका है, जो जीवन की सच्चाई जान चुका है, सिर्फ वो ही ऐसा है जिसके लिए कर्तव्य का कोई मतलब नहीं है, लेकिन ऐसा कोई लाखों-करोड़ों में एक होता है, बाकी हम सब के लिए कर्तव्य ही सब कुछ है। 

संजय उवाच 

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।

न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ।।3-18।।

संजय श्रीकृष्ण के ज्ञान को हमें आगे बता रहे हैं कि ऐसे महापुरुष जो आत्मा को और सत्य को जान चुके हैं, उनके लिए कर्म करने का कोई प्रयोजन रहता ही नहीं है, ऐसे महापुरुष कर्म के बंधन से छूट चुके हैं, क्यूंकि ये ज्ञानी इस दुनिया और ईश्वर को समझ चुके हैं। 

इनका स्वार्थ से कोई मतलब नहीं रहता है, इसलिए ये महापुरुष हमारे जैसे लोगो से बिलकुल अलग हैं, इनपर वे नियम लागू नहीं होते हैं जो हमारे जैसे दुनिया-दारी में लगे हुए लोगों में लागू होते हैं। 

दोस्तों, इसे कुछ ऐसे समझिये की जिसे ईश्वर मिल गया हो उसे फिर और क्या चाहिए, वो फिर कोई और कर्म क्यों करे। 

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ।।3-19।।

हे अर्जुन ! इसलिए तुम अपनी आसक्ति और अपनी इच्छा को छोड़कर, हमेशा अपने कर्तव्य कर्म को ठीक तरीके से करते रहो, अपनी कामनाओं को छोड़कर सिर्फ और सिर्फ अपने कर्तव्यों को पूरा करने में लग जाओ। 

क्यूंकि आसक्ति से या लगाव से छूटकर जो भी अपना कर्म करता है, वह मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। 

कर्तव्य की राह आसान नहीं होती है, कितनी ही बार हम सब को लगता है की सब कुछ छोड़कर आराम करें, देर तक सोये या परिश्रम न करें लेकिन उससे कभी भी कुछ भी हासिल नहीं होता है, ऐसा श्रीकृष्ण समझा रहें हैं। 

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।

लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ।।3-20।।

भगवद गीता अध्याय 3 – बहुत से ऐसे लोग हैं जो कर्म करते हुए ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, बहुत से ज्ञानी महापुरुष तो ऐसे होते हैं जो आत्मा की सच्चाई को पहचान जाते हैं, लेकिन बाकी लोगों के लिए अगर उन्हें जीवन में कुछ करना है तो सिर्फ कर्म ही एक रास्ता है।

अगर आप चाहते हैं की आपके जीवन का कोई मतलब हो, जन्म लेना, जिंदा रहना और फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाना इस बेकार जीवन से बचकर अगर आप कुछ करना चाहते हैं, तो आसक्ति से या लगाव से बचकर हमें अपना कर्म करना चाहिए और अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए। 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस् तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।3-21।।

श्रेष्ठ पुरुष हमेशा आगे चलता है और बाकी लोग उसके पीछे-पीछे चलते हैं, इसलिए आपको यह फैसला करना है की आप आगे चलने वाले हैं या पीछे। 

श्रीकृष्ण कहते हैं की श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं, वो जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।

कहने का यह अर्थ है कि जो हमारे आदर्श होते हैं, हम उन्हीं का अनुसरण करते हैं। 

किसी भी क्षेत्र में ऐसे लोग होते हैं जो उसमें सर्वश्रेष्ठ होते हैं और पूरी दुनिया उन्हीं के जैसा करने की कोशिश करती रहती है, आदर्श एक होता है और उसके अनुसरण करने वाले बहुत सारे होते हैं। 

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ।।3-22।।

श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन ! मेरा इन तीन लोकों में कुछ भी कर्तव्य नहीं है और न ही ऐसी कोई वस्तु है जिसे मैं प्राप्त नहीं कर सकता, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ। 

दोस्तों, श्रीकृष्ण से बड़ा कौन आदर्श हो सकता है, लेकिन वे भी कर्म करते हैं, वे भी कर्म करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं। 

श्रीकृष्ण ने महाभारत में भाग लेने से मना नहीं किया, उनकी नारायणी सेना कौरवों के साथ थी लेकिन वे खुद अर्जुन व पांडवों के साथ, जब श्रीकृष्ण अपना कर्म करके अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हैं तो हम कौन होते हैं और हम अपना कर्म क्यों न करें। 

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।।3-23।।

श्रीकृष्ण कहते हैं, हे पार्थ ! अगर मैं कर्मों को करने में सावधानी न बरतूँ तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा, हर श्रीकृष्ण का अनुसरण करता है और अगर आदर्श या भगवान ही कुछ नहीं करेंगे तो मनुष्य तो सब कुछ करना ही छोड़ देंगे।

जो सबसे बड़ा होता है और सर्वश्रेष्ठ होता है सब उनका अनुसरण करते हैं, और अगर श्रीकृष्ण यह सोचते की मैं तो भगवान हूँ और मैं कर्म नहीं करूँगा तो उन्हें किसी और को ज्ञान देने का क्या अधिकार रह जाता। 

ईश्वर होते हुए भी उन्होंने अपने हर कर्म का पालन किया, कर्म से कभी भी पीछे नहीं हटे, उनके पदचिन्हों में ही हमें चलना है और सर्वश्रेष्ठ बनने की कोशिश करनी है। 

यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।

संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ।।3-24।।

श्रीकृष्ण बताते हैं की यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ, और मैं संकरता का करने वाला होऊँगा तथा मेरी वजह से सारी प्रजा नष्ट हो जाएगी।

अगर श्रीकृष्ण कर्म नहीं करेंगे तो दोस्तों, दुनिया ख़त्म हो जायगी, ये दुनिया उन्हीं की तो लीला है, माया है, खेल है और जिसने यह खेल रचा है वही अपना कर्म नहीं करेगा तो दुनिया में क्या बचेगा। 

चाहे वह ईश्वर हो या साधारण मनुष्य, नियम तो सब पर ही लागू होते हैं, अगर कर्म का नियम है तो वह श्रीकृष्ण को भी करना पड़ेगा और हमें भी। 

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।

कुर्याद्विद्वांस्तथासक्त श्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ।।3-25।।

हे भारत ! जिनमें समझ नहीं होती न वे कर्म में आसक्त होकर कार्य करते है, विद्वानों और समझदारों को बिना लगाव के कार्य करना चाहिए है, क्या यज्ञ करने से हम ज्ञानी हो जाते हैं, कर्म को सही विधि से करने से क्या हम ज्ञानी हो जाते हैं, नहीं, ऐसा नहीं है हमें कर्म करना उसमें आसक्ति या लगाव नहीं करना है और ऐसा करना आसान नहीं है। 

अगर ऐसा कोई ज्ञानी जिसका कर्मों से कोई लेना देना नहीं है, जैसे की कोई साधु या संत जिसका की किसी कर्म से आसक्ति नहीं है, तो ऐसे लोगों को समाज सेवा में लग जाना चाहिए, यह उनके लिए कहा गया है जो सोचते हैं की दुनिया को छोड़ कर सन्यासी बनने से उन्हें भगवान की प्राप्ति हो जायगी। 

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।

जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ।।3-26।।

भगवद गीता अध्याय 3 – जो ज्ञानी है और जिन्हें ईश्वर की सच्चाई ज्ञात हो गयी है, उनकी यह जिम्मेदारी बन जाती है, की उनके कार्य करने के तरीके से किसी दूसरे के मन में कर्म को लेकर अश्रद्धा, अपमान यह सब पैदा न हो जाए। 

आप किसी ज्ञानी को देख यह सोच सकते हैं, की वे कुछ करते ही नहीं तो मैं भी न करुँ, इसीलिए ये उन महापुरुषों और ज्ञानियों के लिए जरूरी है की वे ऐसा उदाहरण सामने रखें, जिससे हर कोई अपना कर्म और अपना कर्तव्य करने के लिए प्रेरित हो। 

दोस्तों, यदि किसी साधु को देख कर सब लोग अपना परिवार छोड़ सन्यासी बन जायेंगे तो दुनिया नहीं चल पाएगी। 

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।।3-27।।

हर व्यक्ति की अपनी एक प्रकृति होती है और अपनी उस प्रकृति के अनुसार ही वह कर्म करता है, हर कर्म उस प्रकृति के गुण के हिसाब से ही होता है। 

जिसके अंदर घमंड भरा होता है, वह ये सोचता है की मैं ही करता हूँ अर्थात करने वाला मैं ही हूँ और ऐसा सोचने वाले को अज्ञानी कहा गया है। 

आप जो भी कार्य करते हैं, उस कार्य को करवाने वाली आपकी प्रकृति होती है और उसके गुण होते हैं, कितनी ही बार ऐसा होता होगा की गुस्से में आप कुछ ऐसा कर जाते हैं जो आप नहीं करना चाहते थे, वो आपका क्रोध आपसे करवा देता है। 

सोचिये और समझने की कोशिश करिये की आपकी प्रकृति क्या है?

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ।।3-28।।

यहाँ पर श्रीकृष्ण ने बहुत ही गहरी बात कही है, सात्विक, राजसिक और तामसिक तीन तरह की प्रवृत्तियाँ होती हैं, फिर उनके गुण विभाग और कर्म विभाग होते हैं, इन्हीं गुणों के वजह से आप कर्म करते हैं। 

जैसे अगर तामसिक गुण रहेगा, तो आप आलस या नींद या फिर इसी तरह के बुरे कर्म करेंगे। 

राजसिक गुण वाला हर बात में बहादुरी और शौर्य दिखाएगा और जो ज्ञानी होते हैं वे जानते हैं की यही गुण उनसे कर्म करवा रहे हैं और हम जैसे ज्यादातर लोग जो ज्ञानी नहीं होते, वो समझते हैं की सब कुछ वे ही कर रहें हैं। 

प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ।।3-29।।

कर्म में लगे हुए ज्ञानियों को ये जानना चाहिए की गुण ही उनसे कर्म करवाते हैं, वे खुद कुछ भी नहीं करते और ज्ञानी जब इस बात को समझ लें, तो ये उनकी जिम्मेदारी होती है की वे अज्ञानियों को समझाएं की कर्म ही उनका धर्म है। 

ज्ञानी अर्थात कि पहुंचे हुए लोग, ये लोग जान जाते हैं की उनके अंदर के गुण आते-जाते रहते हैं और बदलते रहते है और इन्हीं के अनुसार उनके कर्म भी बदलते रहते हैं। 

इसलिए वे उन कर्मों को करने वाला खुद को कभी नहीं मानते हैं, वे बस कार्य करते हैं और बाकी सब ईश्वर को सौंप देते हैं और हमें भी कार्य करके बाकी सब ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। 

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ।।3-30।।

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, कि तुम मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में अपने सारे कर्मों को अर्पण कर दो, आशा को छोड़, ममता को छोड़, दुख को दूर करके युद्ध करो। 

दोस्तों, अपने सारे कर्मों को हमें भगवान को सौंप देना चाहिए, कोई आशा नहीं, कोई ममता नहीं और कोई दुख नहीं, कुछ भी भाव नहीं होना चाहिए, तुम जाओ और बस युद्ध करो, इसी को आप सफलता का सार मान लीजिये।  

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ।।3-31।।

भगवद गीता अध्याय 3 – जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है, जीवन और मृत्यु के चक्कर से बचना, निष्काम कर्म का अगला कदम वही होगा, श्रीकृष्ण यही कहते हैं की जो मनुष्य दोष, दृष्टि से रहित और श्रद्धा युक्त होकर मेरे इस मत का सदा ही अनुसरण करेगा, वह सारे कर्मों के बंधन से छूट जायगा। 

जो भी कोई सुख-दुख और मोह माया को छोड़ अपने कर्म को मुझमे अर्पण करता है और कर्म को सच्चे मन से करता है, वह कर्म के सारे बंधनों से छूट जाता है और कर्म के बंधन से छूटने का अर्थ है, जन्म और मृत्यु के चक्कर से बचना। 

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।

सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ।।3-32।।

श्रीकृष्ण कहते हैं की कई लोग घमंड करके खुद को बहुत बड़ा समझते हैं, उन्हें लगता की वही सब करते हैं, सब कुछ वही करते हैं, उन्हें नहीं लगता की उन्हें अपना कर्म भगवान को अर्पण करना चाहिए, ऐसे लोग अपने झूठे ज्ञान में ही मस्त रहते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें मूर्ख बताते हुए उनसे दूर रहने की सलाह दे रहे हैं। 

आपको अपने चारों तरफ कई सारे घमंडी दिख जायेंगे, जिन्हें लगता है की वे कुछ गलत नहीं कर रहे हैं, अपने धन और घमंड के अहंकार में वे किसी की बात सुनने तक को तैयार नहीं होते हैं, हम आपसे यह कहना चाहेंगे की आप उन्हें मूर्ख समझ कर उनसे दूर ही रहें। 

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।

प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ।।3-33।।

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं, अर्थात अपने स्वभाव से मजबूर होकर कर्म करते हैं, ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार कोशिश करता है फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा। 

श्रीकृष्ण यह समझा रहें हैं की हर प्राणी का अपना एक स्वभाव होता है, सभी उसी के चलते कार्य करते हैं, जो ज्ञानी है जो सब कुछ जानते हैं उनसे भी कार्य उनकी प्रवृत्ति ही कराती है, इसमें किसी का हठ और जिद्द कुछ भी नहीं कर पाएगी। 

अगर आप कोशिश करेंगे की किसी से उसकी प्रवृत्ति के विरुद्ध काम करवा लेंगे, तो आप सिर्फ अपना समय ही व्यर्थ करेंगे। 

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।

तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ।।3-34।।

इन्द्रियों में ही प्यार और क्रोध यद्वेष छुपा है, मनुष्य को इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्यूंकि ये दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं अर्थात इन्द्रियों में ही हर तरह का भाव छुपा होता है, अच्छा भाव भी और बुरा भाव भी, अच्छे और बुरे दोनों भावों में हमें नहीं फंसना चाहिए। 

क्योंकि इसी फंसने से ही हमारे मोह की शुरुआत होती है और फिर इन इन्द्रियों के चक्कर में हम फसते हुए चले जाते हैं और कभी भी निकल नहीं पाते, काम, क्रोध, लोभ और मोह को हमें अपना शत्रु मानना चाहिए। 

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।।3-35।।

श्रीकृष्ण कहते हैं, अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरों के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है, अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।

हर किसी को अपना कर्तव्य, अपना कर्म और अपना धर्म ही करना चाहिए, श्रीकृष्ण कहते हैं, यदि अपने धर्म के लिए मरना भी पड़े तो भी अच्छा है, लेकिन किसी दूसरे धर्म को स्वीकार नहीं करना चाहिए। 

कोई बेहद कमज़ोर जिसे खुद पर विश्वास न हो, दूसरे के धर्म को अपनाता है, जिसमे थोड़ा सा भी आत्म सम्मान होता है वह कभी किसी दूसरे धर्म को नहीं अपनाता। 

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ।।3-36।।

भगवद गीता अध्याय 3 – अर्जुन कहते हैं की हे कृष्ण ! तो फिर ये मनुष्य खुद न चाहते हुए भी जबरदस्ती किस बात से प्रेरित होकर पाप का काम करता है। 

दोस्तों, यहाँ पर अर्जुन एक अच्छा सवाल श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि क्यों मनुष्य श्रीकृष्ण के बताये रास्ते के अनुसार नहीं चल पाता, क्यों वह पाप के रास्ते पर चल जाता है, ऐसा क्या हो जाता है लोगों के साथ की वे पाप के रास्ते में चल जाते हैं। 

चाहे वे इस बात को जानते हों या नहीं जानते हों, वह क्या चीज़ है जो उन्हें विवश करती है, पाप के लिए उनका मन और बुद्धि किस बात को दोष दें। 

श्रीभगवानुवाच 

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ।।3-37।।

श्री भगवान कहते हैं की, रजोगुण से उत्पन्न होता है काम और काम में से निकलता है क्रोध अर्थात गुस्सा, काम या क्रोध कभी रुकता नहीं है अर्जुन, बस बढ़ता ही रहता है, इसको अपना सबसे बड़ा शत्रु मानना चाहिए। 

श्रीकृष्ण बताते हैं की पापी आखिर पाप किस कारण करता है, किसी के पाप करने की वजह क्या होती है, वजह है रजोगुण, इसी के कारण काम, क्रोध, राग द्वेष जैसे भाव उत्पन्न होते हैं जो की पाप की वजह होते हैं। 

इन्हीं द्वेषों को श्रीकृष्ण शत्रु बताते हैं, इन भावों के मन में आते ही आपको समझ जाना चाहिए की आप पर शत्रु हावी हो रहा है और आपको उसे रोकने की जरूरत है। 

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।

यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ।।3-38।।

जिस प्रकार धुएं से आग और धूल से दर्पण ढका जाता है, जिस प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा हमारा यह ज्ञान ढका रहता है।

राख जलती रहती है और उसके धुंए में आग छुपी रहती है, शीशे में अगर धूल हो तो चेहरा साफ़ नहीं दिखता, उसी प्रकार से ये जो काम, क्रोध जैसे विकार, ये जो कमियां है ये हमारे अंदर मौजूद ज्ञान को छुपा के रखती हैं, सब कुछ हमारे अंदर है, बाहर कुछ भी नहीं। 

ये कमियां, हमारे अंदर के ज्ञान को छुपाकर पूरी तरह से हमें पाप करने में विवश और उत्साहित करती हैं, इसलिए श्रीकृष्ण इन्हें शत्रु बताते हैं। 

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ।।3-39।।

हे अर्जुन ! यह ऐसी आग है जो कभी बुझती ही नहीं, इस आग का मतलब काम है और इसी से मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है। 

भोगों से कभी कोई तृप्त नहीं हुआ है, पैसा अगर कमाया है तो और कमाना है, खाना अगर खाया है तो और खाना है, भोगों का कोई अंत नहीं होता, बल्कि ये भोग मनुष्य का अंत करके ही मानते हैं। 

जैसे अगर आग को अगर ईंधन मिलता रहे तो वो कभी बुझती नहीं है, जब आप इन भोगों को आप बढ़ाते हैं तो आप ईंधन ही डाल रहें हैं। 

काम, क्रोध, मद और लोभ इन सब को नियंत्रण में रखना ही इस आग को बुझाने का एक रास्ता है। 

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।

एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ।।3-40।।

भगवद गीता अध्याय 3 – श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहें हैं, कि इन्द्रियां मन और बुद्धि ये सब इसके घर कहे जाते हैं, ये काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को ढक के जीवात्मा को मोहित करता है।

काम, क्रोध जैसे विकार कमियां, इन्द्रियों, मन और बुद्धि में रहते हैं और ये इनके घर हैं जहां इनका निवास होता है, घर में रहकर ये कमियां घर के मालिक को मोहित कर उसे ही ख़त्म करने की कोशिश करती हैं। 

कुछ अच्छा देख मन में लालच आता है, काम पूरा न होने पर क्रोध आता है, इसी तरह से ये कमियां हमारे दिमाग पर नियंत्रण करना शुरू कर देती हैं और हम हमेशा इनके वश में रहते हैं। 

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ।।3-41।।

हे अर्जुन ! तुम पहले इन्द्रियों को संयमित करो, इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महा पापी काम को कुछ भी करके बलपूर्वक मार दो। 

श्रीकृष्ण अर्जुन को सलाह देते हैं, कि इससे पहले कि की ये काम, क्रोध जैसे शत्रु तुम पर कब्ज़ा कर लें, तुम अपनी इन्द्रियों को वश में कर के अपने काम, क्रोध को मार दो, ये काम और क्रोध ही है जो हमारे अंदर ज्ञान को ख़त्म कर उसमें शंका भरते हैं, हमें हमारे रास्ते से भटकाते हैं। 

कितनी ही बार आपको लगता होगा की काम करते हुए सो जाएं, बस आपको अपनी इन्द्रियों को वश में करना होता है। 

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।।3-42।।

इंद्रियों को स्थूल शरीर से बेहतर, बलवान और श्रेष्ठ कहते हैं, इन इन्द्रियों से बेहतर मन है, मन से भी बेहतर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी बड़ा है वो आत्मा है। 

श्रीकृष्ण कहते हैं की हमारे शरीर से श्रेष्ठ हमारी इंद्रियां है, सही बात है कि किसी भी शरीर को उसकी इन्द्रियां पल भर में वश में कर लेती हैं, लेकिन इन्द्रियों से बड़ा मन है आप अपने मन से इन्द्रियों का नियंत्रण कर सकते हैं और मन से बड़ी बुद्धि है। 

दोस्तों, यह गहरी बात है इस बात को ध्यान में रखिएगा अभी तक सबसे बड़ी है बुद्धि और बुद्धि से बड़ी आत्मा है और इसी आत्मा को समझने का यह सारा खेल है। 

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ।।3-43।।

श्रीकृष्ण अपनी बात को समझाते हुए कह रहे हैं, हे अर्जुन ! इस प्रकार बुद्धि से बेहतर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और श्रेष्ठ आत्मा को मानो, बुद्धि से अपने मन को वश में करो, हे महाबाहो ! तुम इस कामरुप दुर्जय शत्रु को मार डालो। 

बुद्धि से मन को वश में करना है और अगर मन वश में हो गया तो आप इन्द्रियों को भी वश में कर लेंगे, जब मन और इन्द्रियां आपके वश में है तो उसका अगला कदम आत्मा के पास पहुंचना होगा, आत्मा परमात्मा का ही एक रूप है और आपकी बुद्धि आपको आपकी आत्मा के करीब पहुंचा सकती है। 

भगवद गीता अध्याय 3 – कर्म योग

दोस्तों, यह था भगवद गीता अध्याय 3 जो था कर्म योग।

इसके बाद हम गीता का चौथा अध्याय पढ़ेंगे, जय श्रीकृष्णा ।।। 

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