भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन 🏴󠁰󠁧󠁥󠁢󠁲󠁿

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन – दोस्तों, आज हम आधुनिक भारत के इतिहास के सबसे प्रथम विषय भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन के बारे में जानेंगे की कैसे और किन परिस्थितियों में ये कंपनियां भारत में आई थी। 

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भारत और यूरोप की परिस्थितियां 

जिस समय भारत में मुगल शासन चल रहा था और भारत अपने मध्य काल में था तब उस समय यूरोप में पुनर्जागरण का दौर चल रहा था अर्थात यूरोप अपने आधुनिकाल में था और वहां के लोगो के द्वारा नई भगौलिक खोजों की शुरूवात होने लग गई थी। 

भारत भी उस समय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से बहुत ज्यादा समृद्ध हो चुका था। 

सिंधु घाटी सभ्यता या प्राचीन काल से ही भारत का व्यापार यूरोपीय देशों से स्थलीय रास्तों के ज़रिये होता रहता था, परंतु बाद में कुछ कारणों की वजह से इन रास्तों में बहुत रुकावटें आने लग गई थी, जिस कारण यूरोपीय लोगों के द्वारा अन्य नए मार्गों की खोजें होने लग गई थीं। 

भारत और यूरोपीय देशों के व्यापार में रुकावटों के कारण 

कुस्तुनतुनिया, यह क्षेत्र यूरोप के पूर्वी भाग में तुर्की के अंतर्गत आता था।

1453 में अरबो द्वारा इस क्षेत्र में आक्रमण कर दिया जाता है और इस क्षेत्र में अरबो द्वारा विजय प्राप्त करके अपना अधिकार कर लिया जाता है।

इस कारणवश भारत और यूरोपीय देशों के बीच जो व्यापारिक संबंध स्थलीय रास्तों के ज़रिये बनते थे उनमे रुकावटें आना शुरू हो जाती है।

यूरोपियों द्वारा नई भगौलिक खोजों की शुरुवात 

अब क्यूंकि अरबो के कारण भारत और यूरोप में व्यापार में रुकावटें आने लग गई थी, इसलिए यूरोपियों द्वारा नई भगौलिक खोजों की शुरुवात होने लग गई थी ताकि व्यापार फिर से शुरू किया जा सके। 

इसमें सबसे पहले समुद्री रास्तों के जरिए नए-नए क्षेत्रों की खोज की शरुवात का प्रारंभ हुआ, इन खोजों में पुर्तगाल और स्पेन जैसे देश सबसे आगे थे। 

इसी क्रम में 1492 में स्पेन के कोलंबस ( Columbus ) ने भारत के लिए अपनी खोज की शुरुवात करी थी, परंतु वे भारत की तरफ आने की जगह अमेरिका की तरफ चले गए थे और तब भारत की जगह उन्होंने 1492 में अमेरिका की खोज कर दी थी। 

बाद में 1498 में पुर्तगाल के वास्को द गामा ( Vasco da Gama ) ने भी भारत के लिए अपनी खोज की शुरुवात करी, परंतु वे कोलंबस की तरह भारत की तरफ आने की जगह किसी दूसरी दिशा में नहीं गए और 1498 में उन्होंने भारत की खोज कर ली थी। 

इस क्रम में तब फिर अलग-अलग देशों ने भी समुद्री रास्तों के ज़रिये अपनी खोजों की शुरुवात कर दी थी और वे सब भारत में व्यापार करने के लिए आने लग गए थे और तब भारत में यूरोपीय कंपनियों के आगमन की शुरुवात होने लग गई थी।  

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन

दोस्तों, जैसे की हमने जाना की किन परिस्थितियों में और किन कारणों की वजह से यूरोपीय कंपनियों को समुद्री रास्तों के जरिये व्यापार के लिए खोजें करनी पड़ी थी।

बहुत सारे देश या कंपनियां उस समय भारत में व्यापार करने के लिए आये थे जैसे की स्पेन, डच, पुर्तगाल, ब्रिटेन, डेनमार्क, फ्रांस, परंतु इनमे से कुछ देशों की कंपनियां ही भारत में सुदृढ़ रूप से व्यापार कर पाई थी, जो कुछ इस प्रकार है:

यूरोपीय कंपनियों का भारत में आगमन का समयकाल

यूरोपीय कंपनियां कंपनियों का भारत में आगमन का समयकाल  
1. पुर्तगाल1498 
2. डच1595 
3. ब्रिटेन / अंग्रेज1600 
4. फ्रांस1664 
भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन – arrival of european companies in india in hindi

जैसे की हमने ऊपर जाना की पुर्तगाल के वास्को द गामा ने 1498 में भारत की खोज करी थी इसलिए पुर्तगाली सबसे पहले भारत में व्यापार करने के लिए आये थे। 

पुर्तगालियों के लगभग 100 वर्ष बाद डच कंपनी भी भारत में 1595 में व्यापार की दृष्टि से आते है, परंतु वे भारत से पहले इंडोनेशिया क्षेत्र से होते हुए भारत में व्यापार के लिए आते हैं। 

इसके कुछ ही समय बाद ब्रिटेन / अंग्रेजों का भी आगमन भारत में 1600 में हो जाता है। 

बाद में अंत में फ्रेंच कंपनी भी 1664 में भारत में व्यापार की दृष्टि से आ जाते हैं।   

दोस्तों, शुरुवात में तो ये कंपनियां भारत में सिर्फ व्यापार की दृष्टि से आती हैं, परन्तु बाद में भारत की समृद्ध अर्थव्यवस्था को देखते हुए ये कंपनियां भारत में अपने क्षेत्रों का विस्तार और अपने धर्मों का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर देती है। 

यूरोपीय कंपनियों का भारत में स्थापनाक्रम 

भारत की समृद्ध अर्थव्यवस्था के कारण इतनी सारी यूरोपीय कंपनियां भारत में आई, और भारत में सुदृढ़ रूप से व्यापार करने के लिए इन कंपनियों ने भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी-अपनी कंपनियों की स्थापना करी दी थी। 

इन कंपनियों को ईस्ट इंडिया कंपनी ( East India Company ) के नाम से संबोधित किया गया था और इन कंपनियों का स्थापनक्रम कुछ इस प्रकार है:

यूरोपीय कंपनियां कंपनी का स्थापना समय   
1. पुर्तगाली ईस्ट इंडिया कंपनी1498 
2. अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी1600 
3. डच ईस्ट इंडिया कंपनी1602 
4. फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी1664 
भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन – arrival of european companies in india in hindi

पुर्तगाली 1498 में भारत में आये, और उसी वर्ष उन्होंने अपनी स्थापना भारत में कर दी थी। 

अंग्रेजी कंपनी भी 1600 में भारत में आये थे,और उसी वर्ष महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम द्वारा 31 दिसंबर, 1600 में उन्होंने अपनी स्थापना भारत में कर दी थी। 

डच कंपनी भारत में 1595 में आये थे परंतु, उन्होंने अपनी स्थापना भारत में 1602 में करी थी, अर्थात डच कंपनी भारत में अंग्रेजों से पहले आई थी लेकिन उनकी स्थापना भारत में अंग्रेजों के बाद हुई थी। 

फ्रेंच कंपनी भारत में 1664 में आई, और उसी वर्ष अपनी स्थापना भारत में कर दी थी। 

यूरोपीय कंपनियों की प्रथम फैक्ट्रीयों का स्थान एवं स्थापना 

इन सारी यूरोपीय कंपनियों को भारत में सुदृढ़ व्यापार चलाने के लिए एक व्यापारिक केंद्र की आव्यशकता थी ताकि वे अच्छे ढंग से अपना व्यापार कर सकें और व्यापार बढ़ा भी सकें, इसलिए इन कंपनियों द्वारा अपने-अपने केंद्रों या फैक्ट्रीयों की स्थापना करी जाती है। 

इन कंपनियों ने अपने केंद्र या फैक्ट्रियों की स्थापना समुद्री किनारों के क्षेत्रों में करी थी, ताकि इन कंपनियों का आवागमन भी उनके अपने देशों के साथ आसानी से हो सके। 

इन कंपनियों के केंद्र या फैक्ट्रीयों का स्थान एवं स्थापनक्रम कुछ इस प्रकार हैं:

यूरोपीय कंपनियां फैक्ट्रीयों का स्थानफैक्ट्रियों की स्थापना का समय   
1. पुर्तगाली   कोचीन  1503 
2. अंग्रेज  सूरत  1608 
3. डच मसूलीपट्टम1605 
4. फ्रेंचसूरत 1668 
भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन – arrival of european companies in india in hindi

दोस्तों, जैसे की हमने ऊपर जाना की पुर्तगाली सबसे पहले भारत में केरल क्षेत्र में आये थे, इसलिए उन्होंने केरल क्षेत्र में ही कोचीन नामक स्थान में अपनी प्रथम फ़ैक्ट्री 1503 में स्थापित की थी। 

इसके बाद अंग्रेजों ने 1608 में सूरत में अपनी प्रथम फ़ैक्ट्री की स्थापना की थी, परंतु कुछ किताबों में या कुछ स्थानों में आपको यह लिखा मिलेगा की अंग्रेजों ने अपनी प्रथम फ़ैक्ट्री मसूलीपट्टम में स्थापित करी थी। 

इसका कारण यह है की अंग्रेज अधिकारियों ने उस समय के मुग़ल शासक जहाँगीर से फ़ैक्ट्री बनाने की अनुमति मांगी थी और 1608 में सूरत में फ़ैक्ट्री बनाने के कार्य की शुरुवात कर दी थी। 

परंतु कुछ कारणों की वजह से जहाँगीर ने अंग्रेजों का सूरत में फ़ैक्ट्री बनाने का कार्य रुकवा दिया था, इस कारणवश अंग्रेजों ने बाद में 1611 में मसूलीपट्टम क्षेत्र में अपनी फ़ैक्ट्री को स्थापित किया था। 

बाद में अंग्रेजों का सूरत में फ़ैक्ट्री बनाने का कार्य फिर से शुरू हुआ और 1613 में उन्होंने अपनी फ़ैक्ट्री बनाने का कार्य सूरत में भी पूर्ण कर लिया था। 

डचों ने भी मसूलीपट्टम क्षेत्र में ही 1605 में अपनी फ़ैक्ट्री की स्थापना करी थी। 

अंत में फ्रांसीसियों द्वारा भी भारत में 1668 में अपनी फ़ैक्ट्री की स्थापना सूरत में कर दी गई थी। 

इस प्रकार से इन यूरोपीय कंपनियों द्वारा भारत में व्यापार के लिए आगमन किया जाता है और अपनी-अपनी फैक्ट्रियों की स्थापना भारत में इन कंपनियों द्वारा की जाती है। 

दोस्तों, अब हम इन कंपनियों के भारत में कार्यों और इनके द्वारा भारत में क्या स्थितियां उत्पन्न हुई उनके बारे में जानेंगे।

पुर्तगाली ईस्ट इंडिया कंपनी  

जैसे की हमने ऊपर जाना की वास्को द गामा द्वारा भारत की खोज 1498 में करी जाती है और जिस समुद्री मार्ग से वास्को द गामा भारत आये थे, उस मार्ग को केप ऑफ़ गुड होप ( Cape of Good Hope ) के नाम से संबोधित किया जाता है। 

केरल के कालीकट बंदरगाह से वास्को द गामा भारत में आये थे और तब उस समय केरल के राजा ज़ामोरिन ने वास्को द गामा का स्वागत किया था। 

वास्को द गामा ने भारत से बहुत सारे मसाले, कपडे आदि लिए और इन सब चीजों को वे अपने साथ पुर्तगाल ले गए और वहां इन सब चीजों को उन्होंने बेचना शुरू किया। 

कहा जाता है वे जो चीजें भारत से लाये थे जैसे मसाले, कपडे आदि उन सब चीजों को बेचकर और उनके अपने खर्चों को निकालकर उन्हें लगभग 60 गुना मुनाफा हुआ था। 

इसको देखते हुए पुर्तगाल के दूसरे लोग भी बहुत प्रभावित हुए और वास्को द गामा के बाद पुर्तगाल के और भी लोग भारत में व्यापार की दृष्टि से आने लगे। 

वास्को द गामा के बाद 1500 ईस्वी में ही पुर्तगाल से दूसरा समूह पेड्रो अल्वारेस कैब्राल ( Pedro Alvares Cabral ) के नेतृत्व में भारत में व्यापार की दृष्टि से आया था। 

पेड्रो अल्वारेस कैब्राल भी भारत से बहुत सारी वस्तुएँ अपने साथ पुर्तगाल ले जाते हैं और वहां उन्हें बेचके अपना व्यापार करते हैं। 

इसके बाद फिर से वास्को द गामा 1502 में भारत में व्यापार की दृष्टि से आते हैं और भारत से बहुत सारी वस्तुएँ अपने साथ ले जाते हैं। 

इन सारी व्यापारिक क्रियाओं और उनकी सफलताओं को देखते हुए ही उस समय पुर्तगाल के राजशाही प्रशासन ने भारत में पुर्तगाल ईस्ट इंडिया कंपनी को और ज्यादा सहयोग दिया। 

पुर्तगाल के राजशाही प्रशासन ने पुर्तगाल से अपने अधिकारियों और वाइसराय को भेजा ताकि पुर्तगाली फैक्ट्रियां भारत में स्थापित की जाए और फैक्ट्रियों के स्थापना के संबंध में हमने अभी ऊपर जाना था। 

अलग-अलग क्षेत्रों में पुर्तगालियों ने अपनी फैक्ट्रियां स्थापित कर दी थी, इसके साथ-साथ पुर्तगालियों द्वारा भारत के कई क्षेत्रों पर भी कब्ज़ा करा जाता है, जैसे की हम जानते है की भारत की आज़ादी के समय भी गोवा, दमन और दीव जैसे क्षेत्र पुर्तगाल के कब्ज़े में ही थे। 

पुर्तगाल के राजा प्रिंस हेनरी के अभियान और बढ़ावे के कारण ही पुर्तगाल में बहुत सारी नई भगौलिक खोजों को बढ़ावा मिला था और पुर्तगालियों द्वारा विश्व के नए-नए क्षेत्रों की खोज अभियान चलाये गए थे, प्रिंस हेनरी को “द नेविगेटर” ( The Navigator ) के नाम से भी संबोधित किया जाता है। 

दोस्तों, जब हम वास्को द गामा द्वारा भारत की खोज की बात करते है तो इसका मतलब यह नहीं है की भारत की धरती कहीं खो गई थी और उसे वास्को द गामा द्वारा ढूंढ लिया गया, बल्कि भारत का इतिहास तो 5000 वर्ष पुराना है और रोमन सभ्यता और भारत की सिंधु घाटी सभ्यता एक दूसरे से प्राचीन काल से परिचित थे। 

इस बात से यह अभिप्राय है की समुद्री रास्तो में उस समय दिशा का अनुमान लगाना थोड़ा कठिन था और वास्को द गामा कोलंबस की तरह भटके नहीं और सही समुद्री रास्ते से भारत में प्रवेश करते हैं। 

पुर्तगाल के भारत में वाइसराय 

जैसे की हमने ऊपर जाना की वास्को द गामा, पेड्रो अल्वारेस कैब्राल आदि लोगों की भारत में व्यापारिक क्रियाओं और उनकी सफलताओं को देखते हुए पुर्तगाल के राजशाही प्रशासन ने अपने अधिकारी और वाइसराय की नियुक्ति कर के उन्हें भारत में पुर्तगाली कंपनी को सहयोग और बढ़ावा देने के लिए भेजा था। 

इन वाइसराय के द्वारा भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में पुर्तगाली फैक्ट्रियों को स्थापित किया गया था और इन वाइसराय के द्वारा अलग-अलग कार्य भी किये गए थे, यह पुर्तगाली वाइसराय कुछ इस प्रकार हैं:

फ़्रांसिस्को डी अल्मेडा ( Francisco de Almeida ) ( 1505 – 1509 )

फ़्रांसिस्को डी अल्मेडा भारत में पुर्तगाल के प्रथम वाइसराय के रूप में आते है, इनके ही काल में सबसे प्रथम पुर्तगाली कंपनी का भारत में विकास हुआ था। 

इनके द्वारा भारत में प्रथम बार एक अलग प्रकार की नीति चलाई गई थी, जिसे ब्लू वाटर पॉलीसी ( Blue Water Policy ) के नाम से जाना जाता है। 

इस ब्लू वाटर पॉलीसी के जरिए पुर्तगाली हिंद महासागर के क्षेत्र में अपना कब्ज़ा चाहते थे, ताकि उस क्षेत्र से होने वाला व्यापार उनके नियंत्रण में आ सके। 

फ़्रांसिस्को डी अल्मेडा ने अपने काल में पुर्तगालियों से भारत में टिकने का बढ़ावा दिया था और इसके साथ ही साथ फ़्रांसिस्को डी अल्मेडा के प्रयासों और ब्लू वाटर पॉलीसी जैसी नीतियों के कारण पुर्तगालियों का हिंद महासागर में प्रभुत्व बढ़ गया था। 

अफोंसो डी अल्बुकर्क ( Afonso de Albuquerque ) ( 1509 – 1515 )

फ़्रांसिस्को डी अल्मेडा के बाद अफोंसो डी अल्बुकर्क पुर्तगाल के वाइसराय के रूप में भारत आते है, और इन्होंने भारत में अलग-अलग क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने के प्रयास किये थे। 

इन्होंने ही भारत में पुर्तगाल के वाइसराय के रूप में आके पुर्तगालियों की स्थिति को भारत में और ज्यादा मजबूत और सुदृढ़ किया था और इन्हीं सब कारणों की वजह से इन्हें भारत में पुर्तगाल का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है।  

पुर्तगालियों ने जहां पर अपनी प्रथम फ़ैक्ट्री की स्थापना करी थी अर्थात कोचीन, उसको अफोंसो डी अल्बुकर्क द्वारा अपनी राजधानी बनाया गया था। 

इसके बाद अफोंसो डी अल्बुकर्क ने भारत में अलग-अलग अभियान करे और उन क्षेत्रों में पुर्तगालियों का कब्ज़ा कर लिया था। 

पहला अभियान 1510 में किया और उस समय के बीजापुर के शासक आदिल शाह से गोवा क्षेत्र को जीत लिया था और जब भारत को आज़ादी प्राप्त हुई उसके कई वर्षों के बाद तक भी पुर्तगालियों का ही कब्ज़ा गोवा पर था, बाद में चल कर 1961 में आज़ाद भारत द्वारा पुर्तगालियों से गोवा को वापस लिया गया था। 

इस प्रकार भारत में आने वाला पहला यूरोपीय देश पुर्तगाल था और सबसे बाद में जाने वाला यूरोपीय देश भी पुर्तगाल ही था। 

अफोंसो डी अल्बुकर्क के द्वारा भी फ़्रांसिस्को डी अल्मेडा की भाँती भारत में पुर्तगालियों की स्थिति को मजबूत और सुदृढ़ बनाने के लिए नीतियां चलाई गई थी। 

इन्होंने भारत में विवाह नीति की शुरुवात की, जिसमें पुर्तगाली लोग भारतीय महिलाओं से विवाह करते थे, जिससे पुर्तगाली संस्कृति का भारत में मिश्रण हो सके और पुर्तगालियों की स्थिति भारत में और अच्छी हो सके। 

इन नीतियों के लिए 3G शब्द का प्रयोग किया गया जिसका अर्थ था गॉड ( GOD ), गोल्ड ( GOLD ) और ग्लोरी ( GLORY )। 

गॉड ( GOD ) से यह अभिप्राय था की वे अपना ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार भारत में करना चाहते थे। 

गोल्ड ( GOLD ) से यह अभिप्राय था की उनका लक्ष्य धन, दौलत और संपत्ति बटोरना था। 

ग्लोरी ( GLORY ) से यह अभिप्राय था की यूरोप के अलग-अलग देशों में एक दूसरे से आगे जाने की प्रतिस्पर्धा थी, इसलिए सारे देश ज्यादा से ज्यादा भारत में अपने अपने कार्यों को बढ़ावा दे रहे थे। 

इन्हीं सब कारणों की वजह से अफोंसो डी अल्बुकर्क द्वारा भारत में विवाह नीति का प्रयोग किया गया था। 

नीनो-डी-कुन्हा ( Nino da Cunha ) 

इन्होंने अफोंसो डी अल्बुकर्क द्वारा बीजापुर के आदिलशाह से जीते हुए गोवा क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाया और वहां पर अपना कार्यालय क्षेत्र भी बनाया था और 1961 तक पुर्तगालियों का केंद्र गोवा ही बना रहता है। 

इन्हीं के समयकाल में 1535 में दीव क्षेत्र और 1559 में दमन क्षेत्र पर भी पुर्तगालियों ने कब्ज़ा कर लिया था और ये दोनों क्षेत्र भी गोवा की तरह ही 1961 तक पुर्तगाल के कब्ज़े में रहे थे।

बाद में जब दूसरी यूरोपीय कंपनियां भारत में आती है,  जिनके बारे में हमने ऊपर जाना था, उन कंपनियों के भारत आने के बाद से पुर्तगाल का प्रभुत्व भारत में कम होने लग गया था। 

पुर्तगाली कंपनी से जुड़े कुछ अन्य बिंदु 

1. पुर्तगालियों के द्वारा भारत में प्रिंटिंग प्रेस की शुरुवात करी गई थी, इसलिए पुर्तगालियों को भारत में प्रिंटिंग प्रेस का जनक माना जाता है। 

2. भारत में पुर्तगालियों के आने के बाद कुछ नई खेती की शुरुवात हुई थी, यह कुछ ऐसे फल या फसल आदि थे जिनकी खेती भारत में नहीं होती थी जैसे गन्ना, अनानास, पपीता आदि, ये चीजे पुर्तगाली अपने साथ भारत लाये थे, तब भारत के लोग इन चीजों को अच्छे से जानने लगे और इन चीजों की खेती की शुरुवात भारत में हुई थी। 

डच ईस्ट इंडिया कंपनी 

डच को हॉलैंड और नीदरलैंड जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है। 

1595 – 1596 में डचों द्वारा व्यापार की दृष्टि से पूर्वी एशिया की तरफ अपनी यात्रा प्रारंभ करी जाती है और सबसे पहले डच इंडोनेशिया में जाते हैं और डचों का यह समूह कॉर्नेलिस डी हाउटमैन ( Cornelis de Houtman ) के नेतृत्व में अभियान शुरू करता है। 

इंडोनेशिया में डचों ने मसालों का व्यापार किया था, वे इंडोनेशिया से मसाले ले जाकर यूरोप में बेचते थे और बहुत सारा मुनाफा कमाते थे और ठंडे क्षेत्र होने के कारण वहां मसालों की मांग भी बहुत थी। 

इसके बाद डच भारत में आये थे और उन्होंने भारत में वस्त्रों के व्यापार को ज्यादा महत्व दिया था क्यूंकि मसाले तो वे इंडोनेशिया से भी प्राप्त कर रहे थे। 

जैसे पुर्तगालियों ने यूरोप में भारत के मसालों को पहचान दिलवाई वैसे ही डचों ने यूरोप में भारत के वस्त्रों को पहचान अपने व्यापार से दिलवाई थी। 

परंतु डच कंपनियां भारत में ज्यादा समय तक नहीं टिक पाई थी क्यूंकि जब डचों के बाद अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार की दृष्टि से आती है तो वह भी अपना कार्य क्षेत्र बढाती है और इसी प्रक्रिया में 1759 में अंग्रेजों और डचों में वेदरा का युद्ध होता है जो बंगाल क्षेत्र में पड़ता है। 

इस युद्ध में अंग्रेजों ने डचों को पराजित कर दिया था और इस पराजय के बाद डचों की भारत में व्यापार करने की सारी उम्मीदें लगभग पूर्ण रूप से टूट गई थी। 

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी 

31 दिसंबर, 1600 को उस समय की ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ( Queen Elizabeth 1 ) ने ब्रिटिश कंपनी को पूर्वी क्षेत्रों की तरफ व्यापार करने के लिए भेजा था। 

ब्रिटिश कंपनी का नाम 1833 के चार्टर एक्ट के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी रख दिया था। 

जब महारानी एलिज़ाबेथ के द्वारा ब्रिटिश कंपनी की स्थापना हुई थी तब, भारत में उस समय मुग़ल शासक अकबर का दौर चल रहा था। 

ब्रिटिश सरकार ने कंपनी को 15 वर्ष का भारत में व्यापार करने का एकाधिकार ( Trade Monopoly ) दिया था, जिसे बार-बार समय आने पर ब्रिटिश सरकार द्वारा बढ़ाया भी जाता रहा था और चार्टर एक्ट 1813 तक बढ़ाया जाता रहा था, उसके बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा यह व्यापार करने का एकाधिकार ब्रिटिश कंपनी से वापस ले लिया गया था। 

बाद में 1603 में महारानी एलिज़ाबेथ की मृत्यु हो जाती है और उनकी मृत्यु के बाद ब्रिटेन के शासक जेम्स प्रथम ( James First ) बनते है। 

ब्रिटिश कंपनी को संभालने का कार्यभार जेम्स प्रथम के ऊपर आ जाता है और वे अपने एक दूत को भारत में भेजते है। 

भारत में अंग्रेजी राजदूत 

कैपटन हॉकिंस ( Captain Hawkins ) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राजदूत के रूप में भारत की ओर प्रस्थान करते हैं और 24 August 1608 में कंपनी का पहला जहाज़ जिसका नाम हेक्टर ( Hector ) था उसमे सूरत पहुँचते हैं। 

तब कैपटन हॉकिंस सूरत से April 16, 1609 को आगरा के मुग़ल दरबार में पहुँचते है, परंतु वे जब निकले थे तब भारत में मुग़ल शासक अकबर शासन कर रहे थे पर जब वे आगरा के मुग़ल दरबार में पहुंचे तब तक अकबर की 1605 में ही मृत्यु हो गई थी और तब जहाँगीर मुग़ल शासक बन चुके थे। 

कैपटन हॉकिंस वाले बिंदु को हमने हमारे जहाँगीर वाले आर्टिकल में भी जाना था। 

अंग्रेजों की तरफ से एक और राजदूत भारत में जहाँगीर के मुग़ल दरबार में 1615 में आते हैं, जिनका नाम सर टॉमस रो ( Sir Thomas Roe ) था, इनके बारे में भी हमने हमारे जहाँगीर वाले आर्टिकल में जाना था। 

अंग्रेजों की तरफ से ये दोनों राजदूत ब्रिटिश कंपनी के लिए मुग़ल शासक जहाँगीर से विशेष रियायतों के सिलसिले में मुग़ल दरबार में आये थे। 

1717 में भी एक राजदूत अंग्रेजों की तरफ से उस समय के मुग़ल शासक फर्रुखसियर के दरबार में कंपनी के लिए विशेष रियायतों के लिए भारत आते है, जिनका नाम जॉन सरमन था। 

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में शुरुवाती दौर 

जब ब्रिटिश कंपनी भारत में व्यापार की दृष्टि से आयी थी तब पहले से ही भारत में दूसरी यूरोपीय कंपनियां भारत में आ गई थी, जैसे की डच और पुर्तगाल। 

इस कारण ब्रिटिश कंपनी के लिए पहले से ही प्रतिस्पर्धा का माहौल भारत में बना हुआ था। 

परंतु शुरुवाती दौर में ही ब्रिटिश कंपनी को कुछ विशेष अधिकार मिल गए थे जो उनके लिए भारत में व्यापार सुदृढ़ करने की प्रथम सीढ़ी साबित हुई थी। 

यह विशेष अधिकार यह था की दक्षिण भारत में गोलकुण्डा के शासक द्वारा ब्रिटिश कंपनी को 1632 में एक सुनहरा फरमान दिया जाता है। 

इस सुनहरे फरमान की वजह से ब्रिटिश कंपनी को गोलकुण्डा में मुक्त व्यापार ( free trade ) करने की अनुमति मिल गई थी अर्थात ब्रिटिश कंपनी को गोलकुण्डा में व्यापार करने के लिए कोई कर ( tax ) नहीं देना था, इस अनुमति के लिए ब्रिटिश कंपनी ने गोलकुण्डा को कुछ मूल्य भी दिए थे। 

दूसरा अवसर ब्रिटिश कंपनी के लिए 1717 में आया था जब अंग्रेजों के राजदूत जॉन सरमन उस समय के मुग़ल शासक फर्रुखसियर के दरबार में जाते हैं और फर्रुखसियर भी उन्हें विशेष फरमान दे देते है।

फर्रुखसियर द्वारा उस फरमान में जो अधिकार ब्रिटिश कंपनी को दिए गए थे वे कुछ इस प्रकार है:

1. फर्रुखसियर ने ब्रिटिश कंपनी को 3000 रूपए वार्षिक कर ( tax ) के बदले में बंगाल के क्षेत्र में मुक्त व्यापार करने की अनुमति दे दी थी। 

2. फर्रुखसियर ने ब्रिटिश कंपनी को 10000 रूपए वार्षिक कर ( tax ) के बदले में सूरत के क्षेत्र में मुक्त व्यापार करने की अनुमति दे दी थी। 

3. इसके साथ इस फरमान में बम्बई के क्षेत्र में ब्रिटिश कंपनी के द्वारा कुछ सिक्के चलाये जा रहे थे, उन सिक्कों को इस फरमान के द्वारा पूरे भारत में ब्रिटिश कंपनी को चलाने की अनुमति दे दी गई थी। 

यह फरमान ब्रिटिश कंपनी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी क्यूंकि इस तरह का विशेष फरमान किसी भी यूरोपीय कंपनी को नहीं दिया गया था। 

फर्रुखसियर द्वारा इस विशेष फरमान को ब्रिटिश के इतिहास में “मैग्नाकार्टा” ( एक तरीके का अधिकार पत्र ) के नाम से संबोधित किया जाता है। 

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में सुदृढ़ होने के अन्य कारण 

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में सुदृढ़ होने का एक अन्य कारण यह भी था की ब्रिटेन और पुर्तगाल के बीच में वैवाहिक संबंध बन गए थे। 

1661 में उस समय ब्रिटेन के राजकुमार चार्ल्स द्वितीय ( Charles II ) थे और पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन ( Catherine ) थी, इन दोनों का 1661 में विवाह हो जाता है और इस प्रकार पुर्तगाल और ब्रिटेन के बीच वैवाहिक संबंध बन जाते है। 

इस वैवाहिक संबंध का फायदा ब्रिटिश कंपनी को भी हो जाता है, क्यूंकि जैसे की भारत में पुर्तगाली भी व्यापार कर रहे थे और पुर्तगाल के ब्रिटेन से वैवाहिक संबंध बनने के बाद पुर्तगाल ने अपने बम्बई के व्यापारिक क्षेत्र को ब्रिटेन को तोहफे में दे दिया था। 

इसके थोड़े समय के बाद 1668 में ब्रिटिश सरकार द्वारा 10 पौंड ( pounds ) के वार्षिक राशि के बदले में यह बम्बई का क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार करने के लिए दे दिया गया था।  

इस प्रकार यह क्षेत्र भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक क्षेत्र के अंतर्गत आ गया था और ब्रिटिश कंपनी की भारत में स्थिति बहुत ज्यादा मजबूत और सुदृढ़ हो गई थी। 

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का मुग़ल शासकों से संघर्ष 

जैसे की ब्रिटिश कंपनी को भारत में विशेष अवसर व्यापार करने के लिए मिल रहे थे और उनकी स्थिति भारत में मजबूत होती जा रही थी, इसलिए वे बाद में भारत के राजनीतिक मुद्दों और मुग़ल शासकों के कार्यों में हस्तक्षेप करने लग गए थे। 

ब्रिटिश कंपनी भारत में बम्बई आदि क्षेत्रों अर्थात भारत के पश्चिमी तटों में मुगलों के जहाजों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करने लग गए थे और इसके साथ बंगाल में हुगली नदी के क्षेत्र में भी अपना प्रभुत्व बढ़ाने लग गए थे। 

जिस समय ब्रिटिश कंपनी यह सब कार्य कर रही थी, उस समय औरंगज़ेब मुग़ल शासक थे। 

इन्हीं सब कारणों की वजह से मुग़ल शासक औरंगज़ेब और ब्रिटिश कंपनी के बीच संघर्ष का दौर शुरू हो जाता है और 1688 में औरंगज़ेब और सर जॉन चाइल्ड के बीच युद्ध की स्थिति बनती है और इसमें औरंगज़ेब को विजय प्राप्त होती है। 

ब्रिटिश कंपनी की इस हार के बाद मुगलों और अंग्रेजों के बीच संधि होती है और ब्रिटिश कंपनी को इसके बदले में मुगलों को जुर्माना भरना पड़ा था, तब कहीं ब्रिटिश कंपनी भारत में पुनः व्यापार करने की स्थिति में वापस आती है नहीं तो भारत में ब्रिटिश कंपनी को व्यापार करने के लिए बहुत रुकावटों का सामना करना पड़ता। 

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़े कुछ अन्य बिंदु 

जैसे की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव धीरे-धीरे भारत के अलग अलग क्षेत्रों में बढ़ने लग गया था और कई बार विशेष फरमान और विशेष अवसर ब्रिटिश कंपनी को मिल गए थे। 

इस कारण कई ऐसे क्षेत्र थे जहां ब्रिटिश कंपनी का प्रभुत्व और वर्चस्व बढ़ गया था। 

दक्षिण भारत के मद्रास क्षेत्र में ब्रिटिश कंपनी का प्रभाव बहुत बढ़ गया था, बम्बई क्षेत्र तो पहले से ही ब्रिटिश सरकार द्वारा ब्रिटिश कंपनी को व्यापार के लिए दे दिया गया था और बंगाल क्षेत्र में भी विशेष फरमानों द्वारा ब्रिटिश कंपनी का प्रभाव बहुत बढ़ गया था। 

इन तीनो क्षेत्रों में ब्रिटिश कंपनी ने अपनी तीन प्रेसीडेंसी ( presidency ) बना दी थी जो कुछ इस प्रकार है:

1. कलकत्ता प्रेसीडेंसी

2. बॉम्बे प्रेसीडेंसी 

3. मद्रास प्रेसीडेंसी 

अंग्रेजों की इन प्रेसीडेंसी में कलकत्ता प्रेसीडेंसी सबसे प्रथम प्रेसीडेंसी थी और इस प्रेसीडेंसी का अध्यक्ष अंग्रेजों ने आयर को बनाया था। 

इन क्षेत्रों में अंग्रेजों ने कुछ किलों का भी निर्माण करवाया था, वे किले कुछ इस प्रकार है:

1. फोर्ट सेंट जॉर्ज – यह किला अंग्रेजों ने मद्रास में बनवाया था। 

2. फोर्ट विलियम – यह किला अंग्रेजों ने कलकत्ता में बनवाया था। 

इस प्रकार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ही ऐसी यूरोपीय कंपनी थी जिसने भारत में इतना ज्यादा अपना प्रभुत्व बढ़ाया था। 

फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी 

जैसे की हमने ऊपर जाना था फ्रांसीसी कंपनी की भारत में स्थापना 1664 में हुई थी, उस समय फ्रांस में राजतंत्र चल रहा था और उस समय फ्रांस के राजा लुई XIV थे। 

इसके साथ हमने यह भी ऊपर जाना था की 1668 में फ्रांसीसियों ने अपनी प्रथम फैक्ट्री सूरत में स्थापित करी थी। 

इसके एक वर्ष बाद ही 1669 में इन्होंने अपनी दूसरी फैक्ट्री मसूलीपट्टम में स्थापित कर दी थी। 

फ्रांसीसियों ने भी पुर्तगालियों और अंग्रेजों की तरह भारत में अपना कार्य का विस्तार किया और भारत के क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने का कार्य शुरू कर दिया था। 

इस क्रम में इन्होंने 1673 में पोंडिचेरी क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा कर लिया था और भारत की आज़ादी तक यह क्षेत्र फ्रांसीसियों के कब्ज़े में था और भारत की आज़ादी के बाद 1954 में यह क्षेत्र भारत ने फ्रांसीसियों से वापस लिया था। 

इसके अगले ही वर्ष 1674 में फ्रांसीसियों ने दक्षिण भारत के चंद्रनगर क्षेत्र को भी अपने कब्ज़े में कर लिया था और इसके साथ साथ फ्रांसीसियों द्वारा माही एवं कारिकल नामक दो क्षेत्रों को भी अपने कब्ज़े में कर लिया गया था। 

पोंडिचेरी क्षेत्र में फ्रांसीसियों ने फोर्ट लुई नामक किला भी बनवाया था।

फ्रांसीसियों ने भी अंग्रेजों की तरह ही भारत के क्षेत्रों पर कब्ज़ा किया और भारत के राजनीतिक और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था। 

इस क्रम में अंग्रेजों के साथ फ्रांसीसियों का संघर्ष शुरू होने लग गया था और यह संघर्ष इतना बढ़ गया था की अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच 3 युद्ध हुए थे, इन युद्धों को “कर्नाटक युद्ध” के नाम से संबोधित किया जाता है। 

ये तीनों युद्ध अलग-अलग परिस्थिति में हुए थे और इनके परिणाम भी अलग-अलग हुए थे। 

कुछ छोटी कंपनियों का भारत में आगमन 

दोस्तों, कुछ छोटी कंपनिया भी भारत में व्यापार की दृष्टि से आयी थी, जैसे 1616 में डेनमार्क देश की डैनिश कंपनी भारत में व्यापार की दृष्टि से आयी थी और इन्होंने अपनी प्रथम फ़ैक्ट्री की स्थापना तमिलनाडु के तंजौर क्षेत्र में की थी। 

1731 में भारत में स्वीडिश कंपनी भी व्यापार की दृष्टि से आयी थी और यह भारत में आने वाली सबसे आखरी यूरोपीय कंपनी थी, परंतु इन्होंने भारत से ज्यादा चीन के साथ व्यापार करा था।

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न

सर्वप्रथम कौन सी यूरोपीय कंपनी भारत में आई थी ?

पुर्तगाल के वास्को द गामा ने 1498 में भारत की खोज करी थी इसलिए पुर्तगाली सबसे पहले भारत में व्यापार करने के लिए आये थे।

वास्कोडिगामा भारत में कब आया था ?

1498 में पुर्तगाल के वास्को द गामा ( Vasco da Gama ) ने भी भारत के लिए अपनी खोज की शुरुवात करी, परंतु वे कोलंबस की तरह भारत की तरफ आने की जगह किसी दूसरी दिशा में नहीं गए और 1498 में उन्होंने भारत की खोज कर ली थी।

यूरोपीय व्यापारियों के भारत आगमन का सही क्रम क्या है?

1. पुर्तगाल – 1498
2. डच – 1595
3. ब्रिटेन / अंग्रेज – 1600
4. फ्रांस – 1664

भारत आने वाले अंतिम यूरोपीय कौन थे?

1731 में भारत में स्वीडिश कंपनी भी व्यापार की दृष्टि से आयी थी और यह भारत में आने वाली सबसे आखरी यूरोपीय कंपनी थी, परंतु इन्होंने भारत से ज्यादा चीन के साथ व्यापार करा था।

ब्लू वाटर पॉलीसी क्या थी?

ब्लू वाटर पॉलीसी के जरिए पुर्तगाली हिंद महासागर के क्षेत्र में अपना कब्ज़ा चाहते थे, ताकि उस क्षेत्र से होने वाला व्यापार उनके नियंत्रण में आ सके।

भारत में सबसे पहले आने वाली यूरोपीय कंपनी और सबसे बाद में जाने वाली यूरोपीय कंपनी कौनसी थी?

भारत में आने वाला पहला यूरोपीय देश पुर्तगाल था और सबसे बाद में जाने वाला यूरोपीय देश भी पुर्तगाल ही था।

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