History of Babur in Hindi

History of Babur in Hindi – पूरा विवरण, प्रारंभिक संघर्ष, भारत पर आक्रमण

History of Babur in Hindi – दोस्तों, हमने अभी तक दिल्ली सल्तनत के बारे में हमारे पिछले आर्टिकल्स में पढ़ा की कैसे दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई और दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने क्या क्या कार्य करे, अब हम मुग़ल वंश के बारे में पढ़ेंगे की कैसे मुग़ल वंश की स्थापना हुई, बाबर का इतिहास ( history of babur ) और उस दौर की मुख्य घटनाएं।

मुग़ल वंश के आगमन पर भारत का राजनीतिक इतिहास

मुग़ल वंश का पहला शाशक बाबर ( babur ) जब भारत में अपनी सत्ता कायम करने 1526 में आता है तब उस वक़्त भारत में दिल्ली सल्तनत का आखरी वंश, लोदी वंश का सुल्तान इब्राहिम लोदी शाशन कर रहा था और दक्षिण भारत में दो नए राज्य विजयनगर और बहमनी उभर कर आ चुके थे।

बहुत सारे छोटे छोटे राज्य बन चुके थे, भारत की राजनीतिक स्थिति विखंडन के दौर पर आ चुकी थी, और ऐसे समय में कोई भी विदेशी आक्रमणकारी भारत में आक्रमण करके हानि पहुंचा सकता था और इसी बात का फायदा उठाकर मुग़ल वंश का पहला शाशक बाबर भारत में अपनी सत्ता जमाने आया।

History of Babur in Hindi ( 1526 – 1530 ) – मुगल वंश का परिचय

मुग़ल वंश दो वंशो से मिलकर उत्पन्न हुआ वंश था, और एक लड़ाकू योद्धाओं का समूह था। वे तुर्क के चगताई शाखा से संबंधित थे।

मुग़ल वंश मंगोलों और तुर्कों से मिलकर उत्पन्न हुआ वंश था और मुग़ल का अर्थ होता है बहादुर।

बाबर का इतिहास – बाबर मुग़ल वंश का संस्थापक था और उसका वास्तविक नाम जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर था। उसके पिता का नाम उमर शेख मिर्ज़ा था और उसके पिता तैमूर के वंशज थे, जो की तुर्क से संबंधित थे। उनकी माता का नाम कुतलुग निगार खानम था, जो की मंगोलो की वंशज थी और इस प्रकार इन दोनों वंशो से मिलकर उत्पन्न हुआ था मुग़ल वंश।

बाबर का जन्म 14 फरवरी 1483 को तुर्क क्षेत्र के फरगना नामक स्थान पर हुआ था।

बाबर के पिता फरगना के एक शासक थे और वह अपने पिता के साथ ही राजनीतिक दांव पेच और युद्ध कौशल सीख रहा था। उसके पिता के उनके पड़ोसियों और रिश्तेदारों से अच्छे सम्बन्ध नहीं थे और कई बार उसके पिता को संघर्ष करना पड़ता था।

इन्ही संघर्षों के क्रम में उमर शेख मिर्ज़ा जो बाबर के पिता थे, उनसे उनके साले ने संघर्ष किया और 1494 में उसके पिता की मृत्यु हो गयी और बहुत ही कम आयु में बाबर को सत्ता प्राप्त हो गयी और मात्र 11-12 वर्ष की आयु में उसे मजबूरी में फरगना का शाशन संभालना पड़ा और क्यूंकि उसके पिता के संबंध उनके रिश्तेदारों से अच्छे नहीं थे इसलिए शाशक बनने के साथ साथ उसके सामने कई चुनौतियां आयी।

उसकी चुनौतियां थी जैसे की छोटी सी आयु में अपने आप को स्थापित करने की चुनौती, अपने रिश्तेदारों के समक्ष अपने आप को स्थापित करना, और अपने रिश्तेदारों की कूट नीतियों से अपने आप को बचाने की चुनौती और इन्ही चुनौतियों के साथ बाबर का प्रारंभिक जीवन निराशा और कुछ उल्लास दोनों के बीच गुजरा।

बाबर के प्रारंभिक संघर्ष

अब हम बाबर का इतिहास ( babur in hindi ) में हम उसके प्रारंभिक जीवन के बारे में जानते है, बाबर ने अपने प्रारंभिक जीवन में अपने आसपास के क्षेत्रों से कई संघर्ष किये, जो कुछ इस प्रकार हैं:

समरकंद तुर्की क्षेत्र की राजधानी हुआ करती थी, तो बाबर का प्रयास हमेशा से ही रहा की समरकंद पर विजय पाई जाए और वहां पर अपना शासन स्थापित किया जाए और ऐसे में उसने समरकंद पर कई अभियान चलाये।

1. 1494 में जिस वर्ष उसके पिता की मृत्यु हुई उसी वर्ष से उसने अभियान करना शुरू कर दिए और 1494 में समरकंद पर अभियान किया परंतु वह असफल रहा।

2. 1497 में उसने फिर समरकंद पर अभियान चलाया, इस बार उसे विजय मिली परंतु वह वहां ज्यादा दिनों तक शाशन जमा नहीं पाया और मात्र 100 दिन के भीतर उसे वहां से भागना पड़ा।

3. 1501 में वह फिर से समरकंद पर अभियान करने के लिए चला और उसे फिर से विजय प्राप्त हुई परंतु इस बार भी वह वहां ज्यादा दिनों तक शासन जमा नहीं पाया और इस बार 8 माह के लिए वहां शासन किया।

4. 1504 में उसे पता चला की काबुल क्षेत्र में उस समय अराजकता की स्थिति बनी हुई है इसलिए उसने समरकंद न जाकर भारत की तरफ काबुल और गजनी गया और दोनों क्षेत्रों में विजय पाई।

इसी विजय की खुशी में बाबर ने 1507 में “पादशाह” नामक उपाधि धारण की। बाबर के पूर्वज मिर्ज़ा की उपाधि धारण करते थे परंतु बाबर पहला था जिसने पादशाह की उपाधि धारण की।

5. 1511 में फिर उसने एक बार समरकंद पर अभियान करने का प्रयास किया और इस बार उसे फिर से विजय प्राप्त हुई परंतु फिर से 1512 में वह अपना समरकंद से शासन खो बैठा।

इस प्रकार बाबर यह समझ गया था की ईरान और तुर्क क्षेत्रों की तरफ राजनीतिक स्थिति बहुत ही मजबूत है और वह वहां सत्ता नहीं कायम कर पाएगा और इसी बीच में उसे भारत की तरफ आने के कई न्योते मिल रहे थे और सूचनाएं मिल रही थी की भारत की तरफ राजनीतिक स्थिति कमज़ोर है और इस तरफ विजय पाना ज्यादा आसान है।

इसलिए उसने निर्णय लिया की वह मध्य एशिया और समरकंद को छोड़कर अब वह भारत की तरफ अभियान करेगा।

इस प्रकार बाबर को उसके प्रारंभिक जीवन में कई सफलताएं और कई असफलताएं मिली और उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है की वह अपने प्रारंभिक जीवन में किसी एक जगह पर दो रमज़ान नहीं मना पाया अर्थात वह अपने प्रारंभिक जीवन में इधर से उधर भागता रहा, कभी जीतने के लिए और कभी हारने के बाद और एक जगह उसकी स्थायी स्थिति नहीं बन पायी।

बाबर का भारत पर आक्रमण

1. 1519 में बाबर ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा क्षेत्र के बाजौर और भेरा नामक स्थानों पर विजय प्राप्त की और वहां पर अधिकार किया परन्तु बाद में वापस लौट गया और वहां स्थाई सत्ता नहीं स्थापित की क्यूंकि वह जानना चाहता था की भारत में प्रवेश करने के लिए उसे किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और उसने कई छोटे-छोटे युद्ध लड़े और उनमे जीत हासिल की और उससे उसका मनोबल बढ़ा और अंत में वह पानीपत का युद्ध लड़ता है।

2. 1519 में ही उसने एक और अभियान किया और पेशावर तक के क्षेत्र पर विजय हासिल की और वह फिर से वापस लौट गया।

3. 1520 में उसने बाजौर और भेरा से लेकर पंजाब के सियालकोट तक जो आज वर्तमान में पाकिस्तान में है, वहां तक अधिकार कर लिया।

4. 1524 में उसने लाहौर और लगभग पंजाब के अधिकांश भाग पर विजय प्राप्त कर ली थी।

इन अभियानों के दौरान भारत के राजाओं का ध्यान बाबर की तरफ जा रहा था और उस समय दिल्ली पर राज कर रहे दिल्ली सल्तनत के आखरी वंश के सुल्तान इब्राहिम लोदी को सूचना मिल रही थी की बाबर सीमा क्षेत्र में अभियान कर रहा है लेकिन इब्राहिम लोदी ने उस वक़्त कोई कदम नहीं उठाये और फैसला किया की जब बाबर दिल्ली के लिए प्रस्थान करेगा तब वे उससे सामना करेंगे।

बाबर के आगमन के समय भारत की राजनीतिक स्थिति

History of Babur in Hindi- भारत में अधिकांश शासन मुस्लिम शासकों द्वारा चलाया जा रहा था परन्तु कुछ क्षेत्रो में हिन्दू शाशन भी चल रहा था जैसे की दिल्ली में दिल्ली सल्तनत के मुस्लिम शाशक थे, दक्षिण भारत में कृष्ण देवराय के शाशन में विजयनगर साम्राज्य था, बहमनी साम्राज्य 5 भागो में टूट गया था और पाँचो भागों में मुस्लिम शाशक थे, मेवाड़ क्षेत्र में राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत शाशन चल रहा था।

परंतु इन सभी शाशको में आपस में संघर्ष होता रहता था और बाबर के लिए ये एक उचित अवसर था की वह भारत में प्रवेश करे।

बाबर को भारत में आने के लिए कई निमंत्रण भी मिलते है जैसे की पंजाब के शाशक दौलत खां द्वारा उसे भारत में आने का निमंत्रण मिला था और इब्राहिम लोदी के चाचा द्वारा भी बाबर को भारत में आने का निमंत्रण मिला था और राणा सांगा द्वारा भी उसे सहमति मिली थी की अगर बाबर दिल्ली पर आक्रमण करता है तो वह भी बाबर की इसमें मदद करेगा।

इन्हीं सब कारणों से उत्साहित होकर बाबर 1526 में भारत के आंतरिक भागो पर आक्रमण करता है।

पानीपत का प्रथम युद्ध

बाबर का भारत में ये पांचवा आक्रमण था और सबसे महत्वपूर्ण आक्रमण था। बाबर ने 21 अप्रैल 1526 को पानीपत का प्रथम युद्ध दिल्ली सल्तनत के लोदी वंश के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ लड़ा और उसे पराजित कर भारत पर अपनी विजय प्राप्त की।

इब्राहिम लोदी दिल्ली सल्तनत का आखरी शाशक होने के साथ साथ पहला शाशक भी था जो युद्ध भूमि में मारा गया था और इसके साथ ही दिल्ली सल्तनत का शाशन भी खत्म हो गया था।

पानीपत के प्रथम युद्ध की विशेषताएं

1. इस युद्ध में प्रथम बार तोपखाने का प्रयोग हुआ था, भारत में पहली बार तोपों का प्रयोग बाबर ने शुरू किया था।

2. इस युद्ध में बाबर ने एक नई युद्ध नीति का प्रसार किया, जिसका नाम “तुलगमा नीति” था, जो उसने मध्य एशिया की एक “उजबेग” नामक जनजाति से सीखी थी और उसका प्रयोग उसने भारत में किया।

3. तोपों को सजाने के लिए अर्थात उन्हें क्रमबद्ध रूप में किस तरह से लगाया जाए इसलिए उसने “उसमानी विधि” का प्रयोग किया।

4. तोपों के संचालन के लिए उस्ताद अली कुली नामक व्यक्ति था।

5. बंदूकधारियों का नेतृत्व उस्ताद मुस्तफा ने किया था।

इन दोनों व्यक्तियों के नेतृत्व में बाबर की सेना ने इतना अच्छा प्रदर्शन किया था की इब्राहिम लोदी की विशाल सेना जिसमे करीब 1 लाख सैनिक थे और बाबर की सेना में सिर्फ 12000 के करीब ही सैनिक थे फिर भी बहुत बुरी तरह से इब्राहिम लोदी की सेना को बाबर की सेना ने हराया था और कहा जाता है की सुबह-सुबह युद्ध शुरू हुआ और दोपहर तक युद्ध समाप्त भी हो गया था और इब्राहिम लोदी की मृत्यु हो चुकी थी।

6. 1526 में बाबर ने अपने आप को बादशाह घोषित कर दिया और भारत में मुग़ल वंश की स्थापना कर दी थी।

7. बाबर ने युद्ध के बाद उदारता का परिचय देते हुए उसने लोगों में चाँदी के सिक्के बटवाएँ और इसी उदारता के कारण लोगों ने उसे “कलंदर” नामक उपाधि दी थी।

खानवा का युद्ध

इस युद्ध में बाबर ने राणा सांगा के साथ 1527 में युद्ध किया, राणा सांगा जो मेवाड़ के एक राजपूत राजा थे और बाबर को भारत पर आक्रमण का निमंत्रण देने वालों में से एक थे।

राणा सांगा के बारे में ये कहा जाता है की वे बहुत ही बहादुर योद्धा थे और उन्होंने 100 के क़रीब लड़ाई लड़ी थी और उनके शरीर पर 80 से अधिक घाव के निशान थे और बहुत ही शक्तिशाली योद्धा के रूप में जाने जाते थे, इसलिए बाबर और राणा सांगा के बीच में कठोर संघर्ष इस युद्ध में हुआ।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है इब्राहिम लोदी बहुत ही लाचार और डरपोक शासक था और इसलिए ही उसे पानीपत का युद्ध लड़ने में बहुत आसानी हुई, परंतु राणा सांगा के सम्बंध में बाबर को संघर्ष करना पड़ा।

बाबर को भारत में एक स्थायी शाशन बनाने के लिए राणा सांगा जैसे राजा को हराना था, क्यूँकि उस समय उत्तर भारत में राणा सांगा एक मज़बूत शासक थे।

उसने राणा सांगा के विरुद्ध जनता को और सेना को उत्साहित किया और इसी क्रम में उसने “जिहाद” का नारा भी दिया और सबको शराब छोड़ने की नसीहत दी ताकि लोगों और सेना को लगे की वो बहुत ही नियंत्रित राजा है और इस युद्ध को लेकर राजा बहुत उत्साहित है।

बाबर ने जिहाद ( इस्लाम की रक्षा हेतु धर्म युद्ध ) को लेकर खानवा का युद्ध लड़ा और इस युद्ध को धर्म युद्ध के रूप में पेश किया।

बाबर के पास कोई कारण नहीं था राणा सांगा से युद्ध करने के लिए इसलिए उसने एक ज़बरदस्ती का कारण यह दिया की इब्राहिम लोदी के विरुद्ध युद्ध में राणा सांगा के वादे के मुताबिक़ राणा सांगा ने बाबर का साथ नहीं दिया, इसलिए वह राणा सांगा के साथ युद्ध करेगा।

परंतु राणा सांगा ने यह सोचा था की बाबर, महमूद गजनवी की तरह भारत पर आक्रमण करके और धन लूट के वापस चला जाएगा, परंतु बाबर को एक स्थायी सत्ता की खोज थी जो उसे दिल्ली में इब्राहिम लोदी को हराकर मिल चुकी थी और वह वापस ना जा कर भारत में ही रहा इसलिए उन दोनो के बीच भीषण संघर्ष हुआ था और बाबर को इसमें विजय प्राप्त हुई।

युद्ध के बाद बाबर ने “गाज़ी” ( काफ़िरों को मारने वाला ) नामक उपाधि धारण की क्यूँकि उसने कई राजपूतों की हत्या की थी और कहा जाता है की उसने इतना भीषण युद्ध लड़ा की उसने राजपूतों के सिर कटवा कर एक मीनार के रूप में खड़ा करवा दिया और लोगों और सेना को दिखाया की उसने जिहाद को सफल बनाया है।

चन्देरी का युद्ध

चन्देरी का युद्ध बाबर ने 1528 में लड़ा। चन्देरी, मालवा और बुंदेलखंड की सीमा पर स्थित एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और राजनीतिक केंद्र था।

चन्देरी के राजा का नाम मेदनीराय था और मेदनीराय, राणा सांगा का एक सरदार था जो चन्देरी में रहकर शाशन व्यवस्था संभालता और चलाता था। यह भी राजपूत राजा था और इसने खानवा के युद्ध में बाबर के विरुद्ध राणा सांगा की मदद की थी।

बाबर ने मेदनीराय को संदेशा भेजा की वह अपने आप को बाबर को समर्पित कर दे और बाबर की अधीनता स्वीकार कर ले, परंतु मेदनीराय ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और फिर बाबर ने मेदनीराय के साथ चन्देरी का युद्ध लड़ा।

युद्ध में बाबर ने मेदनीराय को पराजित कर दिया और उसकी दो पुत्रियों को अपने दो बेटे हुमायूँ और कामरान को भेंट स्वरूप उपहार में दे दिया था।

इस युद्ध में भी बाबर ने जिहाद का नारा दिया और बहुत राजपूतों की हत्या कर के उनके सिर कटवा कर मीनार के रूप में लगवाया।

घाघरा का युद्ध

यह युद्ध बाबर ने 1529 में अफ़ग़ान मुसलमानो और महमूद लोदी के साथ लड़ा।

महमूद लोदी जो की इब्राहिम लोदी का भाई था जिसे बाबर ने पानीपत के युद्ध में हराया और उसकी हत्या की थी।

महमूद लोदी जो की अफ़ग़ान मुसलमान थे, वो बिहार क्षेत्र में जाकर शाशन कर रहे थे और वहाँ से वो बाबर की सीमा में बार-बार प्रवेश करके उससे संघर्ष और उसे परेशान करते थे और यही उनका प्रयास रहता था।

बाद में बाबर ने बिहार की तरफ अभियान करने का फ़ैसला किया और बिहार के तरफ बढ़ने लगा और घाघरा नदी के किनारे बाबर और अफ़ग़ान मुसलमानो और उनके शासक महमूद लोदी के बीच घाघरा का युद्ध हुआ।

बाबर ने महमूद लोदी को पराजित कर दिया और महमूद लोदी बंगाल क्षेत्र की तरफ भाग गया।

बाबर की मृत्यु

History of Babur in Hindi – घाघरा का युद्ध बाबर के लिए अंतिम युद्ध साबित हुआ और बाबर की मृत्यु 26 दिसंबर 1530 को हो गई, परंतु कई किताबों में आपको यह तिथि अलग लिखी हुई मिल सकती है।

बाबर ने आगरा में आरामबाग नामक नगर का निर्माण करवाया था, उसके शव को पहले आरामबाग में दफनाया गया था, परंतु उसने अपनी आत्मकथा में ये इच्छा ज़ाहिर करी थी की उसे काबुल में दफनाया जाए, और बाद में उसे आरामबाग से निकालकर काबुल में दफनाया गया।

इस प्रकार पहले उसे आगरा के आरामबाग में दफनाया गया और बाद में काबुल में दफनाया ( babur tomb ) गया।

History of Babur in Hindi
History of Babur in Hindi – बाबर का मकबरा

बाबर की मृत्यु को लेकर कई तथ्य

बाबर की मृत्यु को लेकर कई अलग-अलग बातें है जो कुछ इस प्रकार है:

1. कुछ इतिहासकारों के अनुसार बाबर भारत की जलवायु के हिसाब से नहीं रह पा रहा था और भारत की जलवायु के हिसाब से अपने आप को नहीं ढाल पा रहा था इसलिए उसकी मृत्यु हुई।

2. कुछ इतिहासकारों के अनुसार बाबर को नशीले पदार्थ लेने की आदत थी जैसे अफ़ीम, शराब, भांग इसलिए वह बीमार हुआ और उसकी मृत्यु हुई।

3. एक साहित्यिक स्त्रोत, जो की गुलबदन बेगम द्वारा लिखा हुमायूँनामा है, उससे यह जानकारी प्राप्त होती है की बाबर ने इब्राहिम लोदी की माँ के हाथ की खीर खायी थी, और इब्राहिम लोदी की माँ ने उस खीर में ज़हर मिलाया था जो धीरे-धीरे असर कर रहा था, इसलिए बाबर की मृत्यु हुई।

बाबर से जुड़े कुछ अन्य बिन्दु

1. बाबर ने अपनी आत्मकथा लिखी जिसका नाम “तुजुक-ऐ-बाबरी“, जिसे बाबरनामा ( baburnama ) के नाम से भी जाना जाता है, यह किताब उसने तुर्क भाषा में लिखी थी और वह पहला मुग़ल शासक था जिसने अपनी आत्मकथा लिखी थी।

2. बाबर ने “रिसाल-ऐ-उसज“, जिसे “ख़त-ऐ-बाबरी” नाम से भी जाना जाता है, इस किताब की रचना की थी।

3. उसने मुबइयान नामक पदशैली जो की एक लेखनशैली थी उसकी शुरूवात की थी, जो अपने साहित्यिक दृष्टि से काफ़ी प्रचलित रही थी।

4. उसने एक शाहरूख नामक सिक्का, जो की एक चाँदी का सिक्का था वह चलवाया था।

5. बाबर के एक सेना नायक मीर बाक़ी द्वारा “बाबरी मस्जिद” का निर्माण मंदिरो को हटवा के करवाया गया था।

History of Babur in Hindi

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई History of Babur in Hindi के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


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