भगवद गीता अध्याय 7 - ज्ञान विज्ञान योग

भगवद गीता अध्याय 7 – ज्ञान विज्ञान योग 🕉📖

दोस्तों, आज भगवद गीता अध्याय 7 के संबंध में पढ़ेंगे, पिछले आर्टिकल में हमने भगवद गीता अध्याय 6 के बारे में पढ़ा था।

भगवद गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने अनंत रूप और दिव्य गुणों के माध्यम से भक्तों को आत्मा और परमात्मा के साकार और निराकार स्वरूप का सुस्पष्ट विवेचन किया है।

इस अध्याय में भगवान ने सबकुछ सृष्टि से लेकर सृष्टि का कारण, भगवान का भक्तों के प्रति प्रेम, देवी-देवता पूजा, उन्नत भक्ति, दैहिक और अदैहिक सुख-दुःख, आदि के विषय में अनेक महत्वपूर्ण ज्ञान विस्तार से बताया है।

इस अध्याय में भगवान का अत्यन्त मधुर स्वभाव और अपने भक्तों के प्रति अनंत प्रेम का वर्णन किया गया है, जिससे भक्त अपने ईश्वर के प्रति अधिक श्रद्धा और प्रेम से भरा हृदय बना सके। यह अध्याय आत्मा की अमृत स्वरूपता और परमात्मा के साकार-निराकार स्वरूप को समझाने में मदद करता है और भक्तों को आध्यात्मिक सजीवन की मार्गदर्शन करता है।

आइये पढ़ें:

श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥7.1॥

इसका अर्थ है, “हे पार्थ! मेरे परायण होकर और आसक्ति रहित मन से योग को आचरण करना। बिना संदेह के, सम्पूर्ण रूप में मुझे कैसे जानोगे, वह सुनो।”

इस श्लोक से यह साबित होता है कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से योग के माध्यम से परमात्मा को पहचानने और समग्र ब्रह्म को समझने की प्रेरणा दे रहे हैं।

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥7.2॥

इसका अर्थ है, “मैं तुम्हें अब सम्पूर्ण और सविज्ञान ज्ञान बताऊंगा, जिसे जानकर इस संसार में फिर कुछ ज्ञान बचा नहीं रहेगा॥”

इस श्लोक से यह साबित होता है कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संसार में आगे बढ़ने के लिए अद्वितीय ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने का दृढ़ संकल्प कर रहे हैं। उनका उद्देश्य है कि अर्जुन एक आचार्य और योगी के रूप में आत्मा के साथ एकरूप होकर भगवद्गीता के माध्यम से सत्य का ज्ञान प्राप्त करे।

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥7.3॥

“मनुष्यों में हजारों में से कोई भी योगी सिद्धि के लिए यत्नशीलता रखने वाला कोई भी व्यक्ति हो सकता है, लेकिन उनमें से केवल कुछ ही सिद्ध पुरुष मुझे तत्त्व से जानते हैं॥”

इस श्लोक से यह सिद्ध होता है कि सच्चे ज्ञानी व्यक्ति होना किसी को भी सिद्धि की प्राप्ति में सक्षम बना सकता है, लेकिन भगवान की अद्वितीयता और तत्त्व को समझना बहुत अलग और अध्यात्मिक स्तर का ज्ञान है, जिसे केवल कुछ ही सिद्धपुरुष प्राप्त कर सकते हैं।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥7.4॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि सम्पूर्ण जगत् प्रकृति के अष्टाधिक भूतों से ही बना हुआ है। इसमें भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – ये सभी भिन्न-भिन्न तत्त्व हैं जो प्रकृति का हिस्सा हैं।

यह श्लोक प्रकृति के इन आठ घटकों की विवेचना करके हमें सार्वभौमिक और अद्वितीय प्रकृति की महत्ता को समझाता है और यह बताता है कि सभी जीवों और वस्तुओं का आदि प्रारम्भ प्रकृति से ही होता है।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥7.5॥

इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के दो प्रकारों का विवेचन कर रहे हैं।

भगवान कहते हैं कि इस सृष्टि में दो प्रकार की प्रकृतियाँ हैं – एक प्रकृति अपरा (अयमिता) और दूसरी प्रकृति परा (मामेतां)।

  1. अपरा प्रकृति (Apara Prakriti): यह प्रकृति मूल भूतों, मन, बुद्धि, अहंकार, पंचमहाभूत, इन्द्रियाँ आदि को आच्छादित करती है, जिससे यह सृष्टि बनी है। इस प्रकृति से जन्मित जीव शारीरिक और मानसिक कर्मों को अनुभव करता है।
  2. परा प्रकृति (Para Prakriti): भगवान कहते हैं कि उनकी परा प्रकृति, जो मुझमें है, अमर और अविनाशी है। यह प्रकृति है जिससे सभी जीवन उत्पन्न होता है और जिससे यह संसार धार्य है।

इस श्लोक से हमें यह सिखने को मिलता है कि सृष्टि का मूल कारण परमात्मा की परा प्रकृति है, जो अविनाशी और अमर है। इस परा प्रकृति में ही संसार का संरचना है और इससे ही सभी जीवन उत्पन्न होते हैं।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥7.6॥

भगवद गीता अध्याय 7 – इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने विश्वरूप को वर्णित कर रहे हैं और यह बता रहे हैं कि सभी भूत (सृष्टि के सभी जीवों और प्राणियों) उनकी योनियों से उत्पन्न होते हैं।

यहां “एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय” का अर्थ है – सभी भूत अपने योनियों से उत्पन्न होते हैं, और भगवान कहते हैं कि उनका यह रूप सभी भूतों के जन्म और सृष्टि के लिए उत्पन्न करने वाला है।

श्लोक में भगवान अपने अद्वितीय और अनंत स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं और बता रहे हैं कि सभी भूत उनसे ही उत्पन्न होते हैं और उनमें लीन होते हैं। वह सृष्टि का प्रभव (उत्पत्ति) और प्रलय (समाप्ति) है, जिससे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है और लीन होता है।

मत्तः परतरं नान्य त्किंचिदस्ति धनंजय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥7.7॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने परमात्मा स्वरूप की अद्वितीयता को सार्थक रूप से व्यक्त कर रहे हैं। इसका अर्थ है:

“धनंजय, मेरे सिवाय और कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। मेरे सर्वप्रभुता में सम्पूर्ण जगत् सूत्र-मणियों की भाँति मुझमें प्रवृत्त है, और सम्पूर्ण जीवन तथा सृष्टि मेरे आदि रूप से ही उत्पन्न होती है।”

इस श्लोक से भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनंतता और एकता को बता रहे हैं और यह कह रहे हैं कि सम्पूर्ण जगत् में कुछ भी ऐसा नहीं है जो उनसे अलग हो। उन्होंने अपनी अनंत सर्वशक्तिमानता को सूत्र-मणियों के समान जोड़ा है, जिनमें सम्पूर्ण जीवन का सूत्र बसा होता है। इसका तात्पर्य है कि वे सम्पूर्ण जगत् को अपनी एक सूत्र-मणि में बाँधे हुए हैं, जिससे सभी चीजें उत्पन्न होती हैं और उन्हें ही वे संचालित करते हैं।

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥7.8॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विश्वरूप स्वरूपता को सार्थक रूप से बता रहे हैं। इसका अर्थ है:

“हे कौन्तेय (अर्जुन)! मैं जल में रस हूँ, चंद्रमा और सूर्य में चमकने वाली प्रकाशरूपता हूँ। सम्पूर्ण वेदों में मैं ‘प्रणव’ हूँ, आकाश में शब्द और मनुष्यों में उत्साहपूर्ण और साहसपूर्णता हूँ॥”

इस श्लोक से भगवान श्रीकृष्ण अपने परमात्मा स्वरूप की अनंत विभूतियों को सार्थक रूप से बता रहे हैं। वे जल में रस, चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश, प्रणव रूप में वेदों में, आकाश में शब्द, और मनुष्यों में उत्साह और साहस के स्वरूप में हैं। इससे सार्थक रूप से भगवान का अनंतता और विविधता का स्वरूप समझा जा सकता है।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥7.9॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने विभूतियों को सार्थक रूप से बता रहे हैं। इसका अर्थ है:

“मैं पुण्यक्षेत्रों में गंध, पृथ्वी में तेज, सम्पूर्ण जीवनों में जीवन और तपस्वियों में तप हूँ।”

यहां भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों के माध्यम से अपने अनंत स्वरूप का बोध करा रहे हैं और यह दिखा रहे हैं कि वे सम्पूर्ण सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त हैं। गंध, तेज, जीवन, और तप के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अपनी महिमा और सार्थकता को सिद्ध करते हैं।

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥7.10॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं:

“हे पार्थ! सम्पूर्ण भूतों का आदिकारण मुझे सनातन बीज मानना चाहिए। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों की तेजस्वि तेज हूँ।”

यहां भगवान श्रीकृष्ण अपनी अविनाशी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ स्वरूपता को बता रहे हैं और यह सिद्ध करा रहे हैं कि उनकी शक्तियाँ और गुण सम्पूर्ण सृष्टि में समाहित हैं। वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का मूल हैं और सनातन बीज के रूप में ही समस्त भूतों का आदिकारण हैं।

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥7.11॥

भगवद गीता अध्याय 7 – इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं:

“हे भरतवंशी अर्जुन! मैं बलवानों का बल हूँ और विवेकी बुद्धि वालों की बुद्धि हूँ। मैं काम और राग से रहित हूँ और सभी भूतों में धर्म के अनुसार स्थित हूँ।”

यहां भगवान श्रीकृष्ण अपनी अद्भुत शक्तियों को बता रहे हैं और यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे समस्त बलवानों के बल और समस्त बुद्धिमानों की बुद्धि हैं। वे काम और राग से ऊपर उठे हुए हैं और सम्पूर्ण सृष्टि में धर्म के अनुसार स्थित हैं। इसके माध्यम से, भगवान अपने परमात्मा स्वरूप की महिमा को बता रहे हैं और अर्जुन को उस अद्भुत रूप में प्रकट होने की योजना के बारे में सूचित कर रहे हैं।

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥7.12॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ये सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भाव हैं, उनका वर्णन कर रहे हैं और कह रहे हैं:

भगवान श्रीकृष्ण यहां भावनाओं की त्रिविधता को सात्त्विक, राजसिक और तामसिक रूपों में विभाजित कर रहे हैं। ये भाव मानव मनोबुद्धियों में प्रकट होने वाले हैं और इनमें गुणों का अधीन रहता है। भगवान कह रहे हैं कि इन भावनाओं की उत्पत्ति और स्वभाव में मुझसे ही उत्पन्न होती है, लेकिन मैं इनमें नहीं हूँ। इसका अर्थ है कि यह भावनाएं भगवान के आत्मा स्वरूप से अलग हैं और उन्हें समझकर व्यक्ति अपने आत्मा को पहचान सकता है।

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥7.13॥
1

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह कह रहे हैं:

“सम्पूर्ण जगत् इन तीनों गुणों से रहित नहीं है, क्योंकि यह तीनों गुणों के अधीन हैं। लेकिन मैं, जो परम अविनाशी हूँ, इन गुणों से मोहित नहीं होता, और मुझे कोई भी नहीं जानता।”

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गुणत्रयविभागयोग के सिद्धांत को बता रहे हैं, जिसमें त्रिगुणात्मक प्रकृति द्वारा जगत् का उत्पत्ति होती है और लोग इस में मोहित रहकर आत्मा को नहीं जानते। भगवान कहते हैं कि वे अपरम अविनाशी हैं और गुणों से परे हैं, इसलिए उन्हें कोई नहीं जान सकता।

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥7.14॥

इसका अर्थ है:

“मेरी यह दैवी गुणमयी माया अत्यन्त दुर्गम है, लेकिन जो मुझसे शरण लेते हैं, वे इस माया को तारित कर जाते हैं॥”

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अपनी दैवी माया की महत्ता को बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इस माया से मुक्ति प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, लेकिन जो भक्त भगवान की शरणागति में आते हैं, वे इस माया को पार करके भगवान के पास पहुँचते हैं॥

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥7.15॥

भगवद गीता अध्याय 7 – इसका अर्थ है:

“मेरे प्रति पापकर्मी, मूढ़ और नीच कुलजन मुझसे शरण नहीं मांगते हैं, क्योंकि उनका ज्ञान मोहित हो गया है और वे आसुरी प्रवृत्ति को अपना रहे हैं॥”

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण दुष्कृतिनों, मूढ़ और नराधमाओं को आसुरी प्रवृत्ति के अनुयायी कह रहे हैं, जो अधर्मपरायण होकर भगवान की शरण नहीं लेते॥

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥7.16॥

इसका अर्थ है:

“हे अर्जुन! चार प्रकार के भक्त मुझे भजते हैं – जिनमें योग्यता है और जो पुण्यशील हैं। इनमें से कुछ भक्त मेरे पास आते हैं क्योंकि उन्हें संसार में कठिनाईयों से पीड़ा होती है, कुछ मुझसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते हैं, कुछ यहाँ इसलिए हैं कि उन्हें आर्थिक सुख की इच्छा है और कुछ मेरे आत्मज्ञान का अभ्यास करने के लिए आते हैं॥”

यह श्लोक भक्ति के विभिन्न रूपों को बताता है और यह दिखाता है कि भक्तियोग में विभिन्न प्रकार के भक्तों का स्वीकृति होता है॥

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥7.17॥

इसका अर्थ है:

“जिनमें नित्ययुक्त और एक रूप से भक्ति रखी गई है, वे ज्ञानी भक्त मुझसे विशेष रूप से प्रिय हैं, और मैं भी उन्हें अत्यंत प्रिय हूँ॥”

यह श्लोक ज्ञानी भक्तों की अद्भुत भक्ति और उनके आत्मसमर्पण को बताता है। ज्ञानी भक्त मुक्ति की प्राप्ति के लिए नित्य योग्य रहते हैं और उनमें एकरूपता की भावना होती है, जिससे भगवान का प्रति उनका समर्पण अधिक और विशेष होता है॥

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥7.18॥

इसका अर्थ है:

“सभी ये ज्ञानी भक्त उदार हैं, लेकिन मेरा मत है कि वे सभी मुझमें ही स्थित हैं, क्योंकि उनका युक्त आत्मा मेरी उत्कृष्ट गति की ओर ही प्रवृत्त होता है॥”

इस श्लोक से सार्थक ज्ञान और उदार भक्ति की महत्ता को बताया जाता है। यह भक्तियोग के माध्यम से अपनी आत्मा को परमात्मा में समर्पित करने वाले ज्ञानी भक्तों की महिमा को वर्णित करता है। इन भक्तों की आत्मा उद्दीपना, अनुभव, और अन्तकरण में स्थित योग्यता के साथ मुक्ति की ओर अग्रसर होती है॥

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥7.19॥

इसका अर्थ है:

“बहुतम जन्मों के बाद, जो व्यक्ति ज्ञानवान होता है, वह मुझसे शरण लेता है, और समझता है कि वासुदेव (भगवान कृष्ण) ही सब कुछ है। ऐसा महात्मा सुदुर्लभ होता है॥”

इस श्लोक से यह साबित होता है कि सच्चा ज्ञानवान व्यक्ति अनवरत जन्म-मरण के चक्र से बाहर निकलकर भगवान की शरण में जा सकता है और उसे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। ऐसा महात्मा सब कुछ देखने और समझने में सक्षम होता है और उसे परमात्मा का साक्षात्कार होता है॥

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥7.20॥

भगवद गीता अध्याय 7 – इसका अर्थ है:

“जिनका ज्ञान कामनाओं द्वारा हरा जाता है, वे मनुष्य अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं। वे प्रत्येक किसी एक देवता की शरण में जाकर अपनी भक्ति को नियमित करते हैं, परंतु यह सब उनकी स्वाभाविक प्रकृति के अनुसार होता है॥”

इस श्लोक से यह बताया जा रहा है कि जो व्यक्ति अज्ञान में दीवाना होता है और जिसे अपनी अहंकारी इच्छाओं ने अज्ञान में डाल दिया है, वह अन्य देवताओं की शरण में जा सकता है। इसे देवताओं की श्रद्धा और भक्ति के साथ नियमित रूप से पूजना चाहिए, लेकिन यह भक्ति साकार ब्रह्म, अर्थात परमात्मा की ओर परिणामी नहीं हो सकती है॥

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥7.21॥

इसका अर्थ है:

“जैसा-जैसा कोई भक्त मुझसे भक्ति भाव से किसी भी रूप में मेरी पूजा करना चाहता है, मैं उसकी उसी भावना को अचल श्रद्धा रूपी दृष्टि से विकसित करता हूँ॥”

इस श्लोक से यह सिद्ध होता है कि भगवान, जो अपने भक्तों के प्रति अत्यंत दयालु हैं, उन भक्तों की श्रद्धा को स्थिर करते हैं। भक्त जो भगवान की पूजा भावना से किसी भी रूप में उनकी श्रद्धा रखता है, वह विशेष रूप से उसी रूप में भगवान की कृपा प्राप्त करता है। यह श्लोक भक्ति और श्रद्धा के महत्व को बताता है और यह दिखाता है कि भगवान किसी भी रूप में अपने भक्तों के साथ स्थिरता और समर्पण से विकसित होते हैं॥

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥7.22॥

इसका अर्थ है:

“वह व्यक्ति जो उस श्रद्धा सहित युक्त है, उसका पूजन सार्थक होता है और उसे इसके परिणामस्वरूप मेरे द्वारा निर्धारित किए गए आशीर्वादों को प्राप्त होता है॥”

इस श्लोक से यह सिद्ध होता है कि भगवान के प्रति श्रद्धा रखने वाला भक्त, जब भगवान की पूजा भावना से उसकी सार्थक आराधना करता है, तो भगवान उसकी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। भगवान के साथ श्रद्धा और योग्यता से की गई भक्ति से ही व्यक्ति अपने उच्चतम परम लक्ष्य की प्राप्ति में सफल होता है॥

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥7.23॥

इस श्लोक का अर्थ है:

“जिनकी बुद्धि अल्प है, उनका फल भी अल्प ही होता है। देवताओं के पूजन में लगे हुए लोग देवताओं के पास, और मेरे भक्त मुझसे ही प्राप्त होते हैं॥”

इस श्लोक से यह सिद्ध होता है कि जो भक्त अल्पमेधावान होते हैं, उनकी उपासना से मिलने वाला फल भी सीमित होता है, क्योंकि उनकी बुद्धि अल्प है। हालांकि, जो मेरे भक्त मुझसे प्रेमभाव से जुड़े होते हैं, वे मुझसे ही सर्वोच्च आत्मा को प्राप्त होते हैं। इसका सारांश है कि अनंत ज्ञान और प्रेम से युक्त भक्ति के द्वारा ही सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति होती है॥

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥7.24॥

इस श्लोक का अर्थ है:

“जो मेरे परम अविनाशी और अनुत्तम स्वरूप को नहीं जानते, वे मुझे अव्यक्त का आवत्तन मानते हैं, जो मैंने इस व्यक्त सृष्टि में प्राप्त किया है। मेरा सच्चा और अनन्त भाव उनको अज्ञानी होने के कारण नहीं पता होता।”

यह श्लोक भगवान की अद्वितीय और अव्यक्त स्वरूप की महत्वपूर्णता को बताता है। भगवान का अव्यक्त और अद्वितीय स्वरूप हमारी बुद्धि से अतीत है और उसे समझने के लिए हमें आत्मज्ञान की प्राप्ति करनी चाहिए। यह शिक्षा हमें भगवान के अनंत और अविनाशी स्वरूप की ओर मुख करती है और हमें आत्मा के पारमार्थिक स्वरूप को समझने के लिए प्रेरित करती है।

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥7.25॥

इस श्लोक का अर्थ है:

“मैं सभी को प्रकाशित रूप में नहीं दिखता हूँ, क्योंकि मेरा योगमाया से आवृत है। यह मूढ़ लोग मुझे अजन्मा और अविनाशी नहीं जानते॥”

इस श्लोक में भगवान अपने अद्वितीय, अविनाशी, और अनन्त स्वरूप की महत्वपूर्णता को बता रहे हैं। वे योगमाया से आवृत हैं, इसलिए साधारित दृष्टि से उन्हें नहीं देखा जा सकता है। भगवान का सारा विश्व उनकी माया से आच्छादित है और मूढ़ लोग इस सत्यता को समझ नहीं पाते क्योंकि वे अज्ञान में हैं। यह श्लोक भगवान की परमात्मा की अद्वितीयता को स्पष्टता से प्रकट करता है।

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥7.26॥

भगवद गीता अध्याय 7 – इस श्लोक का अर्थ है:

“हे अर्जुन! मैं सभी भूत, वर्तमान, और भविष्य को जानता हूँ, परंतु मुझे कोई भी नहीं जानता॥”

यह श्लोक भगवान की अनन्तता और अद्वितीयता को सुबोध कराता है। भगवान वेदों के सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान स्वरूप में बता रहे हैं, जो समय के परे सभी भूतों का निर्माण, संस्थान, और संगरह करते हैं। वे सभी को जानते हैं, वे सभी वर्तमान में विद्यमान हैं, और वे सभी भविष्य को भी जानते हैं। लेकिन उन्हें कोई भी नहीं जान सकता, क्योंकि वे स्वयं अपने अतीत, वर्तमान, और भविष्य के बारे में सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं॥

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥7.27॥

इस श्लोक का अर्थ है:

“हे भारत! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न होने वाले द्वन्द्व और मोह के कारण सम्पूर्ण भूत इस संसार में मोहित हो जाते हैं।”

यह श्लोक मन, बुद्धि, और अहंकार के द्वारा उत्पन्न होने वाले इच्छा और द्वेष से जुड़े द्वन्द्व को और उससे उत्पन्न होने वाले मोह को बताता है। यह सांसारिक जीवन में मोह की प्रक्रिया को समझाता है और यह कहता है कि इस मोह से उत्पन्न होने वाले द्वन्द्वों के कारण मनुष्य संसार में फंस जाता है।

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥7.28॥

इस श्लोक का अर्थ है:

“जिनका पाप पूर्णतः समाप्त हो गया है और जो धर्मकारी हैं, वे मुझमें दृढ़ व्रत रखने वाले मुक्ति प्राप्त करने वाले हैं, क्योंकि उनका द्वन्द्व और मोह नष्ट हो गया है।”

यह श्लोक भक्ति योगीयों की महत्त्वपूर्ण गुणों की चर्चा करता है जो भगवान के प्रति निःसंग भाव से भजन करते हैं। इसमें पुण्यकर्मों द्वारा पापों का समाप्त होना और दृढ़ व्रत का महत्व है, जो व्यक्ति को द्वन्द्वों और मोह से मुक्त करता है। इसका सीधा संबंध भक्ति योग के साथ है, जिसमें भक्त भगवान के प्रति प्रेम और आसक्ति के साथ सेवा करता है।

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥7.29॥

इस श्लोक का अर्थ है:

“जो लोग जरा, मृत्यु और मोक्ष के लिए मुझमें शरण लेकर यत्नशीलता करते हैं, वे ब्रह्म को पूर्णतः जानते हैं, सम्पूर्ण आत्मा को और सभी कर्मों को भी॥”

यह श्लोक भगवान की अद्वितीयता और परम गति की ओर जाने के लिए सच्चे भक्तों के प्रयास की महत्त्वपूर्णता को बताता है। यह श्रद्धालुओं को जीवन के सम्पूर्ण पहलुओं में आत्मा और ब्रह्म की अद्वितीयता को समझने के लिए प्रेरित करता है। इसमें योगीयों को आत्मा के अंतर्निहित रहस्यों को जानने के लिए उत्साहित किया जा रहा है, जो जीवन को ब्रह्म और मोक्ष की दिशा में मुखरित करता है।

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥7.30॥

इस श्लोक का अर्थ है:

“जो भक्त यह जानते हैं कि मैं सभी प्राणियों में साधिभूत रूप से और अधिदैविक रूप से स्थित हूँ, और वे भी जो यज्ञ के माध्यम से मुझे जानते हैं, वे युक्तचेतस (योगी हृदय से सम्बंधित) होकर भी प्रयाणकाल में भी मुझे जानते हैं॥”

यह श्लोक भगवान के अपने भक्तों को बता रहा है कि वे जो साधना करते हैं, उन्हें अंतकाल में भी भगवान का दर्शन होता है और वे मोक्ष की प्राप्ति को प्राप्त करते हैं। यह श्लोक योगीयों को सच्ची भक्ति और साधना के माध्यम से अंतिम प्रयाणकाल में भी परमात्मा का अनुभव करने की अपेक्षा को बताता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥7॥

भगवद गीता अध्याय 7 – ज्ञान विज्ञान योग

महाभारत के भगवद गीता के सातवें अध्याय का समापन होता है जिसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने अद्वितीय स्वरूप का विवेचन करते हैं। इस योग के माध्यम से, भगवान ने अर्जुन को अपनी अनंत शक्ति, ज्ञान, और प्रेम का अद्भूत रहस्य बताया है।

इस अध्याय का समापन उन अनुयायियों के साथ होता है जो विश्वास और भक्ति से भगवान में लगे हुए हैं। भगवान की उपासना, भक्ति, और ज्ञान के माध्यम से व्यक्ति अपने आत्मा का साक्षात्कार करता है और उसे सर्वशक्तिमान भगवान के साथ एकीकृत महसूस होता है।

भगवान ने अर्जुन को अपनी महिमा, भक्ति, और अनंत कल्याण की व्याख्या करके सातवें अध्याय में सभी विद्याओं को समाप्त किया है। यहां समाप्त होने पर, अर्जुन ने अपने मार्ग पर बढ़ने का संकल्प किया है और भगवान की कृपा और मार्गदर्शन के साथ आत्मा के साक्षात्कार की ओर बढ़ता है।

इस रूप में, भगवद गीता का सातवां अध्याय समाप्त होता है, जिसमें अद्वितीयता, भक्ति, और ज्ञान की महत्ता को समझाने का प्रयास किया गया है। यह अध्याय भगवान की अनंत शक्ति और कल्याण की अमृत वाणी के माध्यम से जीवन को संजीवनी दे रहा है जो भक्ति और ज्ञान में रत होने वाले व्यक्तियों के लिए एक आदर्श मार्गप्रदर्शक है।

दोस्तों, इसके अगले भाग में हम भगवद गीता अध्याय 8 के बारे में पढ़ेंगे।

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