भगवद गीता अध्याय 6 - ध्यानयोग

भगवद गीता अध्याय 6 – ध्यानयोग 🕉📖

भगवद गीता अध्याय 6 – दोस्तों, आज हम भगवद गीता अध्याय 6 के संबंध में जानेंगे, इससे पिछले आर्टिकल में हमने भगवद गीता अध्याय 5 के संबंध में जाना था।

श्रीमद् भगवद गीता का छठा अध्याय “ध्यानयोग” के रूप में जाना जाता है, जो योग की ध्यान प्रणाली को विस्तार से वर्णित करता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ध्यान की महत्वपूर्णता और ध्यान के द्वारा परमात्मा के साक्षात्कार की प्राप्ति के लाभ के बारे में बताते हैं।

इस अध्याय में योगी को अपने मन को नियंत्रित करने की उपायों और ध्यान के माध्यम से आत्मा का साक्षात्कार कैसे किया जा सकता है, यह सिखाया जाता है। भगवान कहते हैं कि सम्यक् ध्यान और समर्पण से योगी आत्मा के साक्षात्कार में सफल हो सकता है और उसे अनंत शांति का अनुभव हो सकता है।

इस अध्याय के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने के लिए ध्यान और योग के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझाया गया है, जो आत्मा के साक्षात्कार और आत्मनिरीक्षण की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं।

आइये पढ़ें:

श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥6.1॥

जो व्यक्ति कर्म करता है, परन्तु फलों की आशा नहीं करता, वह संन्यासी और योगी है, और वह अग्निरहित, क्रियाशून्य नहीं है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि वह व्यक्ति जो कर्म करता है, परन्तु फलों की आशा नहीं करता, वह संन्यासी और योगी है। यहां “संन्यासी” का अर्थ है जो फलों से अनासक्त है और “योगी” का अर्थ है जो कर्म में समर्पित है। इस श्लोक से यह सिखने को मिलता है कि सही दृष्टिकोण से कर्म करना और फलों की आशा नहीं करना व्यक्ति को संतुष्ट और मुक्त बना सकता है।

यं संन्यासमिति प्राहु र्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन॥6.2॥

जो कोई संन्यास को योग कहकर कहता है, ऐसे संन्यासी को ही योगी समझ, हे पाण्डव! क्योंकि जिसमें संकल्प का अभाव नहीं है, वही कोई योगी होता है॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि जो कोई संन्यास को योग कहकर कहता है, वही योगी समझा जाता है, परन्तु उसमें संकल्प का अभाव होना चाहिए। यह शोक सार्थक जीवन में अपने कार्यों को देखने का एक उपयुक्त दृष्टिकोण प्रदान करता है, जिससे योगी कैसे बनता है, यह समझा जा सकता है।

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥6.3॥

जो मुनि योग को प्राप्त होने का इच्छुक होता है, उसके लिए कर्म का साधन ही योग कारण है। योग में स्थित हुए व्यक्ति के लिए ही शम, अर्थात शान्ति, कारण होती है॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि जो व्यक्ति योग को प्राप्त होने का इच्छुक होता है, उसके लिए कर्म का साधन ही योग का कारण है। योगारूढ़ होने वाले व्यक्ति के लिए शम, अर्थात शान्ति, का साधन कर्म होता है। यह श्लोक साधनाओं और साधना के महत्व को समझाने में मदद करता है।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥6.4॥

जब व्यक्ति इंद्रियों के विषयों में किसी प्रकार का राग नहीं करता है और सम्पूर्ण संकल्पों का संन्यासी हो जाता है, वह योग में स्थित होने वाला कहा जाता है॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि जब व्यक्ति इंद्रियों के विषयों में किसी प्रकार का राग नहीं करता है और सम्पूर्ण संकल्पों का संन्यासी हो जाता है, तो वह योग में स्थित होने वाला कहलाता है। यह श्लोक सांख्य योग और कर्म योग के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धु रात्मैव रिपुरात्मनः॥6.5॥

भगवद गीता अध्याय 6 – व्यक्ति को अपने आत्मा को आत्मा से उबारना चाहिए, आत्मा को अपने द्वारा ही शोकित नहीं होना चाहिए। क्योंकि आत्मा ही आपका मित्र है और आत्मा ही आपका शत्रु है॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह सिखा रहे हैं कि व्यक्ति को अपनी आत्मा को अपने द्वारा ही उबारना चाहिए, और आत्मा को अपने द्वारा ही शोकित नहीं होना चाहिए। आत्मा ही व्यक्ति का सच्चा मित्र है और उसी ही उसका शत्रु है। यह श्लोक आत्मा के स्वरूप और आत्मा के साथ एकीभाव की महत्वपूर्णता को बताता है।

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥6.6॥

जो व्यक्ति अपनी आत्मा को आत्मा में ही जीत लेता है, उसका आत्मा उसका सच्चा मित्र बन जाता है। परंतु जो व्यक्ति अपनी आत्मा को नहीं जीतता, उसकी आत्मा उसका शत्रु बन जाता है, जैसे कि शत्रु उसके खिलाफ होता है॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि व्यक्ति को अपनी आत्मा को समझकर उसमें स्थित सार्वभौमिक सत्य को पहचानना चाहिए। जब व्यक्ति अपनी आत्मा को जीत लेता है, तो उसकी आत्मा उसका सच्चा मित्र बनती है, और उसे अपने शत्रुओं से नहीं डरना पड़ता।

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥6.7॥

जिसने आत्मा को जीता हुआ है, जो प्रशान्त है और जो परमात्मा में समाहित है, वह व्यक्ति शीत-उष्ण, सुख-दुःख, मान-अपमान के सभी परिस्थितियों में समान है॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा को जीत लेता है, उसकी मनोबल और आत्मा में स्थिति परमात्मा के साथ मिली रहती है। इसलिए, वह व्यक्ति सभी परिस्थितियों में समान बन जाता है और उसे शीत, उष्ण, सुख, दुःख, मान और अपमान के प्रति समानभाव बना रहता है।

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥6.8॥

जो आत्मा ज्ञान और विज्ञान से संतृप्त है, जो स्थिर रहकर सम्पूर्ण भूतों में समान भाव रखता है, जिसने अपने सभी इंद्रियों को जीत लिया है, वह ‘योगी’ कहलाता है और वह स्वरूप में एक है जैसे कि लोहे और सोने के मणि में कोई भेद नहीं होता॥”

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि एक सच्चे योगी वह है जो ज्ञान और विज्ञान से संतृप्त है, स्थिर रहकर सभी भूतों में समान भाव रखता है और जिसने अपने सभी इंद्रियों को जीत लिया है। वह योगी समलोहस्थाश्मकाञ्चन, यानी कि लोहे और सोने के मणि में कोई भेद नहीं करता, सभी को समान दृष्टि से देखता है॥

सुहृन्मित्रार्युदासीन मध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥6.9॥

जो व्यक्ति सुहृत् (अच्छे मित्र), मित्र (सामान्य मित्र), अर्य (श्रेष्ठ), उदासीन (निर्बाध), मध्यस्थ (मध्यस्थ), द्वेष्य (शत्रुता रखने वाला), बन्धु (बंधु) और साधु (भगवत-भक्त) सभी में समान दृष्टि रखता है, ऐसा व्यक्ति समबुद्धिवान योगी है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि एक सच्चे योगी वह है जो सुखी और शान्त है, जो सभी पर एक समान दृष्टि रखता है, चाहे वह सुहृत् हों या मित्र, अर्य या द्वेष्य, मध्यस्थ या बन्धु, या फिर साधु या पापी हों। उसकी बुद्धि समता और उदारता से भरी होती है॥

योगी युञ्जीत सततमा त्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥6.10॥

भगवद गीता अध्याय 6 – जो योगी निरंतर आत्मा को योग में लगाता है, शांतिपूर्वक अपने हृदय में स्थित रहता है, एकाकी रहता है, यत्न से मन को निग्रह करता है, निराशा रखता है और परिग्रह से विरक्त है, वह योगी सच्चे ध्यानी कहलाता है॥

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥6.11॥

शुद्ध और सुखद देश में एक स्थिर आसन पर बैठकर अपने शरीर को स्थिर कर, न तो बहुत ऊँचा और न ही बहुत नीचा, जूता, छाया और कुश की चटाई से ऊपर।

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्या द्योगमात्मविशुद्धये॥6.12॥

वहाँ एकाग्र मन से, जो चित्त और इंद्रियों के क्रियाओं को नियंत्रित करता है, उसे एकाग्र मन से योग करने के लिए उपविष्ट होकर आत्मा की शुद्धि के लिए योगी युज्य होता है।

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥6.13॥

अपने शरीर को समग्र, सिर, और ग्रीवा के साथ स्थिर रखकर, नासिका की ओर देखते हुए और अपने दृष्टि को एक निश्चित स्थान पर धारण करता हुआ, योगी आत्मा को ध्यान में लगाता है।

प्रशान्तात्मा विगतभी र्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥6.14॥

जो आत्मा शान्त है, भीरुता भूल चुका है, ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित है, मन को नियंत्रित करके मेरे में समर्पित है, ऐसा युक्त पुरुष मुझमें ही स्थित है।

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥6.15॥

जो योगी सदा इस प्रकार अपने आत्मा को नियंत्रित करता हुआ मेरे में एकाग्रचित्त होकर योगी बना रहता है, ऐसा योगी शान्ति और निर्वाण को प्राप्त होता है और मेरे परम आत्मा में स्थित होता है।

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥6.16॥

जो व्यक्ति बहुत खाता है वह योगी नहीं है, जो बहुत छोड़ता है वह भी नहीं है, न जो सोता है, न जो जागता है, वह योगी नहीं है, हे अर्जुन!

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥6.17॥

जो योगी युक्त आहार-विहार, युक्त चेष्टा कर्मों में, युक्त स्वप्न-जागरूकता में है, उसका योग सभी दुःखों को नष्ट कर देने वाला होता है।

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥6.18॥

भगवद गीता अध्याय 6 – जब मन सब प्रवृत्तियों से नियंत्रित होकर केवल आत्मा में स्थित रहता है और सम्पूर्ण कामनाओं से मुक्त होकर संतुष्ट रहता है, तब उसे ‘युक्त’ कहा जाता है॥

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥6.19॥

जैसे दीपक बिना हवा के स्थान पर स्थित रहकर शान्तिपूर्वक जलता है, ठीक वैसे ही योगी अपने मन को निग्रहाण करके ध्यान योग का अभ्यास करता है।

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥6.20॥

जहाँ साधक योग के साधना द्वारा अपने चित्त को निरोधित करके उपराम होता है और जहाँ वह अपने आत्मा को आत्मा में प्रकट होते हुए देखता है, वहाँ उस स्थान में उसका मन संतुष्ट होता है।

सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥6.21॥

जिस स्थान में यहाँ तक की बुद्धि भी नहीं पहुंचती, वहाँ जो अत्यन्त सुख है, जिसे बुद्धि ग्रहण करने में अतीन्द्रिय है, और जिसमें स्थित पुरुष तत्त्व से चलने वाला नहीं है, वह स्थान सच्चता में शान्तिपूर्ण है।

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥6.22॥

जिसको प्राप्त करके दूसरा लाभ नहीं होता, जिसके स्थिति में दुःख भी नहीं आता, ऐसे स्थान में स्थित पुरुष किसी भी दुःख से चचालित नहीं होता।

तं विद्याद्‌दुःखसंयोग वियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥6.23॥

उसे योग कहते हैं, जो दुःख और सुख के संयोग और वियोग को जानकर, निश्चयपूर्वक और अनिर्विण्ण चित्त से किया जाता है।

संकल्पप्रभवान् कामांस् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥6.24॥

सभी कामनाओं का सम्पूर्णतः त्याग करके मन को संयमित करके, इंद्रियों के समूह को मन में ही निग्रह करके विचार करने वाला योगी, संकल्पों के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले कामनाओं को सम्पूर्णतः त्यागकर, मन को ही इंद्रियों की सब शक्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है।

शनैः शनैरुपरमेद्‌ बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥6.25॥

धी और धृति से शीतल करके, स्वयं को आत्मा में स्थित मानकर कुछ भी न सोचे, विचारने में न लगे॥

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदा त्मन्येव वशं नयेत्॥6.26॥

भगवद गीता अध्याय 6 – जैसे जैसे मन और चित्त अस्थिर और चंचल हैं, वैसे वैसे उन्हें नियमित करके आत्मा में लगा दे, उस प्रकार आत्मा को निग्रहीत करे॥

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥6.27॥

जो योगी शान्त मन और शुद्ध चित्त होकर ब्रह्मभूत और कल्मशरहित है, वह श्रेष्ठ सुख को प्राप्त होता है॥

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शम त्यन्तं सुखमश्नुते॥6.28॥

जो योगी इस प्रकार निर्लिप्त आत्मा को सदा युञ्जता है, वह ब्रह्म की स्पर्शभावना से रहित, सर्व कल्मषों से मुक्त होकर अनंत सुख को प्राप्त होता है॥

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥6.29॥

जो योगी योग से युक्त होकर सम्पूर्ण भूतों के आत्मा में और सभी भूतों को अपने आत्मा में देखता है, वह सर्वत्र समदर्शी हो जाता है॥

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥6.30॥

जो व्यक्ति मुझे सर्वत्र और सभी को मुझमें देखता है, उसको मैं नष्ट नहीं करता और वह भी मेरे लिए नष्ट नहीं होता॥

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥6.31॥

जो व्यक्ति मुझमें एकान्त स्थिति से भक्ति करता है, वह सभी दिशाओं में स्थित होते हुए भी सदैव मेरे साथ योगी है॥

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥6.32॥

हे अर्जुन, सम्पूर्ण स्थितियों में आत्मा को सबके समान समझकर देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वही सबसे उत्तम योगी माना जाता है॥

अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥6.33॥

अर्जुन कहते हैं, हे मधुसूदन! जिस योग को आपने साम्य भाव से कहा है, मैं मन की अचंचलता के कारण उसकी स्थिति को नहीं देखता हूँ॥

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्‌दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥6.34॥

इसमें अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि मनुष्य का मन चञ्चल है, बलवान है, मजबूत है और उसे निग्रहित करना वायु को रोकने के समान कठिन है। इसका मतलब है कि मन को वश में करना भला कठिन है, लेकिन यह संभव है और इसके लिए साधना की जा सकती है।

श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥6.35॥

इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि मन को निग्रहित करना चाहिए, लेकिन यह कठिन है और चंचल है। महाबाहो (अर्जुन), बिना संशय के कहता हूँ कि मन चंचल और दुर्निग्रही है। इसे अभ्यास और वैराग्य से निग्रहित किया जा सकता है। इसमें अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से मन को वश में करने का सुझाव दिया गया है।

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥6.36॥

भगवद गीता अध्याय 6 – इसमें भगवान श्रीकृष्ण योग के महत्त्व को बता रहे हैं। उनका कहना है कि असंयत और आत्म-निग्रहरहित व्यक्ति के लिए योग कठिन है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति अपने मन को वश में नहीं कर सकता। उनका मत है कि योग सफलता प्राप्त करने के लिए आत्म-नियंत्रण और संयम की आवश्यकता है। जो व्यक्ति अपने मन को निग्रहित करके वश में करता है, वह योग के माध्यम से उच्च आत्मा की प्राप्ति कर सकता है।

अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥6.37॥

इसमें अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछ रहे हैं कि जो व्यक्ति योग का अभ्यास करता है, लेकिन अचल मन से विचलित हो जाता है और श्रद्धा से रहित है, वह योग सिद्धि को प्राप्त करने में किस गति को प्राप्त होता है? भगवान श्रीकृष्ण यहां बता रहे हैं कि ऐसा व्यक्ति योग सिद्धि को प्राप्त नहीं करता है, क्योंकि उसका मन अस्थिर होता है और उसमें श्रद्धा की कमी होती है। श्रद्धा, आत्मनिवेदन, और स्थिर मन के साथ योग साधने से ही सिद्धि प्राप्त हो सकती है।

कच्चिन्नोभयविभ्रष्ट श्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥6.38॥

इसमें अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछ रहे हैं कि योगी जो भी योग में समर्थ होता है, क्या उसके असफल होने पर वह उभयभ्रष्ट हो जाता है और वह विपरीत मार्ग में अस्थिर होता है, जैसे कि गगन में छिन्न आबरण शीतलता को नष्ट कर देता है? इस पर भगवान श्रीकृष्ण यह उत्तर देते हैं कि नहीं, जो योगी ब्रह्मपथ में चलता है, वह न तो अशुभ स्थितियों में गिरता है और न ही विपरीत मार्ग में अस्थिर होता है। वह महाबाहु (शक्तिशाली) है और उसकी निष्ठा अक्षय है, इसलिए वह अप्रतिष्ठित नहीं होता और ब्रह्मण के पथ में भटकता नहीं है।

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥6.39॥

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से यह कह रहे हैं कि वे संशय से उबरने के लिए उनसे ही मार्गदर्शन करने की आशा कर रहे हैं। यहाँ अर्जुन कहते हैं:

इसका सारांश है कि “हे कृष्ण! आपको छोड़कर मेरे इस संशय को सम्पूर्णतः दूर करने के लिए अन्य कोई छेत्ता नहीं है।” अर्जुन इस संशय से बाहर निकलने के लिए भगवान श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन की आशा कर रहे हैं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण उनको गीता के माध्यम से अनगिनत ज्ञान और उपदेश प्रदान करते हैं जिससे अर्जुन अपने संशयों को दूर कर सकता है।

श्रीभगवानुवाच

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्‌ दुर्गतिं तात गच्छति॥6.40॥

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संसार में भक्ति के माध्यम से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग बता रहे हैं। इस श्लोक में उन्होंने यह उपदेश दिया है:

पार्थ, इस संसार में उसका नाश नहीं है, जो भक्ति का अभ्यास करता है, क्योंकि यहां कोई भी कल्याण करने वाला पुरुष दुर्गति को नहीं प्राप्त होता॥

भगवान श्रीकृष्ण यहां अर्जुन को संसार में भक्ति के माध्यम से आत्मा का साक्षात्कार करने के लिए उत्तेजित कर रहे हैं और उन्हें सार्थक जीवन जीने के लिए आत्मा की सहायता से कर्म करने का आदर्श दिखा रहे हैं।

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानु षित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥6.41॥

वह व्यक्ति जो योग के मार्ग से भटक जाता है, पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होता है, वहां बहुत वर्षों तक निवास करता है और फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥6.42॥

या फिर, वह बुद्धिमान योगियों के कुल में ही जन्म लेता है, यह ऐसा दुर्लभ है क्योंकि इस तरह का जन्म लोक में बहुत दुर्लभ है॥

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥6.43॥

उस स्थिति में वह अपने पूर्वजन्म की बुद्धि संयोग को प्राप्त करता है और फिर बहुत यत्नपूर्वक उसमें संसिद्धि प्राप्त करने की कोशिश करता है, हे कुरुनन्दन (अर्जुन)॥

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥6.44॥

भगवद गीता अध्याय 6 – जो योगी पूर्व के साधना के बल से भी अनवश्यक रूप से हृदय में आत्मा को अवश्यंभाव में ला लेता है, वह ज्ञान की इच्छुकता रखने वाले के लिए भी शब्दब्रह्मा से अतीत हो जाता है॥

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥6.45॥

जो योगी प्रयत्नपूर्वक अपने मन को नियंत्रित करता है और सब पापों से शुद्ध है, वह बहुत जन्मों की साधना से सिद्ध होकर फिर परमगति को प्राप्त होता है॥

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥6.46॥

योगी वही है जो तपस्वियों से भी अधिक और ज्ञानीयों से भी अधिक, और कर्मकाण्डीयों से भी अधिक है। इसलिए, हे अर्जुन, तू योगी बन।

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥6.47॥

जो सभी योगियों के भी अंतर्मन में मेरे प्रति समर्पित रहता है, उसका मन पूर्ण श्रद्धा भाव से मुझे भजता है, वही मेरे लिए सबसे उत्तम योगी माना जाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः॥6॥

भगवद गीता अध्याय 6 – ध्यानयोग

दोस्तों, आज हमने भगवद गीता अध्याय 6 के संबंध में जाना, अगले भाग में हम भगवद गीता अध्याय 7 के बारे में जानेंगे।

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