राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद – राष्ट्रवाद क्या है, भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण 🚩

राष्ट्रवाद – दोस्तों, आज हम राष्ट्रवाद और भारत में उसके उदय के कारणों के संबंध में जानेंगे। 

हम सब जब भी आधुनिक भारत के इतिहास में बहुत सारे आंदोलन, अलग-अलग महानायकों के भारत की स्वतंत्रता के लिए बलिदान और भारतीयों में एकजुटता के बारे में पढ़ते है तो उसमें एक भावना हमेशा समान रूप से चलती है और वो है राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद की भावना क्यूंकि उसके बिना इतने आंदोलन और संघर्ष कर पाना बहुत ही मुश्किल कार्य होता। 

राष्ट्रवाद क्या है 

राष्ट्रवाद क्या है, इसको हम सरल भाषा में यूँ समझ सकते है की किसी भी भौगोलिक सीमा क्षेत्र के अंतर्गत वहां के लोगों में एक दूसरे के लिए एकजुटता और आपसी समन्वय की भावना जो समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ती चली जाए उसे हम “राष्ट्रवाद” कहते हैं। 

इसमें लोगों के बीच सामाजिक रूप से, राजनीतिक रूप से, आर्थिक रूप से, सांस्कृतिक रूप से एकजुटता की भावना जब बनने लग जाती है तो उसे हम राष्ट्रवाद कहते हैं। 

दोस्तों, जब भी हम प्राचीन भारत और मध्यकालीन भारत के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तब हमें वहां क्षेत्रीय भावना देखने को मिलती है अर्थात उस काल में ज्यादातर राजा अपने ही क्षेत्र तक का हित देखते थे और भारतीय राजाओं में एकजुटता की पूरी कमी देखने को मिलती है। 

अगर भारतीय राजाओं में पहले ही राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न हो जाती तो भारत तो कभी गुलाम बनता ही नहीं और 1200 के आसपास से मुस्लिम आक्रमणों के बाद मुस्लिम राजाओं की गुलामी और उसके बाद अंग्रेजों की गुलामी यह सब राष्ट्रवाद की कमी के ही उदाहरण हैं। 

यह खोई हुई राष्ट्रवाद की भावना भारतीयों में एक बार फिर से 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में धीरे-धीरे जागने लग गई थी, जो बाद में जाकर इतना बड़ा रूप ले लेता है की फिर अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्रता देनी ही पड़ी थी। 

राष्ट्रवाद के तत्व 

राष्ट्रवाद के कुछ ऐसे तत्व होते हैं, जिनके कारण लोगों में एकता की भावना उत्पन्न होने लग जाती है, आइये उन तत्वों पर दृष्टि डालें:

भौगोलिक सीमा 

इसके बारे में हमने ऊपर चर्चा की थी कि किसी भी भौगोलिक सीमा क्षेत्र में वहां के लोगों में एकता की भावना होना। 

ऐतिहासिक विकास प्रक्रिया 

राष्ट्रवाद एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली विकासशील प्रक्रिया है, जो समय के साथ बढ़ते और घटते हुए लोगों के अंदर जन्म लेती है। 

विभिन्न संप्रदायों के बीच विभिन्न आधार पर एकता 

अलग-अलग संप्रदायों के बीच सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक दृष्टिकोण के आधार पर एक दूसरे से एकता की भावना का जन्म लेना। 

जब यह राष्ट्रवाद के तत्व मिलते हैं तब वहां के लोगों में एकता की भावना उत्पन्न होती है। 

भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण 

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब भारत में राष्ट्रवाद की भावना लोगों में धीरे-धीरे बढ़ने लग गई तब इसने एक राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का रूप ले लिया था, परंतु ऐसे क्या कारण रहे जो यह एकता की भावना भारतीयों में उत्पन्न होने लग गई थी, आइये उन कारणों पर दृष्टि डालें:

राजनीतिक कारण 

1. 1857 की क्रांति 

हमने हमारे 1857 की क्रांति वाले आर्टिकल में भी जाना था की कैसे 1857 में भारतीयों में अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ गुस्सा फूटा और एक अच्छे मनोबल और अपनी भूमि के लिए प्रेम, यह सब भारतीयों में प्रारंभ में राष्ट्रवाद के उदय का कारण बना। 

2. 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 

1857 की क्रांति के बाद भारत में जब छोटे-छोटे दल बनने लगे, तब इस क्रम में 1885 में एक बड़े दल या संगठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई जिसने भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने का प्रयास किया था। 

कांग्रेस ने भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अधिवेशन करके वहां के लोगों को आपस में जोड़ने का प्रयास किया और इसके साथ अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदाय के लोगों को उन अधिवेशनों में अध्यक्ष बनाया ताकि भारतीयों में इस स्वतंत्रता संग्राम को लेकर अपनापन दिखाई दे। 

इस कारण कांग्रेस की स्थापना होना और उसके भारत के लोगों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए उनमें एकता की भावना पैदा करना भी भारतीयों में राष्ट्रवाद के उदय का कारण बना था। 

3. ब्रिटिश शोषक नीतियां 

इसमें अग्रेजों की ऐसी नीतियां थी जिस कारण भारतीय प्रताड़ित हो रहे थे और उन नीतियों से आज़ाद होने के लिए भारतीयों में एकता का उदय हुआ था। 

जैसे लार्ड डलहौज़ी की हड़प नीति जिसकी वजह से भारतीय रियासतों पर अंग्रेज कब्ज़ा करते जा रहे थे, इस हड़प नीति के विरोध में भारतीय रियासतों में विद्रोह की भावना उत्पन्न हुई थी और इसी प्रकार से वेलेज़ली की सहायक संधि जिस से अंग्रेज भारतीय राजाओं को अपने अधीन करते जा रहे थे। 

इसके अलावा इल्बर्ट बिल विवाद के कारण भी भारतीयों में स्वदेश प्रेम जाग उठा था। 

इसके अलावा ब्रिटिश सरकार द्वारा रॉलेट एक्ट लागू करना भी एक कारण बना। 

इन्हीं सब अंग्रेजों की बहुत सारी शोषक नीतियों से परेशान और प्रताड़ित होकर भारतीयों में एकता का उदय हुआ और इस प्रकार सिर्फ भारतीयों के प्रयासों से ही नहीं बल्कि अंग्रेजों की शोषक नीतियों के वजह से भी भारतीयों में राष्ट्रवाद का उदय हुआ था। 

आर्थिक कारण 

भारत में उस समय दो प्रमुख क्षेत्र थे, जो भारत के आय का स्त्रोत थे और वे थे कृषि और उद्योग क्षेत्र। 

अंग्रेजों ने इन दोनों क्षेत्रों में भी ऐसी नीतियां चलाई जिस कारण भारतीय प्रताड़ित होने लग गए थे। 

अंग्रेजों के द्वारा कृषि के क्षेत्र में बंदोबस्त की नीतियां शुरू कर दी थी जैसे स्थाई बंदोबस्त, महालवाड़ी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी बंदोबस्त और इन सारी व्यवस्थाओं के चलते किसान वर्ग बहुत प्रताड़ित होने लग गया था और इस कारण भारत कच्चे माल का उत्पादक और तैयार माल का बाजार बन गया था। 

दूसरी तरफ उद्योग क्षेत्र भी अंग्रेजों की नीतियों के कारण प्रताड़ित होने लग गया था, जो लघु उद्योग भारत में चला करते थे वे धीरे-धीरे समाप्त होने लग गए थे क्यूंकि अंग्रेजों द्वारा यूरोप में तैयार माल को भारत में लाया जाता था और बेचा जाता था जिससे भारत में बने उत्पादों की लोकप्रियता कम होती चली गई थी। 

इस प्रकार कृषि और उद्योग क्षेत्र के लोगों में अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ राष्ट्रवाद का उदय होना शुरू हो गया था। 

इसके साथ-साथ दादाभाई नौरोजी द्वारा “धन के निष्कासन का सिद्धांत” दिया गया जिससे भारतीयों को समझ आ गया था की अंग्रेज भारत में भारतीयों की भलाई के लिए नहीं बल्कि भारत का धन लूटकर अपने देश ले जाने आए हैं और भारतीयों का शोषण करने हेतु भारत आए हैं, इस कारण भी भारत में एकता की भावना का उदय होना शुरू हो गया था। 

सामाजिक कारण 

आधुनिक भारत के इतिहास में हमें यह भी देखने को मिला की भारत में सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन भी चलाए गए थे। 

राजाराम मोहन रॉय, स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और ईश्वर चंद विद्यासागर जैसे महानायकों ने यह सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों को चलाया था, जिसमें उन्होंने समाज में चल रही बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया था। 

इन महानायकों के इन सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों को चलाने के क्रम उन्होंने जो एकता की भावना और भारत के लिए प्रेम का संचार भारतीयों में किया, उसके कारण भी भारत के लोगों में एकता की भावना का उदय होना शुरू हो गया था। 

दयानन्द सरस्वती ऐसे समाज सुधारक के रूप में सामने आए जिनका योगदान इन सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों में सबसे ज्यादा रहा था। 

दयानंद सरस्वती द्वारा अपने विचारों के प्रचार और भारतीयों में संचार करने के क्रम में “वेदों की ओर लौट चलने” की बात कही, जिसका तात्पर्य था की भारतीयों को अपनी स्वदेशी व्यवस्था से प्रेम करना चाहिए न की पश्चिमी देशों की व्यवस्था से। 

उन्होंने यह भी कहा की “बुरा से बुरा स्वदेशी शासन भी किसी विदेशी शासन से अच्छा है”, इसके साथ उन्होंने यह भी कहा की “भारत भारतीयों के लिए है

दयानन्द सरस्वती जी ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की थी। 

इन्हीं सब विचारों और सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों के कारण भारत में राष्ट्रवाद का उदय हो रहा था। 

सांस्कृतिक कारण 

इसमें बहुत से कारण रहे जिनकी वजह से भारत में राष्ट्रवाद का उदय हुआ था, इन सांस्कृतिक कारणों में कुछ ऐसे ब्रिटिश नीतियां भी थी जो अंग्रेजों ने अपने हितों के लिए लागू की थी, परंतु उन नीतियों ने भारत के लोगों में एकता की भावना को भी पैदा किया था। 

जैसे अंग्रेजों ने भारतीयों को अपने कार्यक्षेत्रों में काम करने के योग्य बनाने के लिए और अपने विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए भारत में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा की शुरुआत करी थी और जैसे की भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती थी जो वर्तमान समय में भी हमें देखने को मिलता है, उसकी वजह से भारतीयों में संवादहीनता देखने को मिलती थी। 

ऐसे में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा ने भारत में एक भाषा का संचार किया जिस कारण भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के लोग आपस में एक ही भाषा में बोल सकते थे और एक दूसरे की भावनाओं को समझ सकते थे जिस कारण भारतीयों में परोक्ष रूप ( indirectly ) से एकता बढ़ने लग गई थी। 

इसके साथ-साथ इस आधुनिक शिक्षा के कारण भारतीयों को विदेशों का ज्ञान भी मिला जैसे विदेशों में हुई क्रांतियाँ, जिसकी वजह से भी परोक्ष रूप ( indirectly ) से भारतीयों में एकता का उदय हुआ था। 

इसके साथ-साथ इस आधुनिक शिक्षा को प्राप्त करने के बाद भारतीयों ने समाचार पत्र और पत्रिकाएं निकालना भी शुरू कर दिया था जिसके कारण वे अपने विचारों को दूसरों के समक्ष ज्यादा प्रभावशाली रूप से रख सकते थे और जैसे की भारत के महानायकों ने भी अपने-अपने समाचार पत्र और पत्रिकाएं निकाली जिससे भारत में एकता की भावना का उदय हुआ था। 

इसके अलावा अंग्रेजों का भारत में रेल का चलाया जाना जो उन्होंने अपने हितों के लिए किया था उसने भी परोक्ष रूप ( indirectly ) से भारतीयों में एकता की भावना का उदय किया। 

जैसे की अंग्रेजों ने रेल को भारत में तैयार हुए कच्चे माल को बंदरगाहों तक लाने और तैयार माल को बंदरगाहों से ले जाकर भारत के विभिन्न क्षेत्रों तक ले जाने और अपने संचार माध्यम के लिए शुरू किया था, परंतु इसी रेल व्यवस्था ने भारतीयों को भी एक दूसरे से काफी हद तक जोड़ने का काम किया और एकता को उदय होने में इसकी वजह से काफी सहायता मिली थी। 

इसके अलावा बहुत से विभिन्न सांस्कृतिक महोत्सव भी हुए थे जिसकी वजह से लोगों में जुड़ाव हुआ और एकता की भावना पैदा होने लगी जैसे की बाल गंगाधर तिलक द्वारा महाराष्ट्र में शिवाजी और गणेश महोत्सव जैसे कार्यक्रम चलाए गए जिसकी वजह से भी भारतीयों में राष्ट्रवाद का उदय हुआ था। 

विदेशी कारणों की भूमिका 

दोस्तों, अभी तक हमने भारत में राष्ट्रवाद के उदय होने के ऐसे कारणों के बारे में जाना जो भारत के अंदर हो रहे थे, परंतु कुछ ऐसे विदेशी कारण भी थे जिनकी वजह से भारतीयों में एकता की भावना पैदा हुई थी, आइये उन विदेशी कारणों पर दृष्टि डालें:

1776अमेरिका को स्वतंत्रता प्राप्त होना
1789फ्रांस की क्रांति
1894 – 1895जापान की चीन पर विजय प्राप्त होना
1904 – 1905जापान की रूस पर विजय
राष्ट्रवाद क्या है

1776 में अमेरिका को ब्रिटेन से आज़ादी प्राप्त हुई थी, जिसकी वजह से कहीं न कहीं भारतीयों में भी यह भावना पैदा हो रही थी की यदि अमेरिका को आज़ादी प्राप्त हो सकती है तो भारत को भी आज़ादी प्राप्त हो सकती है। 

1789 में फ्रांस की क्रांति हुई और इस क्रांति से समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे विचारों का संचार पूरे विश्व में हुआ जिसकी वजह से भारतीयों में भी एकता की भावना उत्पन्न हुई। 

इसके अलावा जापान जैसे छोटे से देश का 1894 – 1895 में चीन जैसे देश पर विजय प्राप्त करना और 1904 – 1905 में रूस जैसे विशाल देश पर विजय प्राप्त करने जैसी घटनाओं ने भारतीयों को भी यह अहसास दिलाया की एक छोटी शक्ति भी बड़ी शक्ति पर भारी पड़ सकती है, जिसकी वजह से भी भारतीयों में एकता की भावना का उदय हुआ था। 

इस प्रकार भारतीयों में राष्ट्रवाद का उदय होना और इसका ऐसा व्यापक रूप आगे बढ़ा की, आखिर में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हो गई थी और वर्तमान समय में भी इस एकता की भावना की वजह से हमारा प्यारा भारत एक मजबूत राष्ट्र और अखंड भारत बनकर दुनिया को चुनौती दे रहा है। 

भारतीय राष्ट्रवाद और यूरोपीय राष्ट्रवाद में अंतर 

भारत का राष्ट्रवाद सांस्कृतिक और भावनात्मक जैसे आधारों से जुड़ा है, जबकि यूरोपीय राष्ट्रवाद आर्थिक और भौतिक आधारों से जुड़ा है। 

इसका तात्पर्य यह है की यूरोप के लोगों में आर्थिक और भौतिक चीजों जैसे कारणों की वजह से वहां राष्ट्रवाद का उदय हुआ था और भारत में उसकी संस्कृति और भावनाओं जैसी चीजों की वजह से यहाँ राष्ट्रवाद का उदय हुआ था। 


हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई राष्ट्रवाद क्या है इसके बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न

राष्ट्रवाद से क्या अभिप्राय है?

राष्ट्रवाद क्या है, इसको हम सरल भाषा में यूँ समझ सकते है की किसी भी भौगोलिक सीमा क्षेत्र के अंतर्गत वहां के लोगों में एक दूसरे के लिए एकजुटता और आपसी समन्वय की भावना जो समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ती चली जाए उसे हम राष्ट्रवाद कहते हैं।

राष्ट्रवाद कब शुरू हुआ?

यह खोई हुई राष्ट्रवाद की भावना भारतीयों में एक बार फिर से 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में धीरे-धीरे जागने लग गई थी, जो बाद में जाकर इतना बड़ा रूप ले लेता है की फिर अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्रता देनी ही पड़ी थी। 

भारत में राष्ट्रवाद के क्या कारण थे?

1. राजनीतिक कारण
2. आर्थिक कारण
3. सामाजिक कारण 
4. सांस्कृतिक कारण
5. विदेशी कारणों की भूमिका

भारतीय राष्ट्रवाद और यूरोपीय राष्ट्रवाद में क्या अंतर है?

भारत का राष्ट्रवाद सांस्कृतिक और भावनात्मक जैसे आधारों से जुड़ा है, जबकि यूरोपीय राष्ट्रवाद आर्थिक और भौतिक आधारों से जुड़ा है। 

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