Aurangzeb History in Hindi

Aurangzeb History in Hindi – उत्तराधिकार युद्ध, विद्रोह, शासन

Aurangzeb History in Hindi – दोस्तों, आज हम औरंगज़ेब के बारे में पढ़ेंगे, इससे पहले हमने सारे प्रमुख मुगलकालीन शासकों के बारे में पढ़ा था।

पिछले आर्टिकल में हमने पढ़ा था की शाहजहाँ की मृत्यु के अंतिम दिनों में हमें उत्तराधिकार का युद्ध देखने को मिलता है, जिसमे मुख्य रूप से शाहजहाँ के चारो पुत्र आपस में लड़ते है और उन युद्धों में से औरंगज़ेब विजय होकर सामने आता है और शासक बनता है।

1658 में औरंगज़ेब ने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर लिया और शासक बन गया, वह 1707 तक शासन करता है और लगभग 50 वर्षों तक शासन करता है और इस प्रकार अकबर के बाद लंबा शासनकाल औरंगज़ेब का देखने को मिलता है, तो मुग़ल वंश के शासनकाल के दौरान औरंगज़ेब को एक महत्वपूर्ण शासक के रूप में जाना जाता है।  

औरंगज़ेब ने अपने शुरुवाती 25 वर्ष उत्तर भारत में संघर्ष करते हुए बिताये और अंतिम 25 वर्ष उसने दक्षिण भारत में संघर्ष करते हुए बिताये, तो चलिए उसके जीवनकाल पर दृष्टि डालें:

औरंगज़ेब का परिचय 

औरंगज़ेब का जन्म 3 नवम्बर, 1618 को दोहद, उज्जैन में हुआ था।

उसके पिता का नाम शाहजहाँ था और शाहजहाँ के चार पुत्रों में से औरंगज़ेब एक था, जिसने अपने बाकी तीन भाइयों के साथ शासक बनने के लिए आपस में संघर्ष करा और उत्तराधिकार युद्ध में विजय प्राप्त करी और उसकी माता का नाम अरजुमन्द बानो बेगम था जो मुमताज़ महल के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।

औरंगज़ेब का दो बार राज्याभिषेक होता है, इसका कारण यह है की औरंगज़ेब अपने भाइयों के विरुद्ध उत्तराधिकार का युद्ध लड़ रहा होता है जिसमें धरमट का युद्ध और सामूगढ़ का युद्ध वह 1658 में जीतता है, जिसके बाद उसका जुलाई 1658 में पहला राज्याभिषेक होता है।

उसका विद्रोह उसके भाई दारा शिकोह के साथ आगे चलता रहता है और अंत में जब वह देवराई के युद्ध में दारा शिकोह को पराजित कर देता है, तब उसका जून 1659 में दूसरा राज्याभिषेक होता है और उसे पूर्ण रूप से गद्दी प्राप्त हो जाती है, हमने अकबर के संबंध में भी पढ़ा था की उसका भी दो बार राज्याभिषेक हुआ था।

जब औरंगज़ेब ने गद्दी प्राप्त की तब उसने एक उपाधि धारण की थी जिसका नाम “अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुजफ्फर औरंगज़ेब बहादुर आलमगीर पादशाह गाज़ी” था और उसे आलमगीर के नाम से भी जाना जाता था।

उसके गुरु मीर मुहम्मद हकीम थे और औरंगज़ेब की पत्नी का नाम राबिया उद दौरानी था जिन्हे दिलरास बानो बेगम के नाम से भी जाना जाता है।

Aurangzeb History in Hindi
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औरंगज़ेब से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिंदु – Aurangzeb History in Hindi

1. औरंगज़ेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान के रूप शासन करना शुरू करता है, इसका कारण यह था की वह इस्लामिक शासन व्यवस्था को लागु करना चाहता था और इसके लिए इस्लाम में जो भी ऐसी व्यवस्था थी उसे वह लागु करना चाहता था और इसी कारण से वह एक कट्टर मुसलमान शासक के रूप में जाना जाता है।

इससे पहले जितने भी मुग़ल शासक थे, उनमे किसी में भी इस्लाम को लेकर इतनी कट्टरता नहीं थी और वह पूरी तरह से सुन्नी व इस्लाम व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास करता है और इसके लिए उसने कई ऐसे कदम उठाये जो एक शासक के तौर पर गलत थे क्यूंकि एक शासक की ज़िम्मेदारी उसके साम्राज्य में रहने वाली सभी प्रजा के लिए समान होती है।  

औरंगज़ेब ने उन सारे गुणों का त्याग करके एक कट्टर शासक के रूप में आगे बढ़ने का प्रयास किया।

2. औरंगज़ेब ने हिन्दुओं पर अत्याचार किये और 1665 में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने संबंधित आदेश दिए और इसके अलावा इस्लाम परंपरा के अनुसार जो भी व्यवस्थाएं उसे लगी की गलत हैं, उन सब को उसने बंद करवाने का आदेश दिया।  

3. जैसा की हमने पढ़ा था की अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ इन सभी ने संगीत, चित्रकला, नाच-गान सबको प्रोत्साहन दिया और अपने दरबार का एक अंग बना लिया था, परंतु औरंगज़ेब ने उन सब को बंद करवा दिया था।

उसने दरबार में संगीत, नृत्य पर प्रतिबंध लगा दिया था और चित्रकला को बंद करवाने से चित्रकला से जुड़े जो दरबारी और चित्रकार थे, जो मुग़ल शासन के दौर में फल-फूल रहे थे, उन सब को दिल्ली छोड़ना पड़ा।

बाद में वही चित्रकला भारत के अलग-अलग भागों में फैल गई, जिसे हम सब कोटा शैली या पटना कलम शैली के नाम से जानते हैं, यह स्थानांतरण मुग़ल सत्ता के दौरान जो औरंगज़ेब की शासक नीति थी उसी का परिणाम था।

4. उसने यह घोषणा कर दी थी की कुरान के आधार पर ही शासन होगा अर्थात शरीयत के आधार पर ही शासन व्यवस्था चलाई जाएगी और इसके लिए जो भी चीजें गैर-पारंपरिक है यानी इस्लाम के अनुसार नहीं है, उन सब को बंद कर दिया जाएगा।  

5. इस क्रम में उसने नवरोज़ त्योहार को बंद करवा दिया, झरोखा दर्शन जो शासक के द्वारा झरोखा दर्शन देने की परंपरा चलाई गई थी उसे भी उसने बंद करवा दिया था।

तुला दान जिसकी शुरुआत अकबर ने की थी, जिसमें राजा के वजन के बराबर सोने-चाँदी के सिक्के तोले जाते थे और उसे दान के रूप में बांटा जाता था, इस प्रथा को भी उसने बंद करवा दिया।

तिलक करना यानी राजपूत राजाओं को राजा के द्वारा तिलक किया जाता था और उन्हें दरबार में एक उचित स्थान दिया जाता था इस परंपरा को भी उसने बंद कर दिया।  

इसके अलावा सिक्कों पर कलमा खुदवाना भी उसने बंद करवा दिया क्योंकि वे सिक्के हिन्दुओं के पास भी जाते थे ऐसे में इस्लामिक कलमा खुदे हुए सिक्के उनके पास न जाएं इसलिए उसने सिक्कों पर कलमा खुदवाना बंद करवा दिया।  

सिजदा और पैबोस जैसी प्रथाओं को भी प्रतिबंधित कर दिया क्यूंकि वे प्रथाएं इस्लाम की मान्यताओं के विपरीत थी, इसके अलावा उसने कई ऐसी प्रथाएं थी जो हिन्दू और मुस्लिम दोनों में जारी थी, जो चीजें उसे इस्लाम के विरुद्ध लगी उसने वह सब प्रतिबंधित करवा दिया था।  

औरंगज़ेब ने संगीत और नृत्य पर पाबंदी जरूर लगाई थी पर वह स्वंय “वीणा” बजाने में उस्ताद था।  

इसके अलावा उसने होली और दिवाली जैसे त्योहारों पर भी प्रतिबंध लगवा दिया और कुछ सामाजिक प्रथायें जैसे की समाज में जो वैश्यालय शहरों के पास चलाये जाते थे उन्हें उसने बंद करवा दिया और वैश्यावृति करने वाली महिलओं को विवाह करने के लिए कहा गया या तो उन्हें यह व्यवसाय छोड़ने के लिए कहा गया।  

इस प्रकार से उसने सभी ऐसी प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाया जो उसे लगता था कि इस्लाम परंपरा के खिलाफ है और उन प्रथाओं को फिर से शुरू किया जो उसे लगा कि इस्लाम प्रथा के अनुकूल है।

इस क्रम में उसने 1679 में जजिया कर ( गैर मुस्लिमों से लिया जाने वाला कर ) पुनः लागू कर दिया और हमने पहले पढ़ा था की अकबर ने यह जजिया कर बंद करवाया था।

इस प्रकार औरंगज़ेब के काल में हिन्दू और मुस्लिम में काफी दूरियां बढ़ने लगी थी और इसके यह कारण थे:

1. औरंगज़ेब ने दारुल-हर्ब ( गैर मुस्लिम माना जाने वाला देश ) यानी भारत को दारुल-इस्लाम ( इस्लामिक देश ) बनाने का प्रयास किया, उसके मुताबिक भारत दारुल-हर्ब था, इसलिए उसने इतनी सारी इस्लाम विरोधी प्रथाओं को बंद भी करवाया था ताकि वह भारत को दारुल-इस्लाम बना सके।

इस प्रयास में उसने जिहाद का नारा दिया था अर्थात धर्म युद्ध के माध्यम से वह दारुल-हर्ब देश को दारुल-इस्लाम देश में परिवर्तित करना चाहता था।

इसी क्रम में उसने जितने भी मुसलमान शासक थे उन सभी को उसने अपने पक्ष में करने का प्रयास किया और उसने काफी हिन्दू राजाओं के साथ लड़ाइयां लड़ी ताकि वह दारुल-इस्लाम को स्थापित कर सके।

2. इतनी सारी धार्मिक कट्टरताओं के बाद भी, वह नैतिक स्तर पर काफी मजबूत और काफी ऊंचा माना जाता था, इसका कारण यह था की वह न तो शराब पीता था, न ही वह भांग खाता था, न ही उसने कई शादियां करी थी और इस्लाम के विरुद्ध सभी आचरण उसने त्याग दिए थे।

इसलिए उसे इस्लाम में मुसलमानों द्वारा “जिंदा पीर” कहा जाता है क्यूंकि वह इस्लामिक व्यवस्था के अंतर्गत आने वाली व्यवस्थाओं को लेकर नैतिक रूप से काफी ऊँचा स्तर रखता था।

प्रमुख विद्रोह ऐंव विजय 

औरंगज़ेब की इन नीतियों की वजह से उसे कई विद्रोहों का सामना करना पड़ा और इसके अलावा साम्राज्य विस्तार में उसने कई विजय भी हासिल करी थी।

जाट विद्रोह 

सबसे पहला सशक्त और संगठित विद्रोह जाटों के द्वारा किया गया था, जाटों का यह विद्रोह मुख्य रूप से किसान और वहां के लोग, जाटों के साथ बर्बरता और उन पर जबरदस्ती मुस्लिम व्यवस्था थोपने के विरोध में किया गया था।  

जाटों के इस संगठन का नेतृत्व गोकुल नामक व्यक्ति ने किया था, उसने प्रारंभिक रूप में औरंगज़ेब को चुनौती दी परंतु बाद में 1686 के आसपास एक तिलपत के युद्ध में गोकुल की हत्या करवा दी जाती है और इस प्रकार जाट थोड़े संकट में दिखाई पड़ते हैं।

परंतु उसी वर्ष 1686 में राजाराम पूरे जाट संप्रदाय का शासक बनकर आता है और बुरी तरह से औरंगज़ेब को चुनौती देना शुरू करता है।

इस क्रम में उसने देखा की अगर धार्मिक कट्टरता का परिचय औरंगज़ेब दे रहा है, तो हम भी उसी प्रकार का परिचय देंगे और इस तरह से उसने औरंगज़ेब को चिढ़ाने और दुख पहुंचाने के लिए अकबर की कब्र खुदवाई और अकबर की कब्र में से जो भी हड्डियां बाहर निकलकर आई उसने उसको जला दिया।

इसका कारण यह था की मुस्लिम धर्म में दफनाने की प्रथा है और उसने उसको जला के औरंगज़ेब की धार्मिक व्यवस्था को चोट पहुंचाने का प्रयास किया, जो वह हिंदुओ के साथ कर रहा था।  

यह घटना औरंगज़ेब को काफी दुखी कर गई और उसने राजाराम की हत्या करवा दी, राजाराम की हत्या के बाद उसके भतीजे चूरामण ने जाटों का नेतृत्व किया हालांकि औरंगज़ेब की मृत्यु 1707 में होती है तब तक जाट छोटे-मोटे रूप में विद्रोह में शामिल रहते हैं और यह विद्रोह पूरी तरह से कभी नहीं दबता लेकिन फिर भी राजाराम की हत्या के बाद जाटों का विद्रोह काफी सीमित हो गया था।

सतनामियों का विद्रोह 

यह विद्रोह भी धार्मिक मुद्दे से प्रेरित था और औरंगज़ेब की जो धार्मिक कट्टरता थी उसके खिलाफ सतनामियों ने विद्रोह किया था।

यह विद्रोह नारनौल और मेवात क्षेत्र में हुआ था और इन्हें “मुण्डिया” भी कहा जाता था क्योंकि वे हमेशा बाल मुंडवा कर रखते थे और इन्होंने भी इस्लामिक धार्मिक व्यवस्था के विरोध में विद्रोह किया था परंतु औरंगज़ेब ने इस विद्रोह को बड़ी आसानी से दबा दिया था।

हालांकि इसके संबंध में कहा जाता है कि विद्रोह के दौरान सतनामियों ने औरंगज़ेब के कई सेनापतियों की हत्या कर दी थी और परिणाम यह निकला की औरंगज़ेब की सेना में यह खबर फ़ैल गई की सतनामियों को जादू-टोना आता है जिसके कारण उन्होंने औरंगज़ेब की सेना को हरा दिया है।  

परिणामस्वरूप औरंगज़ेब के सैनिक डरने लगे, औरंगज़ेब ने भी तरीका निकाला उसने झंडे पर कुछ इस्लामिक शब्द लिखवा दिए, उसमे कुछ बंधवा दिया और कहा की यह जादू-टोने का काट है और फिर उसने लड़ाई लड़ी और आसानी से सतनामियों को उसने हरा दिया।

सिक्ख विद्रोह 

यह बहुत महत्वपूर्ण विद्रोह है, सिक्ख विद्रोह पूरी तरह से धार्मिक विषय के संबंध में था।

औरंगज़ेब का मानना यह था की वह भारत को इस्लामिक देश के रूप में बदलना चाहता था और वह सिक्ख धर्म को भी इस्लाम में परिवर्तित करना चाह रहा था।

इस समय जो सिक्खों के गुरु थे, वे 9वें गुरु तेगबहादुर थे, उसने यह प्रयास किया की अगर हम गुरु तेगबहादुर को ही इस्लाम धर्म स्वीकार करवा दे तो सारा सिक्ख संप्रदाय स्वयं ही इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेगा।  

इस प्रकार उसने सिक्खों के गुरु को ही इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए बुलवाया, परंतु गुरु तेगबहादुर ने इसको अस्वीकार किया और विद्रोह किया और फिर उन्हें पकड़कर दिल्ली ले जाया गया और दिल्ली में सीसगंज के पास 1675 में गुरु तेगबहादुर के सर को अलग कर दिया गया।  

सर अलग करने से पहले सिक्ख गुरु तेगबहादुर को 5 दिन गंभीर यातनाएं दी गई और उनके सहयोगियों को भी गंभीर यातनाएं दी गई और फिर उनकी हत्या कर दी गई।

परिणाम यह निकला की सिक्खों और मुगलों के बीच विवाद और ज्यादा बढ़ गया, हमने पहले पढ़ा था की सिक्खों के 5वें गुरु अर्जन देव की हत्या भी मुग़ल शासक जहाँगीर के द्वारा की गई थी।

इसके बाद सिक्खों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह आते हैं, जो सिक्खों के अंतिम गुरु थे, उन्होंने भी औरंगज़ेब का विद्रोह किया और उसके खिलाफ काफी लड़ाइयां लड़ी हालांकि इस विद्रोह के क्रम में उनके पुत्र भी उनसे दूर हो गए यानी उनकी हत्या कर दी गई लेकिन फिर भी उन्होंने कभी औरंगज़ेब की अधीनता स्वीकार नहीं की।

बाद में 1682 में औरंगज़ेब दक्षिण की तरफ चला जाता है और सिक्ख उत्तर भारत में विद्रोह को जारी रखते हैं और अंत में जब 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु हो जाती है तब बहादुर शाह के समय में सिक्खों और मुगलों में एक प्रकार का समझौता हो जाता है।

राजपूतों का विद्रोह 

राजपूत शासक अकबर के समय से मुगलों के काफी सहयोगी हो गए थे, परंतु जब औरंगज़ेब आता है और उसकी धार्मिक कट्टरता सामने आती है तब राजपूत भी मुगलों से दूर होने लगे थे।  

इसमें मारवाड़ और मेवाड़ जो है वे मुगलों के विद्रोह में उभर कर आते हैं, इसका कारण यह था की मुग़ल इनके धार्मिक कार्यों में हस्तक्षेप करने लगे थे और औरंगज़ेब इन पर शासन करने की नीति काफी कठोर अपना रहा था जिसके कारण मारवाड़ और मेवाड़ ने विद्रोह करना उचित समझा।

इस विद्रोह के क्रम में दोनों को दबा दिया जाता है और दोनों पर विजय स्थापित कर ली जाती है।

परंतु इस बीच की एक बहुत महत्वपूर्ण घटना है, औरंगज़ेब का एक पुत्र था जिसका नाम अकबर था, उसने अपने पिता औरंगज़ेब की धार्मिक नीति और राजपूतों के प्रति जो निति थी उसको गलत ठहराया और अपने पिता औरंगज़ेब के खिलाफ विद्रोह कर दिया।

विद्रोह करके वह इन्हीं मारवाड़ और मेवाड़ के शासकों के पास पहुँचता है, और जब वह वहां पहुँचता है तब उसे राजपूतों द्वारा यह भरोसा दिया जाता है की अगर तुम स्वयं को राजा घोषित कर लोगे तो हम लोग तुम्हारी तरफ से लड़ेंगे और औरंगज़ेब को गद्दी से हटा कर तुम्हें वास्तविक राजा बना देंगे।

अकबर का विद्रोह 

इस प्रकार अकबर राजपूतों की बातों में आ जाता है और उनके साथ मिलकर अपने पिता औरंगज़ेब के खिलाफ लड़ाई शुरू करता है, परंतु औरंगज़ेब उसका पीछा करते हुए राजपूत क्षेत्र में पहुँचता है और जाकर उसे हराता है।

इस प्रकार से बाद में राजपूत उसका साथ छोड़ देते हैं, इसका यह कारण था की औरंगज़ेब ने एक खत लिखवाया, उसने उस खत में यह लिखा की “बहुत अच्छा काम कर रहे हो तुम अकबर की तुम राजपूतों के साथ मिलकर उनको हमारे खिलाफ भड़का रहे हो और अब हम राजपूतों को बारी-बारी से मार रहे हैं“, इस प्रकार की एक चिट्ठी उसने राजपूतों के खेमें में फैला दी।

अब राजपूतों को ऐसा लगा की यह औरंगज़ेब और अकबर की एक चाल है की अकबर आकर हमारे साथ मिल गया है और अब यह हमारे ही आदमियों को मरवा रहा है।

इस तरह से राजपूतों को लगा की अकबर उनका सहयोगी नहीं बल्कि गुप्त रूप से उनका शत्रु है, इसलिए उन्होंने अकबर का साथ छोड़ दिया।

अब अकबर को ऐसा लगा की अगर मैं पकड़ा जाऊंगा तो मेरे पिता के द्वारा मेरी हत्या करवा दी जायगी, क्यूंकि जिसने अपने भाइयों को बुरी तरह से मार दिया था वो हो सकता है की मुझे भी मार दे।

अब अकबर भाग कर शिवाजी के पास जाता है, परंतु उस समय शिवाजी नहीं थे उनके पुत्र सम्भाजी थे।

सम्भाजी ने भी उसको संरक्षण दिया जिसके कारण औरंगज़ेब उसका पीछा करते हुए मराठा क्षेत्र तक पहुँचता है और अपने अंतिम 25 वर्ष दक्षिण भारत में ही व्यतीत कर देता है।

बाद में अकबर फ़ारस चला गया क्यूंकि मराठे भी पराजित होने लगे थे और फिर फ़ारस के शाह ने उसको संरक्षण दिया और लंबे समय तक वह वहीं रहा, बाद में जब औरंगज़ेब की मृत्यु का समय आता है 1707, में उसी समय के आसपास अकबर की भी मृत्यु फारस के क्षेत्र में ही हो जाती है।  

इस प्रकार अकबर का विद्रोह राजपूतों और मराठों दोनों से जुड़ा हुआ था।

मराठा 

मराठों का विस्तार शिवाजी के माध्यम से प्रारंभ हुआ था, जो की दक्षिण भारत के महाराष्ट्र में प्रारंभ होकर पूरे दक्षिण भारत में धीरे-धीरे बढ़ने लगा था।

शिवाजी के प्रयासों को बढ़ते हुए, उनके साम्राज्य को बढ़ते हुए देखकर औरंगज़ेब प्रारंभ में ही शसंकित होता है परंतु उस समय उसका ध्यान उत्तर भारत में था।

उसने दक्षिण भारत में शिवाजी को सीमित करने के लिए और बाध्य करने के लिए उसने राजा जय सिंह को भेजा जो की एक कछवाहा राजा थे, हमने पढ़ा था की अकबर के समय से मुगलों और कछवाहा राजपूतों में वैवाहिक संबंध स्थापित हो गए थे।

उसने राजपूत राजा जय सिंह को शिवाजी के साथ संधि करने के लिए भेजा।

शिवाजी और जय सिंह के बीच जून 1665 में “पुरंदर की संधि” होती है, जो काफी महत्वपूर्ण है, इस संधि के तहत शिवाजी को अपने किले मुगलों को देने पड़ते हैं और औरंगज़ेब की एक तरह से प्रतीकात्मक जीत हो जाती है।

शिवाजी बाद में 1666 में औरंगज़ेब के दरबार में आते हैं, परंतु उन्हें कैद कर लिया जाता है, फिर शिवाजी भागने में सफल हो जाते हैं और दक्षिण भारत में जाकर पुनः मुगलों की सेना से लड़-लड़ के कई किलों को उन्होंने जीत लिया था।

शिवाजी की मृत्यु के बाद उनका पुत्र सम्भाजी शासक बनता है, और सम्भाजी ने औरंगज़ेब के विद्रोही पुत्र अकबर को शरण दे दी थी जिसके बारे में हमने अभी पढ़ा था।  

परिणामस्वरूप 1682 में जब औरंगज़ेब अपने विद्रोही पुत्र अकबर का पीछा करते हुए दक्षिण भारत पहुँचता है और जब औरंगज़ेब शाहजहाँ के समय दक्षिण भारत का सूबेदार था तो उसकी कई ख्वाहिशे दक्षिण भारत को लेकर थी जो अधूरी थी।

दक्षिण भारत में पहुँचने के बाद उसने प्रारंभ में सम्भाजी को माफ़ कर दिया, फिर उनके साथ संघर्ष किया और 1689 में सम्भाजी की हत्या कर दी जाती है और उनके पुत्र साहु को भी गिरफ्तार कर लिया जाता है।

औरंगज़ेब दक्षिण भारत में जाने के बाद वहीं रह जाता है और वापस नहीं आ पाता है और जैसा की हमने शुरू में पढ़ा था की वह अपने अंतिम 25 वर्ष पूरी तरह से दक्षिण भारत में ही व्यतीत करता है।

दक्षिण भारत विजय 

1682 में औरंगज़ेब ने दक्षिण भारत में जाने का निर्णय लिया, उसने प्रारंभ में मराठाओं से संघर्ष किया और बाद में उसने बीजापुर से संघर्ष किया और 1686 में उसने बीजापुर को पराजित कर अपने साम्राज्य में मिला लिया।

इसके अलावा उसने गोलकुण्डा पर भी चढ़ाई करी और 1687 में उसने गोलकुण्डा को भी जीत लिया।

मराठों के साथ संघर्ष करते हुए उसने मराठों को भी काफी हद तक तोड़ दिया था क्यूंकि उसने सम्भाजी की हत्या कर दी थी जिसके बाद मराठा भी कई खेमों में बट जाते हैं।

इस प्रकार जो दक्षिण भारत के प्रमुख विरोधी थे, उन सब को दबाने में औरंगज़ेब सफल रहा था।

परंतु एक कहावत यह भी है की “दक्षिण भारत औरंगज़ेब का कब्रिस्तान सिद्ध हुआ” और वह अपने अंतिम 25 वर्ष वहीं फसा रह गया, उन्हें ही सीमित करता रह गया और उत्तर भारत को ध्यान नहीं दे पाया जिसके कारण जैसे ही औरंगज़ेब की मृत्यु होती है मुगलों के पतन का दौर शुरू हो जाता है।

औरंगज़ेब मुगलों के पतन के लिए काफी हद तक उत्तरदायी था क्यूंकि उसने शासन व्यवस्था को इस तरह से फैला दिया था की वह जो केंद्रीयकृत शासन व्यवस्था चली आ रही थी वह यहाँ से टूट जाती है हालांकि इसका जो प्रमुख कारण है वह अयोग्य उत्तराधिकारियों का भी होना है।

इस प्रकार दक्षिण भारत में ही औरंगज़ेब की 1707 में मृत्यु हो जाती है और उसकी मृत्यु दौलताबाद में होती है और उसे दौलताबाद के पास खुल्दाबाद में जैम-उल-हक़ जो एक सूफी संत थे उनका मज़ार है उसी मज़ार के पास उसको दफना दिया गया था और उसने कहा था की उसके लिए किसी भी प्रकार का मकबरा नहीं बनाया जाए।

इस प्रकार उसकी मृत्यु के बाद उसके अवशेषों पर मकबरा नहीं बनाया गया है।

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औरंगज़ेब से जुड़े कुछ अन्य बिंदु 

1. औरंगज़ेब की पत्नी राबिया उद दौरानी जिन्हे दिलरास बानो बेगम के नाम से भी जाना जाता है वह फारस राज घराने से संबंध रखती थी, वह अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था।

जब उसकी पत्नी का देहांत होता है तब वह उसकी याद में औरंगाबाद में एक “बीबी के मकबरे” का निर्माण करवाता है, इसका निर्माण उसने 1678-1679 में करवाया था।

इस मकबरे की आकृति बिलकुल ताजमहल जैसी है, जिसके कारण इसे द्वितीय ताजमहल या ताजमहल के नकली रूप में जाना जाता है।

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2. उसने दिल्ली के लालकिले में एक मोती मस्जिद का निर्माण करवाया था।

3. वह हिन्दुओं से काफी नफ़रत करता था और उसने हिन्दुओं के खिलाफ काफी षड़यंत्र रचे लेकिन उसने मुग़ल सेना में हिन्दुओं को काफी जगह दी, पूरे मुग़ल शासन काल के दौरान इतने हिन्दू सेनापति किसी के शासनकाल में नहीं थे।

औरंगज़ेब के समय सर्वाधिक हिन्दू सेनापति किसी मुग़ल सेना में थे, उसने हिन्दू सेनापतियों का अनुपात कुल सेनापतियों का ⅓  यानी 33 प्रतिशत रखा था बाकी मुस्लिम सेनापति थे।  

4. उसने हिंदुओं के साथ कर व्यवस्था में काफी कड़ाई से कर वसूला और इसके लिए उसने पुनः जजिया कर को शुरू कर दिया था, लेकिन जजिया कर को शुरू करने के साथ-साथ उसने कर को कई रूपों में बाँट दिया था यानी जिसकी ज्यादा आय है उसे ज्यादा कर देना होगा और जिसकी कम आय है उसे काम कर देना होगा।

इस क्रम में आप आज की स्थिति को भी देख सकते है, जैसे कर के कई खंड बने हुए हैं और उनके कर की मात्रा अलग-अलग है, इसी तरह की व्यवस्था उस समय भी देखी गई है, आइये उन पर दृष्टि डालें:

(क) उसने कहा की जिसकी आय 200 दिरहम से कम है, उसे 12 दिरहम प्रतिवर्ष कर के रूप में देना होगा।

(ख) जिसकी आय 200 से लेकर 10,000 दिरहम तक है, उसे 24 दिरहम प्रतिवर्ष कर के रूप में देना होगा।

(ग) जिसकी आय 10,000 दिरहम से अधिक है, उसे 48 दिरहम प्रतिवर्ष कर के रूप में देना होगा।

हालांकि उसने थोड़ी सी इंसानियत बरतते हुए 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे, गुलाम, अपाहिज, भिखारी, स्त्रियाँ आदि के लिए कर की छूट रखी थी, उन्हें कर नहीं देना होता था, लेकिन हिन्दुओं पर ये कर पूरी तरह से लगाए गए थे और जबरन वसूले भी जाते थे।

5. स्त्रियों को लेकर उसकी व्यवस्था अन्य मुग़ल शासकों की तुलना में काफी अच्छी थी।

औरंगज़ेब के शासनकाल में अफगानिस्तान सीमाप्रांत से लेकर के दक्षिण भारत की कावेरी नदी तक उसकी सीमा हो चुकी थी और इतना बड़ा साम्राज्य उसने संभाला था, लेकिन औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद ही यह पूरी तरह से बिखर जाता है।

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हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई Aurangzeb History in Hindi के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


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