भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग

भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग 🕉📖

भगवद गीता अध्याय 4 – दोस्तों, आज हम भगवत गीता के चौथे अध्याय के संबंध में पढ़ेंगे, हमने अभी तक भगवत गीता के तीन अध्याय के बारे में जाना, हमारा तीसरा अध्याय कर्म योग था।

आइये पढ़ते हैं:

श्रीभगवानुवाच:

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।

यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।4.1।।

भगवान ने कहा: मैं फिर से तुम्हें सर्वोत्तम ज्ञान का वर्णन करूँगा, जिस ज्ञान को जानकर सभी मुनियाँ सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त हुई हैं।

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।4.2।।

मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य देवता विवस्वान को बताया, और विवस्वान ने मनु से कहा, मनु ने इक्ष्वाकु को बताया।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।4.3।।

इस प्रकार राजा ऋषियों ने इस योग को प्राप्त किया है, परंतु समय के साथ यह परंपरा टूट गई है, और इसलिए यह ज्ञान खो गया है।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।4.4।।

इसलिए मैंने तुम्हें इस प्राचीन योग को आज फिर से बताया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मेरे मित्र हो, और इसलिए तुम इस अत्यन्त रहस्यमय ज्ञान को समझ सकते हो।

अर्जुन उवाच।

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।4.5।।

अर्जुन ने कहा: आपका जन्म विवस्वान के जन्म से पहले हुआ है, इसलिए मैं कैसे समझूँ कि आपने शुरुआत में ही उन्हें यह ज्ञान दिया?

श्रीभगवानुवाच।

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।4.6।।

भगवद गीता अध्याय 4 – भगवान ने कहा: मेरे बहुत से जन्म हुए हैं और तुम्हारे भी, परंतु मैं उन्हें सभी याद करता हूँ, जबकि तुम नहीं कर सकते, हे परन्तप!

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।4.7।।

हालांकि मैं अजन्मा हूँ और मेरा परमात्मा नष्ट नहीं होता, और मैं सभी भूतों के ईश्वर भी हूँ, फिर भी मैं स्वयं को अपनी माया के द्वारा प्रकट करता हूँ।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।4.8।।

जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने आप को पृथ्वी पर प्रकट करता हूँ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।4.9।।

धर्मियों की रक्षा के लिए, पापियों का नाश करने के लिए, और धर्म की स्थापना के लिए मैं युगों-युगों में प्रकट होता हूँ।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.10।।

जो मुझे इस प्रकार दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्व से जानता है, वह शरीर त्यागकर पुनः इस संसार में नहीं आता, वह मुझमें ही लीन हो जाता है, हे अर्जुन।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।4.11।।

हे पार्थ! जैसे लोग मुझसे भक्ति भाव से शरण लेते हैं, वैसे ही सब मनुष्य मेरी पूरी दिशा में चलते हैं।

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।

क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।4.12।।

भगवद गीता अध्याय 4 – इस संसार में जो मनुष्य कर्म करते हैं, वे देवता इसलिए कर्म करते हैं क्योंकि वे कार्यफल की प्राप्ति की आकांक्षा रखते हैं। इस माध्यम से ही मनुष्य जल्दी ही सिद्धि को प्राप्त करता है।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।4.13।।

मैंने गुणों और कर्मों के विभाजन के साथ चार वर्णों को रचा है, इसलिए तुम मुझे कर्ता रूप में भी अविनाशी जानो।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।4.14।।

मेरे कर्मों से कोई भी प्रभावित नहीं होता, और मुझे कर्मफल में भी कोई इच्छा नहीं है, इसलिए जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह कर्मों द्वारा नहीं बँधता।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।

कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।4.15।।

इस प्रकार ज्ञान प्राप्त करने वाले पूर्वकृत कर्मों को जानकर, हे अर्जुन! तू भी पूर्वकृत कर्म कर, क्योंकि पूर्ववत कर्म करना ही तेरा कर्तव्य है।

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।4.16।।

इसलिए कुछ कर्म क्या है और कुछ कर्म क्या नहीं है, इसमें मोहित कवियों को भी यह नहीं पता है। मैं तुझे उस विवेक से जानकर कर्म बताता हूं, जिसे जानकर तू अशुभ से मुक्त होगा।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।4.17।।

अर्जुन! तुझे कर्म करना चाहिए और कर्मरहित अवस्था को भी समझना चाहिए। कर्मरहित अवस्था और कर्म, इनकी गहराईयों को समझना बहुत कठिन है।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।

स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।4.18।।

जो व्यक्ति कर्मों को न करता हुआ भी कर्मों की कमी देखता है, और जो व्यक्ति कर्मों को करता हुआ भी कर्मफल से आसक्त नहीं होता, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह सम्पूर्ण कर्म करता है।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।4.19।।

भगवद गीता अध्याय 4 – जिसके सम्पूर्ण कर्म सांकल्परहित और समर्पित हैं, उसके सम्पूर्ण कर्मों को ज्ञान की अग्नि ने जला दिया है, वह व्यक्ति पंडितों द्वारा पंडित कहा जाता है।

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः।।4.20।।

जो व्यक्ति कर्मफल से आसक्ति छोड़कर, सदैव संतुष्ट और आश्रयरहित है, वह कर्मों में प्रवृत्त होता है, फिर भी वह उस कर्मों का कुछ भी नहीं करता।

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।

शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।4.21।।

जो व्यक्ति आकुल चित्त, आत्मा में निराशा रहने वाला, सम्पूर्ण सांगोपाधि-रहित, शरीर को केवल कर्म करता है, वह कभी भी पाप को प्राप्त नहीं होता।

इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति आत्मा में निराशा रखता है, उसने सभी आसक्तियों को त्याग दिया है और केवल शरीर के कर्म में लगा हुआ है, वह पापों को नहीं प्राप्त करता। इससे यह भी सिद्ध होता है कि कर्मयोगी को अपने कर्मों के फलों से आसक्ति नहीं होती, और वह पाप से मुक्त रहता है।

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।।4.22।।

जो व्यक्ति यदृच्छा से मिलने वाले लाभ में संतुष्ट है, द्वंद्वों से परे है, और ईर्ष्या रहित है, वह समभाव से सिद्धि और असिद्धि को प्राप्त होता है, फिर भी वह किसी से बंधित नहीं होता।

इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति यदृच्छा से मिलने वाले लाभ में संतुष्ट है, वह द्वंद्वों से परे है (खुश और दुख में समान), और दूसरों की ईर्ष्या नहीं करता, ऐसा व्यक्ति सिद्धि और असिद्धि को प्राप्त होता है, लेकिन उसका मन किसी भी प्रकार से बंधित नहीं होता। यह जीवन में समर्पण और संतुष्टि की महत्वपूर्ण बातें बताता है।

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।

यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते।।4.23।।

भगवद गीता अध्याय 4 – जिसने संगरहित अवस्था को प्राप्त किया है और ज्ञान में स्थिर है, वह यज्ञ के रूप में सम्पूर्ण कर्मों को अर्पित करता है और उनका त्याग कर देता है।

इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति संगरहित अवस्था को प्राप्त है, उसने संगरहित चित्त को प्राप्त किया है, और ज्ञान में स्थिर है, वह सम्पूर्ण कर्मों को यज्ञ के रूप में अर्पित करता है और उनका त्याग कर देता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि ज्ञानी योगी अपने कर्मों के फलों से आसक्त नहीं होता, और वह पाप से मुक्त रहता है।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।4.24।।

जो व्यक्ति अपने सभी कर्मों को ब्रह्मा में अर्पित करता है, जैसे अग्नि को ब्रह्मा मानकर हविर्भाग को ब्रह्मा में यज्ञ करता है, वह व्यक्ति ब्रह्मा की ओर जाता है, जो ब्रह्मा के कर्म में समाहित है।

इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने सभी कर्मों को ब्रह्मा में समर्पित करता है, वह व्यक्ति ब्रह्मा की ओर जाता है और ब्रह्मा के कर्मों में समाहित हो जाता है। यह जीवन को एक दिव्यता और आदर्शता के साथ जीने की विधि को बताता है।

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।

ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।।4.25।।

दूसरे योगी वह व्यक्ति हैं, जो दैवी शक्तियों को ही यज्ञ के रूप में उपासते हैं, किन्तु दूसरे व्यक्ति यज्ञ के रूप में ब्रह्मा को ही अर्पित करते हैं।

इस श्लोक में कहा गया है कि योगी जो दैवी शक्तियों को ही यज्ञ के रूप में पूजते हैं, वह दैवी शक्तियों का समर्पण करते हैं, जबकि दूसरे व्यक्ति यज्ञ के रूप में ब्रह्मा को ही अर्पित करते हैं। यह भगवान की विभिन्न रूपों में भक्ति की विविधता को दर्शाता है।

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।

शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।।4.26।।

कुछ व्यक्ति श्रवणादि इंद्रियों को यज्ञ के रूप में संयमित करते हैं, जबकि दूसरे व्यक्ति इंद्रियों को विषयों में यज्ञ करते हैं।

इस श्लोक में कहा गया है कि कुछ व्यक्ति यज्ञ के रूप में श्रवणादि इंद्रियों को संयमित करते हैं, जबकि दूसरे व्यक्ति इंद्रियों को विषयों में यज्ञ करते हैं। यह शिक्षा देता है कि भक्ति में भी विविधता हो सकती है और व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक साधना को अपनी स्वभाविक शक्तियों के साथ कर सकता है।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।

आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।4.27।।

दूसरे कुछ व्यक्ति सम्पूर्ण इंद्रियों के कर्मों को और श्वास के कर्मों को आत्मसंयमी योगाग्नि में यज्ञ करते हैं, जिससे ज्ञान की दीप्ति से प्रकाशित होता है।

इस श्लोक में कहा गया है कि दूसरे कुछ व्यक्ति सम्पूर्ण इंद्रियों के कर्मों को और श्वास के कर्मों को आत्मसंयमी योगाग्नि में यज्ञ करते हैं, जिससे ज्ञान की दीप्ति से प्रकाशित होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानी योगी अपने कर्मों के फलों से आसक्त नहीं होता, और वह पाप से मुक्त रहता है।

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।

स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।4.28।।

भगवद गीता अध्याय 4 – वे जो लोग द्रव्ययाज्ञ, तपयाज्ञ, योगयाज्ञ और स्वाध्याययाज्ञ में तत्पर हैं, वे सम्यक व्रत धारण करने वाले हैं

अपाने जुह्णति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।।4.29।।

अपरे नियतहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्णति।

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः।।4.30।।

कई योगी अपानवायु को प्राणवायु में हवन करने का अभ्यास करते हैं, जिस तरह कुछ अन्य योगी प्राणवायु में अपानवायु को हवन करते हैं। और कुछ नियमित आहार करने वाले प्राणायाम-परायण साधक भी प्राण और अपान की गति को संतुलित करके प्राणों को हवन करने में लगे रहते हैं। इन साधकों का उद्दीपन यज्ञ के माध्यम से पापों का नाश करने वाला है और वे यज्ञों को समझने वाले भी हैं।

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातम्।

नायं लोकोऽस्त्यज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम्।।4.31।।

हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन, योगीजन जो यज्ञ से बचे हुए अमृतरूप अन्न का भोजन करते हैं, वे सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। उन्हें यह अनुभव होता है कि ब्रह्म परमात्मा ही सबका आदि और अंत है। इस प्रकार, यह योगीजन अमृत और नित्य सुख की प्राप्ति में सफल होते हैं। वहीं, यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं होता, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है? इससे यह सिद्ध होता है कि योगीजन का यज्ञ और तपस्या मानव जीवन को नीति, धर्म और सद्गुणों से युक्त बनाते हैं।

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।

कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।।4.32।।

इसी प्रकार, वेदों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विस्तृत विवरण दिया गया है। तू इन सभी को ऐसा मान, जो तेरे मानव शरीर और इंद्रियों के क्रियाओं से सम्बंधित हैं। इस प्रकार, तत्त्वज्ञान के माध्यम से उनकी समझ में आएगा और उनके अनुष्ठान से कर्मबंधन से सम्पूर्ण रूप से मुक्त हो जाएगा।

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप।

सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।4.33।।

हे परंतप अर्जुन! ज्ञानयज्ञ, जिसे द्रव्यमय यज्ञ से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है, वह अत्यंत उत्कृष्ट है। इससे सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाहित हो जाते हैं।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।

तुम उसे श्रद्धाभक्ति सहित प्रणाम करके, परिप्रश्न करके और सेवा करके जानो। तुम्हें तत्त्वज्ञान में सिद्ध ज्ञानियाँ सिखाएंगे, वे तत्त्व को दृष्टि से देखने वाले हैं।

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।

येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।4.35।।

भगवद गीता अध्याय 4 – जिसको जानकर तू फिर मोह में नहीं पड़ेगा, ऐ पाण्डव! जिससे तू सभी भूतों को सम्पूर्णतया देखेगा, उससे तू अपने आत्मा में, और अपने आत्मा को मुझमें देखेगा।

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि।।4.36।।

यदि तुम सभी पापों में सबसे बड़े पापी हो, तो तुम सभी को ज्ञान के समुद्र में डालकर पार कर जाओगे।

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।4.37।।

जैसे जलती हुई आग ईंधन को राख में बदल देती है, वैसे ही ज्ञान की आग सभी कर्मों को भी राख में बदल देती है, अर्जुन।

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।।4.38।।

इस लोक में ज्ञान से पवित्र कुछ भी नहीं है, क्योंकि समय के साथ योगसाधना में सम्पन्न हुआ व्यक्ति स्वयं ही आत्मा में पाना जाता है।

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।4.39।।

भगवद गीता अध्याय 4 – जो श्रद्धा और संयम से युक्त होता है, वह ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त होता है।

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।।

जो व्यक्ति अज्ञानी, श्रद्धाहीन, और संशय में डूबा हुआ है, वह नष्ट हो जाता है। इस संशयात्मा के लिए न तो इस लोक में सुख है और न परलोक में।

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्।

आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।।4.41।।

जो व्यक्ति कर्मों को योग संन्यास के साथ करता है और ज्ञान द्वारा संशय को छोड़ देता है, हे धनंजय! वह अपने आत्मा में स्थित होकर कर्मों को नहीं बाँधता।

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।

छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4.42।।

इसलिए, जो अज्ञान से उत्पन्न होने वाला है और जिसका आसरा आत्मा में है, ऐसे ज्ञानीपुरुष को यह संशय को त्यागकर योग में स्थित होने के लिए कहा जाता है, हे भारत! उठो और कर्म करो।

भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग

दोस्तों आज हमने भगवत गीता अध्याय 4 के संबंध में पढ़ा, इसके बाद हम इसके अगले अध्याय की तरफ बढ़ेंगे, जय श्री कृष्णा।।।

अगले भाग में हम भगवद गीता अध्याय 5 के संबंध में जानेंगे।

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