Gandhi Yug

Gandhi Yug – गांधी युग ( 1917 -1948 ) ☸️

Gandhi Yug – दोस्तों, आज हम गांधी युग के संबंध में जानेंगे, इससे पिछले आर्टिकल में हमने कांग्रेस के संबंध में जाना की कैसे कांग्रेस द्वारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। 

गांधी युग से हमारे यह कहने का मतलब है की वह समय काल जिसमें महात्मा गांधीजी द्वारा भारतीय स्वंतंत्रता संग्राम में ऐसी भूमिका निभाई गई जिससे भारत को आज़ादी प्राप्त होने में काफी महत्वपूर्ण योगदान मिला था। 

इस गांधी युग को 1917 से लेकर 1947 तक का माना जाता है। 

जैसे की 1857 की क्रांति के बाद भारत की सत्ता पूर्णतः ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चली गई थी उसके बाद भारत में कई छोटे-छोटे दल बनने लगे, परंतु फिर 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने के लिए एक बड़ा दल भी आ गया था और बाद में गांधी जी भी इस स्वतंत्रता संग्राम में जुड़ गए थे, आइये जानें इस गांधी युग के संबंध में। 

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महात्मा गांधी जी का जीवन परिचय – Gandhi Yug

दोस्तों, गांधी युग को समझने से पहले हमें गांधी जी के जीवन परिचय की कुछ बुनियादें बातें तो पता ही होनी चाहिए और ये बातें तो आप सबने अपने स्कूलों में भी पढ़ी होंगी चलिए एक बार फिर से इन बिंदुओं पर दृष्टि डालें:

महात्मा गांधी जी की जन्म तिथि 2 अक्टूबर, 1869 थी और जन्म स्थान पोरबंदर, गुजरात था, इसके साथ उनके पिता का नाम मोहनदास करमचंद गांधी और माता का नाम पुतलीबाई गांधी था। 

उनका विवाह भी बहुत ही पूर्व हो गया था और मात्र 13 वर्ष के छात्र जीवन में उनका विवाह कस्तूरबा बाई गांधी के साथ हो गया था। 

महात्मा गांधी जी ने अपनी आगे की शिक्षा ब्रिटेन में रह कर की और वहां वे 1889 से लेकर 1891 तक शिक्षा प्राप्त करने हेतु रहे थे और वहां पर उन्होंने इंग्लैंड से बैरिस्टरी की शिक्षा प्राप्त की थी। 

1891 में वे इंग्लैंड से बैरिस्टरी की शिक्षा प्राप्त करके भारत वापस लौटे और अब उन्हें वकालत करनी थी, तभी इसी बीच 1892 में उन्हें एक मुस्लिम व्यापारी दादा अब्दुल्ला द्वारा दक्षिण अफ्रीका में उसकी वकालत करने का प्रस्ताव आया और उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। 

महात्मा गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका संबंधित बिंदु 

मुस्लिम व्यापारी दादा अब्दुल्ला के प्रस्ताव को स्वीकार करने के बाद गांधी जी 1893 में दक्षिण अफ्रीका गए और वहां जाने के बाद उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, वहां उन्होंने देखा की गोरे लोगों और काले लोगों में भेद किया जा रहा है। 

दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के जीवन में एक ऐसी घटना होती है जो उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होती है। 

वह घटना यह थी की जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका के डरबन स्टेशन से प्रिटोरिया स्टेशन तक एक ट्रेन यात्रा कर रहे थे तब उस ट्रेन की प्रथम श्रेणी की यात्रा के दौरान गांधी जी को रंगभेद के चलते बीच यात्रा में ही पीटरमारित्जबर्ग स्टेशन में ट्रेन से नीचे उतार दिया गया था। 

ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा गांधी जी को ट्रेन से नीचे उतार दिए जाने की घटना को रेल कांड” के नाम से भी संबोधित किया जाता है और इस घटना के बाद गांधीजी द्वारा इस रंगभेद की प्रथा को तोड़ने का प्रण लिया गया था। 

गांधीजी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में किये गए कार्य:

1894बाद में गांधी जी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में 1894 में नटाल इंडियन कांग्रेस नामक संस्था की स्थापना करी जाती है। 
1903इसके बाद 1903 में गांधी जी द्वारा द इंडियन ओपिनियन नामक अख़बार को प्रकाशित किया जाता है। 
1904इसके एक वर्ष बाद ही 1904 में दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स आश्रम की शुरुआत गांधी जी द्वारा की गई थी। 
1906इसके बाद 1906 में गांधी जी द्वारा उनके जीवन का प्रथम सत्याग्रह दक्षिण अफ्रीका में शुरू किया जिससे वे अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलते हुए अपनी मांगो को पूर्ण करना चाहते थे। 
1909इसके बाद 1909 में उन्होंने हिन्द स्वराज नामक पुस्तक की भी रचना की थी।
Gandhi Yug – गांधी युग

गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में रहने के क्रम में उनपर लियो टॉलस्टॉय नामक लेखक की किताबों का बहुत प्रभाव पड़ा था। 

महात्मा गांधी जी की भारत वापसी 

दक्षिण अफ्रीका से गांधी जी पुनः भारत 9 जनवरी 1915 को वापस लौटे थे और इस दिन को भारत में प्रतिवर्ष “प्रवासी दिवस” के रूप में भी मनाया जाता है। 

भारत वापस आने के क्रम में उन्होंने भारत की पृष्ठभूमि और राजनीतिक स्थिति को समझने का प्रयास किया और इस क्रम में वे गोपाल कृष्ण गोखले जी से काफी प्रभावित हुए और उन्हें अपना गुरु मान लिया था। 

इसके बाद गुजरात में 1916 में गांधी जी द्वारा साबरमती आश्रम की स्थापना करी गई थी। 

दोस्तों, जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस लौटे थे तब उस समय दुनिया में प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, उस समय गांधी जी ने अंग्रेजों को विश्व युद्ध में सहायता करने की नीति को बढ़ावा दिया था ताकि अंग्रेज भी भारतीयों की स्तिथि और मांगों के ऊपर नरम व्यवहार करें। 

इस क्रम में गांधी जी ने भारतीयों को विश्व युद्ध में अंग्रेजों की मदद के लिए अंग्रेजी सेना में भर्ती होने का प्रोत्साहन दिया था ताकि ज्यादा से ज्यादा भारतीय अंग्रेजी सेना में भर्ती हो सके। 

इसको देखते हुए भारतीयों ने उस समय गांधी जी को “भर्ती करने वाले सार्जेंट” के नाम से संबोधित किया था। 

इस क्रम में गांधी जी का कांग्रेस के अधिवेशनों में भी भाग लेना शुरू हो गया था और वे भारत के राजनीतिक बिंदुओं से भी जुड़ गए थे। 

गांधी युग ( Gandhi Yug ) 1917 – 1947 

Gandhi Yug – 1917 में चंपारण, बिहार के एक स्थानीय नेता जिनका नाम राजकुमार शुक्ल था, वे गांधी जी से मिले और चंपारण, बिहार की स्थिति के बारे में बताया और वहां की तीन कठिया प्रणाली के बारे में गांधी जी को जानकारी दी, और गांधी जी से चम्पारण चलने को कहा और वहां के किसानों की स्थिति के ऊपर कुछ कदम उठाने की मांग की थी, तीन कठिया प्रणाली में किसानों को 20 कट्ठे की भूमि में से 3 कट्ठे की भूमि पर नील की खेती करना अनिवार्य होता था।  

जिन किसानों की भूमि सबसे ज्यादा उपजाऊ होती थी, उसी 3 कट्ठे की भूमि पर किसानों को नील की खेती करनी होती थी, और नील की फसलों की जड़ें बहुत लंबी होती थी जिससे वे उपजाऊ भूमि को नुकसान पहुंचाती थी, इसलिए किसान इस तीन कठिया प्रणाली से बहुत दुखी थे।

चम्पारण सत्याग्रह ( 1917 )

गांधी जी ने राजकुमार शुक्ल के इस निमंत्रण को स्वीकार किया और वे चम्पारण,बिहार के लिए चले गए थे, वहां उन्होंने किसानों की बुरी हालत पर दृष्टि डाली और उनकी तकलीफ को समझते हुए इस तीन कठिया प्रणाली के खिलाफ अंग्रेजों के विरुद्ध 1917 में भारत में अपने पहले सत्याग्रह की शुरुआत की जिसे चम्पारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। 

इस चम्पारण सत्याग्रह का परिणाम यह निकलकर आया की इस तीन कठिया प्रणाली को समाप्त कर दिया गया और इसके साथ-साथ करों को भी 25% तक कम कर दिया गया था, यह गांधी जी के प्रमुख आंदोलन में से एक था। 

यह चम्पारण सत्याग्रह गांधी जी की भारत में प्रथम विजय साबित हुई थी और भविष्य में गांधी जी को भारत के एक बड़े नेता के रूप में होने के द्वार भी खुल गए थे। 

इस सत्याग्रह के बाद रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा गांधी जी को “महात्मा की उपाधि दी गई और उसके बाद से उन्हें महात्मा गांधी के नाम से बुलाया जाने लग गया था। 

अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन ( 1918 )

चम्पारण सत्याग्रह के बाद 1918 में गांधी जी अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों से मिले और उनकी समस्या को समझा।

अहमदाबाद के मिल मजदूरों के अधिकारों के ऊपर अत्याचार किये जा रहे थे और हितों में होने वाली योजनाओं पर भी रुकावटें डाली जा रही थी। 

इसी के विरोध में गांधी जी ने मिल के मजदूरों के साथ प्रथम बार भूख हड़ताल की नीति को अपनाया था और इस भूख हड़ताल का परिणाम गांधी जी के पक्ष में आया था। 

खेड़ा आंदोलन ( 1918 )

इसके बाद उसी वर्ष 1918 में ही गांधी जी खेड़ा, गुजरात में हो रहे किसानों के साथ अत्याचार के विरुद्ध अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन किया था। 

यहाँ पर किसानों की फसलें नष्ट हो जाने के बाद भी उनसे करों की वसूली की जा रही थी। 

यहाँ पर आंदोलन में उनका साथ सरदार वल्लभभाई पटेल ने दिया था। 

गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में किये गए उनके कार्य को लेकर वे भारत में भी काफी चर्चित थे और इन आंदोलनों में भी सफलता पाते हुए वे भारत में बड़े नेता के रूप में देखे जाने लगे थे। 

खिलाफत आंदोलन ( 1919 – 1922 )

उस समय तुर्की के खलीफा को सारे विश्व के मुस्लिमों का गुरु माना जाता था और उनके ऊपर अंग्रेजों द्वारा बुरा व्यवहार किया जा रहा था और अंग्रेजों के उनके साथ इस बुरे व्यवहार को लेकर भारत में मुस्लिमों ने अंग्रेजों के विरुद्ध खिलाफत आंदोलन को शुरू कर दिया था। 

गांधी जी ने भी इस आंदोलन में सहयोग किया था क्यूंकि वे मुस्लिमों को भी भारत के अंग्रेजों के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलन में जोड़ना चाहते थे। 

प्रारंभ में इस आंदोलन नेतृत्व अली बंधुओं द्वारा किया जा रहा था, परंतु बाद में इस खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व गांधी जी को दे दिया गया था। 

असहयोग आंदोलन ( 1920 )

जब 1918 में विश्व युद्ध समाप्त हो गया था तब खिलाफत आंदोलन के समय ही 1919 में अंग्रेजों द्वारा रौलट एक्ट को भारत में लाया गया था, परंतु उस एक्ट में भारतीयों के लिए कोई अच्छी बात नहीं थी जैसा गांधी जी और भारत के लोग सोच रहे थे क्योंकि जैसे हमने ऊपर चर्चा की थी गांधी जी भारतीयों को विश्व युद्ध में अंग्रेजों की मदद के लिए अंग्रेजी सेना में भर्ती होने का प्रोत्साहन दे रहे थे ताकि विश्व युद्ध के बाद अंग्रेज भारत के लिए कुछ अच्छे कदम उठाएंगे पर ऐसा कुछ नहीं हुआ था। 

तब रॉलेट एक्ट के विरोध में बहुत लोग जलियांवाला बाग इकट्ठा हुए थे, जहां पर अंग्रेजों की ओर से जनरल डायर द्वारा भारतीयों का नर संहार किया गया था। 

इन सब घटनाओं को देखते हुए गांधी जी द्वारा अगस्त, 1920 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत करी गई थी और यह गांधी जी का भारत में प्रथम सबसे बड़ा आंदोलन में से एक था। 

उस समय गांधी जी ने कांग्रेस के अगस्त में हुए विशेष अधिवेशन जो कलकत्ता में आयोजित किया गया था, उसमें इस असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव दिया था जिसमें इस आंदोलन को अस्वीकार कर दिया गया था, परंतु बाद में उसी वर्ष नागपुर अधिवेशन में जो दिसंबर में आयोजित किया गया था उसमें इस असहयोग आंदोलन को मंजूरी दे दी गई थी। 

प्रारंभ में जिन नेताओं ने इस आंदोलन को स्वीकार नहीं किया था वे थे चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, ऐनी बेसेंट आदि। 

बाद में चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू ने इस आंदोलन को स्वीकार कर लिया था, परंतु ऐनी बेसेंट द्वारा इस असहयोग आंदोलन को “मूर्खतापूर्ण विरोध” कहा गया था। 

धीरे-धीरे यह आंदोलन बहुत बड़ा होता चला गया था और भारत के कई बड़े नेता इस आंदोलन में जुड़ने लग गए थे। 

यह आंदोलन सफल होता हुआ दिख रहा था लेकिन इस आंदोलन के बीच एक ऐसी घटना हुई जिससे इस आंदोलन को गांधी जी द्वारा समाप्त करना पड़ा था। 

चौरी-चौरा कांड ( 5 फरवरी, 1922 )

असहयोग आंदोलन के बीच चौरी-चौरा, गोरखपुर में 5 फरवरी, 1922 को वहां के ग्रामीणों ने वहां के पुलिस थाने में वहां के थानेदार को 21 सिपाहियों सहित थाने को बंद कर दिया और उसके बाद थाने में आग लगा दी थी। 

इसमें उनकी दर्दनाक मृत्यु हुई थी और इस घटना के बाद गांधी जी ने इस असहयोग आंदोलन को हिंसात्मक होते हुए देख इसको समाप्त करने का निर्णय लिया। 

इसके बाद 11 फरवरी, 1922 को इस असहयोग आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा कर दी जाती है। 

परंतु इस असहयोग आंदोलन को समाप्त करने के फैसले की आलोचना बहुत भारतीय नेताओं ने की थी, जैसे सुभाष चंद्र बोस द्वारा इस फैसले को राष्ट्रीय संकट कहा गया था, इसके साथ कई नेता जैसे चितरंजन दास, लाला लाजपत राय, मोतीलाल नेहरू आदि ने इस असहयोग आंदोलन को समाप्त करने के फैसले की आलोचना की थी। 

परंतु गांधी जी भी अपने इस फैसले पर डटे रहे थे और बाद में सबने इस फैसले को स्वीकार कर लिया था। 

गांधी जी का यह असहयोग आंदोलन अपने लक्ष्य को प्राप्त कर के सफल हो सकता था, यदि इसे वापिस न लिया जाता, लेकिन एक पहलु यह भी है की शायद इस आंदोलन को वापिस न लिया जाता तो यह आंदोलन और ज्यादा हिंसात्मक भी हो सकता था। 

स्वराज पार्टी ( मार्च, 1923 )

इसके बाद कुछ नेता थे जो गांधी जी के विचारों से सहमत नहीं रहा करते थे और ऐसे में चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू, जो गांधी जी के विचारों के साथ सहमत नहीं रहा करते थे, उन्होंने एक नई पार्टी की स्थापना करने का निर्णय लिया था। 

इस क्रम में चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद में मार्च, 1923 में “स्वराज पार्टी” की स्थापना कर दी थी। 

दोस्तों, जैसे की हमने हमारे भारत सरकार अधिनियम 1919 में जाना था की प्रांतीय क्षेत्रों में भारतीयों को भी चुनाव में भाग लेने की अनुमति मिल गई थी और इस स्वराज पार्टी की स्थापना करने का उद्देश्य यह था की इन प्रांतीय चुनावों के माध्यम से स्वराज पार्टी के जरिये सरकार में घुस कर अंग्रेजों की नीतियों को चुनौती दी जाए और इसी उद्देश्य के साथ चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू द्वारा स्वराज पार्टी की स्थापना करी गई थी। 

गांधी-दास पैक्ट ( 1924 )

जैसे की हमने ऊपर चर्चा की थी कि जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापिस लिया था तब बहुत भारतीय नेता उनके इस फैसले से नाखुश थे और कई नेताओं ने इस कदम की आलोचना भी की, इसी में हमने चितरंजन दास का नाम भी जाना था और उनके और गांधी जी के विचार इस फैसले के बाद बहुत ज्यादा अलग-अलग हो गए थे। 

इस क्रम में बाद में गांधी जी और चितरंजन दास के मध्य 1924 में एक समझौता हुआ, जिसे हम “गांधी-दास पैक्ट” के नाम से संबोधित करते हैं। 

सविनय अवज्ञा आंदोलन ( 1930 – 1934 )

यह आंदोलन गांधी जी का असहयोग आंदोलन के बाद भारत में दूसरा बड़ा आंदोलन साबित हुआ था, यह आंदोलन 1930 से लेकर 1934 तक चला था, परंतु कुछ कारणों की वजह से इस आंदोलन के समय काल के बीच में एक समय ऐसा था जिसमे यह आंदोलन नहीं चला था, इसका तात्पर्य यह है की 1930 से लेकर 1934 तक यह आंदोलन दो चरणों में चला था। 

पहला चरण 1930 से लेकर 1931 तक चला था और दूसरा चरण 1932 से लेकर 1934 तक चला था। 

1930 में गांधी जी ने उस समय के भारत में वाइसराय लार्ड इरविन के समक्ष 11 सूत्री मांगे रखी थी और इन 11 सूत्री मांगों में भारतीयों को कैद से छोड़ने, सेना का खर्च कम करने आदि मांगे थी। 

दांडी मार्च ( 12 मार्च, 1930 – 6 अप्रैल 1930 )

लार्ड  इरविन के द्वारा गांधी जी की इन 11 सूत्री मांगो के ऊपर कोई कदम नहीं उठाए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने इसके विरोध में आंदोलन करने का निर्णय लिया और दांडी मार्च करने की घोषणा कर दी थी। 

दांडी मार्च को गांधी जी द्वारा नमक कर के विरोध में चलाया गया था और इसके साथ-साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन को शुरू करने के लिए भी इस दांडी मार्च को चलाया गया था। 

यह दांडी मार्च 12 मार्च, 1930 को शुरू हुआ था और 6 अप्रैल 1930 तक चला था और यह दांडी मार्च गांधी जी द्वारा साबरमती आश्रम से लेकर दांडी, गुजरात तक चलाया गया था, इसमें गांधी जी के साथ भारत के अलग-अलग क्षेत्रों से कुल 78 सहयोगियों ने भाग लिया था और इसकी दूरी 241 मील की थी। 

शुरुआत में तो गांधी जी के साथ सिर्फ यह 78 सहयोगी ही दांडी मार्च के लिए निकले थे, परंतु दांडी पहुँचते-पहुँचते बहुत सारे लोग इस दांडी मार्च में जुड़ते चले गए और यह संख्या लाखों में पहुँच गई थी। 

दांडी पहुँच कर गांधी जी द्वारा वहां नमक उठाकर इस नमक कर के कानून का विरोध किया गया और यह दांडी मार्च बहुत ज्यादा प्रभावशाली रहा था, जिसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने इसकी तुलना मुसोलिनी और नेपोलियन की यात्रा से भी की थी। 

उस दिन अर्थात 6 अप्रैल, 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन की भी शुरुआत की गई थी और इस आंदोलन में महिलाओं द्वारा सबसे ज्यादा भाग लिया गया था। 

गांधी-इरविन समझौता ( 1931 ) 

इस सविनय अवज्ञा आंदोलन से लार्ड इरविन को बहुत परेशानी हुई जिसकी वजह से उन्होंने गांधी जी के साथ एक समझौता किया था। 

यह “गांधी-इरविन समझौता” के नाम से जाना जाता है और यह समझौता 5 मार्च, 1931 में हुआ था। 

गोलमेज सम्मेलन ( 1930 – 1932 ) 

1930 से लेकर 1932 तक अंग्रेजों द्वारा कुछ सम्मेलनों का आयोजन ब्रिटेन में करवाया गया ताकि भारत के विभिन्न दल उन सम्मेलनों में अपनी बातें उनके समक्ष रख सकें और इन्हें गोलमेज सम्मेलन के नाम से जाना जाता है क्यूंकि इसमें एक गोल मेज के चारों ओर लोग बैठते थे और अपनी बातें व मांगे रखते थे। 

इस क्रम में 1930 से 1932 तक अंग्रेजों द्वारा तीन गोलमेज सम्मेलन का आयोजन ब्रिटेन में करवाया गया, जिसमें प्रतिवर्ष एक गोलमेज सम्मेलन हुआ करता था। 

प्रथम गोलमेज सम्मेलन ( 1930 )

इस सम्मेलन में भारत के विभिन्न प्रतिनिधि भाग लेने पहुंचे लेकिन इस समय गांधी जी और कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन में व्यस्त थे इसलिए उन्होंने इस प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया था। 

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन ( 1931 )

जैसे की हमने ऊपर चर्चा की थी की 1931 में लार्ड इरविन और गांधी जी के मध्य गांधी-इरविन समझौता हो गया था, इसलिए गांधी जी इसके तहत दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने ब्रिटेन चले गए थे। 

ब्रिटेन में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधी जी की मांगों को अंग्रेजों द्वारा ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दी गई, जिसके बाद गांधी जी ने भारत आकर वापस से सविनय अवज्ञा आंदोलन को शुरू कर दिया था और दोस्तों, इसी के संदर्भ में हमने ऊपर चर्चा भी की थी की यह सविनय अवज्ञा आंदोलन दो चरणों में हुआ था, तो इसी परिस्थिति की वजह से यह आंदोलन दो चरणों में हुआ था। 

तृतीय गोलमेज सम्मेलन ( 1932 )

इस सम्मेलन में भी भारत के विभिन्न प्रतिनिधि भाग लेने पहुंचे, लेकिन गांधी जी और कांग्रेस की मांगें दूसरे गोलमेज सम्मेलन में न माने जाने के कारण और फिर से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किए जाने के कारण इस सम्मेलन में गांधी जी और कांग्रेस ने भाग नहीं लिया था। 

इस प्रकार कांग्रेस ने सिर्फ दूसरे गोलमेज सम्मेलन में ही भाग लिया था जिसमें कांग्रेस का नेतृत्व गांधी जी ने किया था, परंतु भीमराव अंबेडकर जी ने तीनों गोलमेज सम्मेलन में भाग लेते हुए दलितों का नेतृत्व किया था। 

इन गोलमेज सम्मेलनों के दौरान ब्रिटेन के प्रधान मंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ( Ramsay Macdonald ) थे। 

पूना पैक्ट समझौता ( 1932 )

जब 1932 में ब्रिटेन में तीसरा गोलमेज सम्मेलन हुआ था तब उस सम्मेलन में भीमराव अंबेडकर जी द्वारा दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग रखी गई थी और इस मांग को अंग्रेजों द्वारा स्वीकार कर लिया गया था। 

तब दलितों के लिए 71 पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की घोषणा करी गई थी, अंग्रेजों द्वारा यह फैसला भारतीय हिन्दू समाज को तोड़ने और भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए लिया गया था, इस घोषणा को साम्प्रदायिक पंचाट अर्थात कम्युनल अवार्ड ( Communal Award ) के नाम से संबोधित किया जाता है। 

गांधी जी ने इस फैसले का विरोध किया और इसके विरोध में अनशन करने का निर्णय लिया था। 

गांधी जी के इस अनशन के कारण और बहुत सोच-विचार के बाद भीमराव अंबेडकर और गांधी जी के बीच एक बैठक हुई जिसको “पूना पैक्ट” के नाम से संबोधित किया जाता है। 

यह पूना पैक्ट गांधीजी और भीमराव अंबेडकर के बीच 24 सितम्बर, 1932 को हुआ था। 

इस पूना पैक्ट में गांधी जी द्वारा दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या को बढ़ाने का फैसला लिया गया। 

इसके परिणामस्वरुप प्रांतीय चुनाव क्षेत्रों में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या को बढ़ाकर 71 से 148 कर दिया गया था, लेकिन पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग को ख़त्म किया गया, जिसमे दलितों का चुनाव सिर्फ दलित ही कर सकते थे और यह पूना पैक्ट गांधी जी और भीमराव अंबेडकर के बीच पूना क्षेत्र की यरवदा सेंट्रल जेल में हुआ था। 

व्यक्तिगत सत्याग्रह ( 1940 )

सविनय अवज्ञा आंदोलन और पूना पैक्ट जैसे आंदोलन के बाद कुछ समय तक आंदोलन के दौर को कुछ विराम मिला, इसके बाद 1940 में गांधी जी द्वारा उनकी एक रणनीति के तहत एक व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया गया था। 

विनोबा भावे ऐसे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने इस व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया था, इसके बाद दुसरे सत्याग्रही जवाहरलाल नेहरू बने और तीसरे सत्याग्रही ब्रह्मदत्त बने थे। 

इस व्यक्तिगत सत्याग्रह को पवनार, महाराष्ट्र से शुरू किया गया था और इस सत्याग्रह को “दिल्ली चलो” के नाम से भी संबोधित किया जाता है। 

भारत छोड़ो आंदोलन ( 1942 )

Gandhi Yug1939 में दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो गई थी और अंग्रेजों की ओर से पूरी कोशिश की जा रही थी की भारतीयों को पहले की तरह ही इस बार भी अंग्रेजी सेना में ज्यादा से ज्यादा भर्ती किया जाए और दुसरे विश्व युद्ध की लड़ाई के लिए भेजा जाए। 

बहुत सारे प्रतिनिधिमंडल भी भारत आए जो भारतीयों को अंग्रेजों को विश्व युद्ध में मदद करने का प्रोत्साहन दे रहे थे, परंतु जैसा धोखा अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीयों के साथ किया था जिसके बारे में हमने ऊपर भी चर्चा की थी, वैसा धोखा वे इस बार भी कर सकते थे और यह बात भारतीयों को इस बार समझ आ चुकी थी और इस बार भारतीय लोग पूरी तरह से अंग्रेजों की इस दुसरे विश्व युद्ध में कोई मदद नहीं करना चाहते थे। 

इस क्रम में ब्रिटेन से क्रिप्स मिशन भी भारत आये और वे भारत में अपने कार्यों को लेकर पूर्णतः असफल रहे, क्यूंकि अब भारतीयों को अपने हितों का ज्ञान अच्छे से हो गया था और इस क्रिप्स मिशन के संबंध में गांधी जी द्वारा यह कहा गया था की “यह दिवालिया हो चुके बैंक का चेक है”।

इस क्रिप्स मिशन के भारत में असफल हो जाने के बाद तब गांधी जी ने भारत में एक ऐसे आंदोलन को शुरू किया जो भारत की अंतिम सबसे बड़ी स्वंत्रता के लिए लड़ाई में से एक बना और यह आंदोलन गांधी जी द्वारा 1942 में शुरू किया गया अंग्रेजों के विरुद्ध “भारत छोड़ो आंदोलन” था। 

इस आंदोलन को “अगस्त क्रांति” के नाम से भी संबोधित किया जाता है। 

गांधी जी द्वारा इस आंदोलन की शुरुआत 8 अगस्त, 1942 में कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन में की थी। 

इसके बाद अंग्रेजों द्वारा ऑपरेशन जीरो ऑवर चलाया गया जिसके तहत गांधी जी सहित लगभग सारे बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। 

गांधी जी को अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार करके आगा खां पैलेस में कैद करा गया था और अंग्रेजों की ओर से पूरी कोशिश इस आंदोलन को दबाने की हो रही थी, परंतु इस आंदोलन के दूसरी पंक्ति के नेताओं ने अलग-अलग क्षेत्रों से यह आंदोलन जारी रखा, इसके साथ-साथ लोगों ने भी इस आंदोलन में खूब सहयोग किया था और यह आंदोलन भारत के अंतिम सबसे बड़ी स्वंत्रता संग्राम की लड़ाई में से एक बना। 

इस प्रकार गांधी जी का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा था। 

दोस्तों, बाद में तो हम सब जानते हैं की हमारे प्यारे भारत को इतने सालों की गुलामी के बाद 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी मिली, परंतु इस आज़ादी में हमने हमारे एक हिस्से को खो दिया जिसे वर्तमान पाकिस्तान कहा जाता है। 

इस विभाजन के क्रम में भारत को कई सांप्रदायिक हिंसाओं का सामना भी करना पड़ा जिसमें कई लोगों को अपनी जान देनी पड़ी थी और इस हिंसा के क्रम में गांधी जी द्वारा उनका समय उन लोगों को संतावना देने में गुजरा था और बंगाल में कलकत्ता में वे हिंसा में आहत हुए लोगों की मदद करने के लिए भी उस समय गए हुए थे। 

अंत में 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, क्योंकि नाथूराम गोडसे के कुछ विचार गांधी जी के साथ नहीं मिलते थे। 

Gandhi Yug – गांधी युग

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई Gandhi Yug ( गांधी युग ) के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न

Gandhi Yug ( गांधी युग ) क्या है?

गांधी युग से हमारे यह कहने का मतलब है की वह समय काल जिसमें महात्मा गांधीजी द्वारा भारतीय स्वंतंत्रता संग्राम में ऐसी भूमिका निभाई गई जिससे भारत को आज़ादी प्राप्त होने में काफी महत्वपूर्ण योगदान मिला था।

गांधी जी अफ्रीका से भारत कब आए?

दक्षिण अफ्रीका से गांधी जी पुनः भारत 9 जनवरी 1915 को वापस लौटे थे और इस दिन को भारत में प्रतिवर्ष प्रवासी दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। 

गांधीजी ने कौन कौन से आंदोलन चलाए?

1. चम्पारण सत्याग्रह ( 1917 )
2. अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन ( 1918 )
3. खेड़ा आंदोलन ( 1918 )
4. खिलाफत आंदोलन ( 1919 – 1922 )
5. असहयोग आंदोलन ( 1920 )
6. सविनय अवज्ञा आंदोलन ( 1930 – 1934 )
7. दांडी मार्च ( 12 मार्च, 1930 – 6 अप्रैल 1930 )
8. व्यक्तिगत सत्याग्रह ( 1940 )
9. भारत छोड़ो आंदोलन ( 1942 )

गांधीजी का दूसरा आंदोलन कौन सा था?

गांधी जी ने अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों के साथ प्रथम बार भूख हड़ताल की नीति को अपनाया था और इस भूख हड़ताल का परिणाम गांधी जी के पक्ष में आया था। 

महात्मा गांधी के गुरु का क्या नाम था?

भारत वापस आने के क्रम में उन्होंने भारत की पृष्ठभूमि और राजनीतिक स्थिति को समझने का प्रयास किया और इस क्रम में वे गोपाल कृष्ण गोखले जी से काफी प्रभावित हुए और उन्हें अपना गुरु मान लिया था। 

गांधी जी को महात्मा गांधी की पदवी देने वाले कौन थे?

रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा गांधी जी को महात्मा की उपाधि दी गई और उसके बाद से उन्हें महात्मा गांधी के नाम से बुलाया जाने लग गया था। 

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