भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम – भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु 💪

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम – दोस्तों, आज हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम के संबंध में चर्चा करेंगे, जैसे की हमने हमारे पिछले आर्टिकल्स में जाना की कैसे 1857 की क्रांति और बहुत सारी घटनाओं से भारत में राष्ट्रवाद उत्पन्न होने लग जाता है। 

भारत का प्रथम संग्राम 1857 की क्रांति को माना जाता है।

शुरुआत में उदारवादी नेताओं का प्रभाव इस संघर्ष में ज्यादा था, बाद में क्रांतिकारी नेता जैसे लाल बहादुर शास्त्री, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल उनका प्रभाव भारत के स्वतंत्रता संग्राम में दिखाई देता है, जिससे यह आंदोलन अलग रूप ले लेता है। 

इसके बाद गांधी युग की भी शुरुआत हो जाती है, जो गांधी जी के जीवन और उनकी विचारों से प्रेरित था। 

परंतु गांधी युग के साथ-साथ इससे अलग एक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था।

दोस्तों, जब गांधीजी द्वारा उनका असहयोग आंदोलन चलाया गया तो उसके बाद से उदारवादी और क्रांतिकारी नेता दोनों पक्ष के लोग गांधीजी के इस असहयोग आंदोलन से बहुत अपेक्षा रख रहे थे कि इस आंदोलन से भारत के पक्ष में एक अच्छा परिणाम निकल कर आएगा। 

परंतु जब चौरा-चौरी काण्ड जैसी घटना हुई तब गांधीजी ने इस घटना को देखते हुए अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया जिससे जो मुख्य क्रांतिकारी पक्ष के नेता और आंदोलनकारी थे वे गांधीजी के इस निर्णय से नाखुश हो गए थे और फिर एक क्रन्तिकारी दौर भी चल पड़ा जिसमें क्रांतिकारी नेता और आंदोलनकारी क्रांति के माध्यम से भारत को स्वंतंत्रता दिलाना चाहते थे। 

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( Hindustan Republican Association )

शचीन्द्रनाथ सान्याल के द्वारा 1924 में इस संगठन की उत्तर प्रदेश में स्थापना की गई थी, इसकी स्थापना इसलिए की गई थी ताकि इसकी मदद से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को क्रांतिकारी रूप से आगे बढ़ाया जाए। 

इसमें क्रांतिकारी नेता जैसे भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने सहयोग दिया था।

इस संगठन द्वारा काफी अच्छे समय तक कार्य किया गया लेकिन इसके कार्यकाल के बीच में ऐसी घटना हुई जो इसके कार्य प्रणाली पर प्रभाव डालता है।

काकोरी कांड ( 9 अगस्त, 1925 )

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कुछ सदस्यों ने ब्रिटिश सरकार की मालगाड़ी जो सहारनपुर से लखनऊ जा रही थी उसको काकोरी नामक स्थान में लूट लिया और इस माल गाड़ी में ब्रिटिश सरकार के खजाने रखे हुए थे।

यह घटना 9 अगस्त 1925 को हुई थी, और इस घटना को “काकोरी कांड” के नाम से जाना जाता है।

इस घटना के तहत ब्रिटिश सरकार द्वारा बहुत लोगों को पकड़ा गया और गिरफ्तार कर लिया गया था, और इसी क्रम में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, रोशन लाल, राजेंद्र लाहिरी को फांसी की सजा सुनाई गई थी। 

यह सारे लोग हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े हुए थे और इसी संगठन से प्रेरित थे।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ( Hindustan Socialist Republican Association )

काकोरी कांड जैसी घटना के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के नाम में थोड़ा बदलाव किया गया और बाद में इस संगठन का नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया गया था।

इस नाम से इस संगठन की स्थापना 1928 में की गई थी और तब इसके प्रमुख संस्थापक चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह थे। 

इस संगठन के द्वारा क्रांतिकारी नेताओं द्वारा बड़ी क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम देने का प्रयास किया गया था।

जिस वर्ष इस संगठन की स्थापना हुई अर्थात 1928, उसी वर्ष भारत में साइमन कमीशन का भी आगमन हुआ था और साइमन कमीशन के सारे सदस्य ब्रिटिश सदस्य थे जिसके कारण भारतीयों द्वारा इसे गोरों का संगठन कहा गया और इसका विरोध किया गया था। 

साइमन कमीशन की विरोध प्रक्रिया में कई भारतीय शामिल हुए और क्रांतिकारी नेता लाला लाजपत राय भी इस विरोध शामिल हुए थे, और इस कमीशन का विरोध करने के क्रम में अंग्रेजों द्वारा क्रांतिकारियों पर लाठीचार्ज किया गया था और लाला लाजपत राय जी इस लाठीचार्ज की चपेट में आ गए थे और ब्रिटिश अधिकारी साण्डर्स द्वारा उन पर लाठीचार्ज किया गया जिसके कारण लाला लाजपत राय जी को बहुत चोट आई और उनकी मृत्यु हो गई थी।

साण्डर्स की हत्या ( दिसंबर, 1928 )

तब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों द्वारा लाला लाजपत राय जी की मृत्यु का बदला लेने का निर्णय लिया गया था। 

इसके बाद चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु के समूह द्वारा लाहौर के पुलिस अधीक्षक साण्डर्स की हत्या कर दी गई थी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का यह पहला क्रांतिकारी कदम था। 

इस घटना में मुख्य योगदान भगत सिंह का माना जाता है।

इस घटना के बाद ब्रिटिश सेना द्वारा भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद को ढूंढने का अभियान चलाया गया था और ब्रिटिश सेना द्वारा आम नागरिकों को पकड़कर उनको परेशान और पीड़ा पहुंचा कर भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद का पता जानने का प्रयास किया गया था क्योंकि इस घटना के बाद चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह कहीं छुप गए थे और ब्रिटिश सेना उनको ढूंढना चाहती थी।

सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली बम कांड ( 8 अप्रैल 1929 )

जैसे कि साण्डर्स की हत्या के बाद ब्रिटिश सेना आम लोगों को परेशान कर रही थी जिसके कारण हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य अर्थात भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जो साण्डर्स की हत्या के बाद कहीं छुप गए थे उन्होंने आत्मसमर्पण करने का निर्णय लिया।

उस समय दिल्ली में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली जहां पर देश के बड़े मुद्दों पर बहस होती थी वहां बड़े नेताओं द्वारा बहस चल रही थी।

इस क्रम में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली पहुंचे और उस असेंबली पर बम फेंक दिया था परंतु यह बम खाली कुर्सियों पर फेंका गया था और यह घटना 8 अप्रैल 1929 को हुई थी।

यह बम जानबूझकर खाली कुर्सियों पर फेंका गया था और इसके साथ कुछ पर्चियां भी भेजी गई थी और इन पर्चियों में यह लिखा गया था की “हम बहरे कानों को कुछ सुनाना चाहते हैं”, इन शब्दों से उनके कहने का अर्थ यह था की जिस प्रकार से आम नागरिकों को परेशान किया जा रहा है वह गलत है, इसमें आम लोगों का कोई दोष नहीं है। 

खाली कुर्सियों में बम फेंक कर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने खुद को गिरफ्तार करवाया और तब ब्रिटिश सेना द्वारा उनको गिरफ्तार कर लिया गया था।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का खुद की गिरफ्तारी करवाना का उद्देश्य यह था कि इसके बाद ब्रिटिश सेना आम नागरिकों को परेशान नहीं करेगी, परंतु उनके हिसाब से उन्होंने अपनी गिरफ्तारी इसलिए भी करवाई थी क्योंकि उनका यह मानना था कि कि खाली कुर्सियों पर बम फेंकने पर कोई फांसी तो नहीं होगी लेकिन जब उन्हें पकड़ा गया तो मुकदमा उन पर लाहौर षड्यंत्र कांड का चलाया गया अर्थात साण्डर्स की हत्या का चलाया गया था।

लाहौर षड्यंत्र मुकदमा ( 1929 )

इस प्रकार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी तो असेंबली पर बम फेंकने पर हुई थी लेकिन उन पर मुकदमा लाहौर में साण्डर्स की हत्या का चलाया गया था।

जिस समय लाहौर में इस षड्यंत्र का मुकदमा चल रहा था, उस समय जेल में कैद एक कैदी जिनका नाम जतिन दास था उनके द्वारा भूख हड़ताल कर दी गई और यह भूख हड़ताल 64 दिन तक करी गई थी जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई थी। 

इसके बाद इस लाहौर षड्यंत्र मुकदमे के तहत हमारे तीन महान क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दे दी गई थी जो थे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु और यह सजा 23 मार्च 1931 को दी गई थी, इन तीनों क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी की सजा दी गई थी।

जब यह फांसी की सजा सुनाई गई थी इससे पहले बाहर छुपे हुए चंद्रशेखर आजाद जी ने भगत सिंह और बाकी साथियों की गिरफ्तारी से लेकर फांसी की सजा तक कई प्रयास किए कि वह जेल से बाहर निकाल लिए जाए, परंतु वे इस कार्य को सफलतापूर्वक नहीं कर पाए थे।

इसी क्रम में जब चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में बैठकर इस मुद्दे पर विचार कर रहे थे तब ब्रिटिश सेना द्वारा उन्हें चारों तरफ से घेर लिया गया था, और तब भी वहां शहीद हो गए थे और यह घटना 27 फरवरी 1931 को हुई थी।

जब चंद्रशेखर आजाद शहीद हो गए थे और उसके लगभग 1 माह के बाद भगत सिंह और दूसरे साथियों को भी फांसी दे दी गई थी तब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का कोई मुख्य नेता नहीं था जो इस संगठन को आगे ले जाए तब भगत सिंह के पंजाब से सहयोगी यशपाल को इस संगठन का नेता चुना गया था। 

परंतु अब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम धीमा पड़ने लग गया था।

इस संस्था के 5 से 6 वर्ष के कार्यकाल में इन्होंने अंग्रेजों को बहुत परेशान किया था और उन्हें काफी चुनौतियां भी दी थी।

इसके साथ-साथ भगत सिंह द्वारा पंजाब में नौजवान सभा नामक एक संगठन की भी शुरुआत की गई थी जिसकी मदद से भी वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे।

चटगांव आर्मरी रेड ( शस्त्रागार लूट )

बंगाल के चटगांव में एक मास्टर जी जिनका नाम सूर्यसेन था, उन्होंने अंग्रेजों के एक शस्त्रागार जो चटगांव, बंगाल में था उसमें लूट की घटना को अंजाम दिया था और यह घटना 1930 में हुई थी। 

उन्होंने अपनी एक सेना बनाई और उन्हें अंग्रेजों के कपड़े पहना कर उस शस्त्रागार में घुसा कर वहां पर लूट करी थी जिसके बाद उन्हें पकड़कर अंग्रेजों द्वारा 1934 में फांसी दे दी गई थी।

लाल कुर्ती आंदोलन ( 1929 – 1930 )

भारत के उत्तर पश्चिम क्षेत्र में भी आंदोलन देखने को मिले, जिसमें हमें लाल कुर्ती आंदोलन देखने को मिला।

भारत के उत्तर पश्चिम क्षेत्रों के एक नेता जिनका नाम था खान अब्दुल गफ्फार खां था, इन्होंने गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर भारत के उत्तर पश्चिम क्षेत्रों में एक और असहयोग आंदोलन के समान लाल कुर्ती में आंदोलन चलाया था जो पूर्ण रूप से अहिंसक था। 

जिसके कारण इन्हें “सीमांत गांधी” की संज्ञा भी दी जाती है और द्वितीय गांधी की संज्ञा दी जाती है, जिसके बाद विशुद्ध अहिंसक आंदोलन जारी रहा था।

प्रांतीय चुनाव ( 1937 )

जब 1935 का अधिनियम लागू किया गया था तब उसमें प्रांतीय चुनावों का नियम लाया गया था उस समय भारत में 11 प्रांत थे या 11 राज्य थे।

जिसके बाद 1937 में इन 11 प्रांतों में चुनाव कराया गया था, चुनाव में कई छोटे-बड़े दलों के रूप में कांग्रेस पार्टी ने हिस्सा लिया था और इसके अलावा दूसरी बड़ी पार्टी मुस्लिम लीग थी।

इसके परिणामस्वरूप 6 प्रांतों में कांग्रेस को बहुमत प्राप्त हुई थी, जिसमें संयुक्त प्रांत, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, मुंबई और मद्रास जैसे प्रांत थे और दो प्रांत ऐसे थे जहां कांग्रेस ने गठबंधन की सरकार बनाई थी जिसमें पश्चिमोत्तर प्रांत और असम थे।

इस प्रकार 8 प्रांतों में कांग्रेस द्वारा सरकार बनाई गई थी, इसके अलावा पंजाब, सिंध और बंगाल में कांग्रेस सरकार नहीं बना पाई थी, इन प्रांतों में मुस्लिम लीग सरकार में शामिल हुई थी।

इसी क्रम में 1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, तब अंग्रेजों द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध की तरह भारतीयों का सहयोग लेना चाहा परंतु भारतीय इस द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों का साथ नहीं देना चाहते थे क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद उन्हें अंग्रेजों से कोई लाभ नहीं मिला था।

परंतु उस समय के भारत में वायसराय लिनलिथगो ने बिना मंत्रिमंडल से पूछे हुए यह घोषणा कर दी कि भारतीय द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजो का सहयोग देंगे और इसी का विरोध करने के लिए 8 प्रांतों के कांग्रेस के मंत्रिमंडल ने अपना त्यागपत्र अक्टूबर 1939 को दे दिया था।

इस घटना से खुश होकर 22 दिसंबर, 1939 को मुस्लिम लीग के द्वारा “मुक्ति दिवस” मनाया गया था और भीमराव अंबेडकर द्वारा भी इस दिवस का समर्थन किया गया था।

आजाद हिंद फौज 

सबसे पहले कप्तान मोहन सिंह के पास आज़ाद हिन्द फौज का गठन करने का विचार आया था, इसका गठन करने का प्रयास उनके द्वारा किया गया था पर वे इसमें असफल रहे थे। 

बाद में 1942 में रासबिहारी बोस के द्वारा आज़ाद हिन्द फौज का कार्य आगे बढ़ाया गया और फिर 1943 में सुभाष चंद्र बोस इससे जुड़े और सिंगापुर जाकर आज़ाद हिन्द फौज का नेतृत्व सँभालते हैं। 

सुभाष चंद्र बोस ने आई.सी.एस की परीक्षा पास की थी और भारतीय जनपद सेवा के एक अधिकारी थे, परंतु उन्होंने अपना त्यागपत्र देकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आना ज्यादा उचित समझा था। 

इसके अलावा वे कांग्रेस से भी जुड़े थे और दो बार कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों 1938 और 1939 में अध्यक्ष भी चुने गए थे। 

1939 में उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष के पद से त्यागपत्र दे दिया था और उसके बाद “फॉरवर्ड ब्लॉक” नामक संगठन की स्थापना की थी। 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम – भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत का प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन कब हुआ था?

भारत का प्रथम संग्राम 1857 की क्रांति को माना जाता है

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