भगवद गीता अध्याय 5 - कर्मसंन्यासयोग

भगवद गीता अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग 🕉📖

भगवद गीता अध्याय 5 – दोस्तों, आज हम भगवद गीता अध्याय 5 के बारे में पढ़ेंगे, पिछले आर्टिकल में हमने भगवद गीता अध्याय 4 के बारे में जाना था।

भगवद गीता के पाँचवें अध्याय में जीवन को सही तरीके से जीने के लिए सत्कर्म और संन्यास की महत्वपूर्णता पर बातचीत है। इस अध्याय में कर्मयोग का महत्व, सत्कर्म करने का तरीका, और संन्यास के विभिन्न प्रकारों पर विस्तार से चर्चा होती है।

सद्गुण से युक्त जीवन के लाभ को बताते हुए, श्रीकृष्ण यह सिखाते हैं कि सभी कर्मों को भगवान को समर्पित करना चाहिए और फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। वे बताते हैं कि सच्चे संन्यासी वह हैं जो अपने कर्मों को ईश्वर के लिए करते हैं और आत्मा में समाहित रहते हैं।

इस अध्याय के माध्यम से, श्रीकृष्ण जी कर्मयोग और संन्यास के माध्यम से आत्मा के मुक्ति की राह को समझाते हैं, जिससे जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने का समर्थन होता है।

आइये पढ़ें:

अर्जुन उवाच

सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌ ॥5.1॥

हे कृष्ण! आप संन्यास को और कर्मयोग को भी प्रशंसा कर रहे हैं। इन दोनों में से मुझे एक योग्य, निर्देशनीय रूप से निश्चितपूर्वक बताइए।

श्रीभगवानुवाच
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥5.2॥

संन्यास और कर्मयोग, इन दोनों ही में निःश्रेयस (उत्कृष्ट और श्रेष्ठ) को प्रदान करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में से कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है॥

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥5.3॥

जो व्यक्ति सदैव संन्यासी है, जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी के प्रति कामना करता है, हे महाबाहो! वह निर्द्वंद्व है क्योंकि बिना द्वंद्व के ही सुख से मुक्त हो जाता है॥

साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌ ॥5.4॥

भगवद गीता अध्याय 5 – बालबुद्धिवाले मानव संस्कृति और योग को अलग-अलग कहते हैं, परन्तु ज्ञानी लोग यह जानते हैं कि दोनों में से एक का सही रूप से पालन करने पर भी उत्तम फल प्राप्त होता है॥

यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥5.5॥

जो स्थान सांख्ययोग द्वारा प्राप्त होता है, वही स्थान योग द्वारा भी प्राप्त होता है। जो व्यक्ति एकमेव सांख्य और योग को देखता है, वही सच्चा दर्शनीय है॥

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥5.6॥

हे महाबाहो! सांख्यसन्न्यास तो योगविधि के बिना दुःख को प्राप्त करने का उपाय नहीं है, किन्तु योगयुक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है॥

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥5.7॥

जो व्यक्ति योगयुक्त है, उसका आत्मा शुद्ध है, वह अपने आत्मा को जीता हुआ है और इंद्रियों को जीता हुआ है। वह सम्पूर्ण भूतों का आत्मा, और सम्पूर्ण भूतों के आत्मा में भी नहीं लिपता है॥

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्‌ गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥5.8॥

जो योगी यह जानता है कि “मैं अपने कुछ भी नहीं करता हूँ”, वह सच्चे तत्त्वज्ञानी मानता है। वह देखता है, सुनता है, महसूस करता है, सूँघता है, खाता है, चलता है, चिल्लाता है और सांस लेता है, तौर-तरीके से नहीं करता है॥

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मि-षन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥5.9॥

सच्चे योगी अपने इंद्रियों को इंद्रियार्थों में व्याप्त होते हुए भी, बोलता है, छोड़ता है, धारण करता है, उठाता है, पुत्ताला होता है, पलकें झपकती हैं, यह सब करता हुआ भी यह जानता है कि इंद्रियाएं इंद्रियार्थों में व्याप्त हैं॥

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥5.10॥

भगवद गीता अध्याय 5 – जो व्यक्ति अपने कर्मों को ब्रह्म को अर्पित करके करता है, और फल की आसक्ति को त्यागकर करता है, वह पुनः पाप से बढ़ता हुआ कमलपत्र की भाँति किसी भी पाप से लिप्त नहीं होता॥

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥5.11॥

योगी शरीर, मन, बुद्धि, और केवल इंद्रियों के द्वारा कर्म करते हैं, परंतु वह सभी संबंधों को छोड़कर अपने आत्मा की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं॥

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥5.12॥

योगी कर्मफल को त्यागकर निष्ठा युक्त होकर शान्ति प्राप्त करता है, जबकि अयुक्त (भाग्यशाली) कामना के कारण फल में आसक्त होकर बँधा जाता है॥

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥5.13॥

योगी सभी कर्मों को मन से त्यागकर सुख में स्थित रहता है और शरीर में नौ द्वारों वाले नगर के रूपी शरीर को साकार रूप से कुछ नहीं करता॥

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥5.14॥

ईश्वर न कर्तृत्व को और न कर्मों को लोक के लिए उत्पन्न करता है, न ही कर्मफलों का संयोग होता है; परंतु स्वभाव ही क्रिया को प्रवर्तित करता है॥

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥5.15॥

भगवान सर्वव्यापी हैं और वह किसी के पाप को नहीं लेते और न किसी के सुकृत को भी। परंतु, अज्ञान से आवृत ज्ञान के कारण लोग भ्रमित हो जाते हैं॥

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥5.16॥

भगवद गीता अध्याय 5 – जिनका अज्ञान आत्मा में नष्ट हो गया है, उनका वह ज्ञान उनकी आत्मा को सूर्य की तरह प्रकाशित करता है, उससे परे ज्ञान है॥

तद्‌बुद्धयस्तदात्मानस् तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥5.17॥

जिनकी बुद्धि और आत्मा उसी में स्थित है, जो अद्वितीय हैं और जो उसी में निरंतर स्थित हैं, वे ज्ञान से अशुद्धता को हटा कर पुनरावृत्ति (संसार से मुक्ति) को प्राप्त होते हैं॥

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥5.18॥

जो व्यक्ति विद्या और विनय से सम्पन्न है, वह ब्राह्मण, गाय (गौ), हाथी (हस्ति), कुकुर (श्व), और श्वपाक (श्वपाक) में समदृष्टि रखने वाला पंडित है॥

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥5.19॥

जिनका मन समता में स्थित है, उनका यह संसार भी इसी में जीता जाता है, क्योंकि वह ब्रह्म में ही निर्दोष है, इसलिए वे ब्रह्म में स्थित हैं॥

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥5.20॥

जो व्यक्ति प्रिय वस्त्र, भोजन, और अन्य सुखों को प्राप्त होने पर प्रसन्न नहीं होता और अप्रिय वस्त्र, भोजन, और अन्य दुखों को प्राप्त होने पर उदासीन नहीं होता, वह स्थिर बुद्धि, मोहरहित, और ब्रह्म को जानने वाला है तथा वह ब्रह्म में स्थित है॥

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत् सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥5.21॥

जो अपने मन को बाह्य संवेदनाओं में आसक्त नहीं करता, वह अपने आत्मा में ही सुख प्राप्त करता है। ऐसा ब्रह्मयोगी, योग से युक्त अत्मा, अक्षय सुख को प्राप्त करता है॥

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥5.22॥

हे कौन्तेय (अर्जुन)! जो भोग संस्पर्श से होते हैं, वे सभी दुःख के ही कारण होते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि ये भोग आदि-अन्त वाले हैं, इसलिए उनमें रमने में उसको कोई आनंद नहीं होता॥

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥5.23॥

भगवद गीता अध्याय 5 – जो व्यक्ति इस शरीर को छोड़ने की प्राप्ति को पहले ही यहाँ कर लेता है, उसका काम और क्रोध उत्पन्न नहीं होता है, वह योगी आत्मा में स्थित रहकर सुखी होता है॥

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस् तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥5.24॥

जो अपने आत्मा में ही सुखी है, जो अपने आत्मा में ही रमणीय है, जो अपने आत्मा में ही प्रकाशमान है, वह योगी ब्रह्म की प्राप्ति करता है, ब्रह्म में स्थित हो जाता है॥

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥5.25॥

जो मुनियाँ अपने सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, जो अपने आत्मा में एकभाव रखते हैं और सभी भूतों के हित में रत रहते हैं, वे योगीजन ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं॥

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥5.26॥

जिनका मन काम और क्रोध से विमुक्त है, जिनकी चेतना शान्त है, ऐसे योगियों का ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त होता है, वे सच्चे आत्मज्ञानी हैं॥

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश् चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥5.27॥

बाह्य स्पर्शों को त्यागकर, बाह्य और अंतर्गत चक्षुओं को बंद करके, समान प्राण और अपान को सम करके, नासिका के बाहर और अंदर चरने वाले योगी॥

यतेन्द्रियमनोबुद्धि र्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥5.28॥

जो संत इंद्रियों, मन, और बुद्धि को नियंत्रित करके मुक्ति का परायण है, जो इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त है, वह सदा ही मुक्त है॥

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥5.29॥

जो सम्पूर्ण लोकों के ईश्वर और सभी भूतों के हितकारी यज्ञ और तपस्या का भोक्ता है, वह मुझे जानकर शान्ति को प्राप्त होता है॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥5॥

भगवद गीता अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग

दोस्तों आज हमने भगवद गीता अध्याय 5 के बारे में पढ़ा, अगले अध्याय में हम भगवत गीता अध्याय 6 के बारे में पढ़ेंगे, जय श्री कृष्णा।।।

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