History of Humayun in Hindi

History of Humayun in Hindi – असफलता, प्रारंभिक चुनौतियाँ, निष्कासित जीवन

History of Humayun in Hindi – दोस्तों, पिछले आर्टिकल में हमने पढ़ा था की कैसे बाबर द्वारा भारत में मुग़ल वंश की स्थापना की जाती है और उसके द्वारा कई युद्ध भी लड़े गए परन्तु भारत में मुग़ल वंश की स्थापना के बाद वह ज्यादा दिनों तक शासन नहीं चला पाता और स्थापना के चार वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो जाती है।

बाबर के बाद उसका पुत्र हुमायूँ, जिसे उसने अपना उत्तराधिकारी चुना था वह शासन संभालता है, परन्तु भारत में मुग़ल वंश अभी भी स्थायी रूप से स्थापित नहीं हो पाया था और हुमायूँ के सामने कई चुनौतियां थी। 

हुमायूँ का कार्यकाल दो चरणों में विभाजित है पहला है 1530 से 1540 जिसमे वह अपने पिता बाबर की मृत्यु के बाद से लेकर शेर शाह सूरी के द्वारा पराजित होने तक शासन करता है और दूसरा है 1555 से 1556, शेर शाह सूरी के वंशज साम्राज्य को नहीं संभाल पाते हैं, जिसके फलस्वरूप हुमायूँ वापस आकर मुग़ल सत्ता फिरसे भारत में स्थापित करता है।

हुमायूँ का परिचय 

हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल में हुआ था, उसका वास्तविक नाम नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ था। 

उसके पिता का नाम बाबर था और उसकी माता का नाम माहम बेगम था, उसकी शिक्षा-दिक्षा बहुत अच्छे से हुई थी और बाबर भी उसे युद्ध कौशल की शिक्षा देता था और अपने साथ अनेक युद्ध में साथ रखता था जैसे बाबर का पानीपत का युद्ध और खानवा का युद्ध आदि और वह भी अपने पिता का सेना संचालन में साथ देता था और उसकी सैन्य शिक्षा की शुरुवात वहीं से हो गई थी।

हुमायूँ का राज्याभिषेक उसके पिता बाबर की मृत्यु के चार दिन बाद यानी 30 दिसम्बर 1530 को आगरा में हुआ था, उसके 3 भाई थे जो अलग अलग माता के पुत्र थे और एक बहन थी। 

हुमायूँ के भाईउनकी माता    
कामरानगुलरुख बेगम   
अस्करीगुलरुख बेगम   
हिन्दाल दिलदार बेगम
History of Humayun in Hindi

हुमायूँ की बहन का नाम था गुलबदन बानो बेगम, जिन्होंने “हुमायूँनामा” की रचना की थी, जिसमे हमे हुमायूँ के बारे में पता चलता है और उसके संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। 

हुमायूँ की प्रारंभिक चुनौतियाँ 

जिस समय हुमायूँ शासक बनता है, उस समय उसके सामने कई चुनौतियां आती है, क्यूंकि उसके पिता बाबर ने भारत में पानीपत का युद्ध, खानवा का युद्ध, चन्देरी का युद्ध, घाघरा का युद्ध लड़के भारत में मुग़ल सत्ता तो स्थापित कर ली थी परंतु उसे एक स्थायी रूप देने से पहले ही उसकी मृत्यु हो जाती है और हुमायूँ शासक बनता है और उसे चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, आइये उन चुनौतियों पर दृष्टि डालें:

साम्राज्य का विभाजन 

मुग़ल जिस क्षेत्र से आये थे उस क्षेत्र में रिवाज़ था की पिता की मृत्यु के बाद पुत्रों में साम्राज्य का विभाजन होता था और बाबर ने भी मृत्यु से पूर्व हुमायूँ से कहा था की उसकी मृत्यु के बाद साम्राज्य को सभी भाइयों में विभाजित कर देना हालांकि बाबर ने हुमायूँ को ही अपना उत्तराधिकारी चुना था। 

परन्तु साम्राज्य का विभाजन करने से साम्राज्य की शक्तियां कम होने लगती हैं, यही हुमायूँ के सामने चुनौती थी। 

उसने साम्राज्य को विभाजित किया और अपने भाइयों को अलग अलग क्षेत्र सौंप दिए, उसने कामरान को काबुल और कांधार ( मूल रूप से अफगानिस्तान का क्षेत्र ) का क्षेत्र सौंप दिया। 

उसने अस्करी को सम्भल का क्षेत्र और हिन्दाल को मेवात का क्षेत्र सौंप दिया और वह स्वंय दिल्ली और आगरा के क्षेत्र में शासन करता है, कई इतिहासकार यह मानते है की हुमायूँ की असफलता का सबसे बड़ा कारण साम्राज्य का विभाजन करना था क्यूंकि उसका साम्राज्य और सैन्य शक्ति बहुत कमज़ोर हो गई थी। 

इसके साथ साथ हुमायूँ इतना उदार था की उसने अपने चचेरे भाई जिसका नाम सुलेमान मिर्ज़ा था उसे भी बदखशाँ नामक क्षेत्र सौंप दिया और कहा जाता है की हुमायूँ राजा बनने से पहले बदखशाँ का ही सूबेदार हुआ करता था और वही उसने शासन के गुण सीखे थे।

बाबर की विरासत 

बाबर ने भारत में दिल्ली और आगरा के अगल-बगल लगभग सारे भूमि को जीत लिया था और अपने पुत्रों को उस भूमि को विरासत के रूप में छोड़ गया था, परंतु उस साम्राज्य को पूरी तरह से स्थायी बनाना चुनौती थी। 

अभी भी भारत में मजबूत विरोधी बचे हुए थे और हुमायूँ को बहुत से शासकों के साथ संघर्ष करना था। 

हुमायूँ का व्यक्तित्व 

हुमायूँ के संबंध में इतिहास में कहा जाता है की वह बहुत ही विद्वान व्यक्ति था, सैन्य मामले और सैन्य दृष्टि से काफी कुशल व्यक्ति था परंतु युद्ध का नेतृत्व करना, अपने साम्राज्य को कैसे स्थायी बनाना है, दूरदर्शिता इन सब मामलो में हुमायूँ थोड़ा कमजोर था, जिसके फलस्वरूप वह एक विशाल साम्राज्य की स्थापना नहीं कर पाता है और न ही उस साम्राज्य को बचा पाता है, हालांकि बाद में कुछ वर्षों बाद, वह उस हारे हुए साम्राज्य को फिर से हासिल करने में सफल हो जाता है। 

History of Humayun in Hindi – हुमायूँ द्वारा लड़े गये युद्ध

आइये अब हम हुमायूँ द्वारा लड़े गए युद्धों के बारे में जानते है:

कलिंजर पर आक्रमण 

हुमायूँ ने शासक बनते ही 1531 में कलिंजर के किले पर आक्रमण कर दिया था, और कलिंजर के शासक थे प्रताप रुद्रदेव

प्रताप रुद्रदेव के अफगानो से मित्रतापूर्ण संबंध थे, ये वही अफगान थे जिनका शासक महमूद लोदी था, जिसने बाबर के साथ घाघरा का युद्ध लड़ा था और इसकी वजह से हुमायूँ की कलिंजर पर नज़र थी और इसलिए उसने कलिंजर पर आक्रमण करा। 

हुमायूँ ने कलिंजर पर आक्रमण करके बहुत दिनों तक घेरा डाल कर रखा था और पूरी तरह से आक्रमण नहीं किया, इसलिए बहुत दिनों बाद कलिंजर के किले के बाहर हुमायूँ और प्रताप रुद्रदेव के बीच संधि हो गयी और प्रताप रुद्रदेव ने हुमायूँ को धन और छतिपूर्ति दी और इसी बात से हुमायूँ खुश हो गया कि प्रताप रुद्रदेव ने उसकी अधीनता स्वीकार ली है, संधि के बदले धन और संपत्ति दे दी है और वह इस बात से खुश होकर वापस लौट आया।   

इस प्रकार हुमायूँ के संधि करने के कारण वह कलिंजर का किला नहीं जीत पाता है, परंतु उसे खूब सारा धन जरूर प्राप्त हो जाता है, लेकिन इतिहास में कहा जाता है की अगर वह कलिंजर का किला जीत लेता तो भविष्य में कभी कलिंजर की तरफ से विद्रोह दुबारा नहीं होता और यही उसका व्यवहार था जिससे कहा जा सकता है की बाद में उसके असफल होने का कारण बनता है। 

दोहरिया का युद्ध 

यह युद्ध हुमायूँ ने अफगान शासक महमूद लोदी के साथ 1532 में लड़ा था, महमूद लोदी वही था जिसने हुमायूँ के पिता बाबर के साथ घाघरा का युद्ध लड़ा था और वह हार के बंगाल क्षेत्र में भाग जाता है।

दोहरिया, उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में है, महमूद लोदी लोदी बंगाल से फिर बिहार और वहां से होता हुआ अवध क्षेत्र में आता है और उसकी सहायता शेर खां करता है, ये शेर खां बाद में “शेर शाह सूरी” के नाम से भारत में प्रसिद्ध होता है। 

हुमायूँ इस बात से दुखी था की अफगान शासक महमूद लोदी, बंगाल से बिहार और अब अवध क्षेत्र तक आ गया है इसलिए दोनों के बीच दोहरिया का युद्ध होता है और हुमायूँ को इस युद्ध में विजय प्राप्त होती है और महमूद लोदी को फिर से भागना पड़ जाता है।

यह भी पढ़े : history of sher shah suri in hindi

यह भी पढ़े : शेर शाह सूरी का प्रशासन

चुनारगढ़ का घेराव 

1532 में ही महमुद लोदी को हराने के बाद हुमायूँ अवध क्षेत्र से ही आगे बढ़ता जाता है और उससे पहले तब तक शेर खां जो दोहरिया युद्ध में महमूद लोदी का साथ देता है वह चुनारगढ़ के किले में पहुँच चुका होता है, बाद में हुमायूँ भी चुनारगढ़ के किले तक पहुँच जाता है और चुनारगढ़ के किले को घेर लेता है। 

शेर खां के चुनारगढ़ के किले को हुमायूँ लम्बे समय तक घेरे रखता है और शेर खां से चुनारगढ़ का किला छीनने का प्रयास करता है, बहुत दिन बीत जाने के बाद अंत में परिणाम यह निकलता है की यहाँ भी हुमायूँ संधि कर लेता है और यह उसकी सबसे बड़ी गलती साबित होती है क्यूंकि अगर वह शेर खां को इसी समय हरा देता तो बाद में उसे शेर खां से पराजित होकर भारत नहीं छोड़ना पड़ता। 

संधि में शेर खां ने हुमायूँ को बहुत सारा धन दिया और इसके साथ शेर खां ने अपने पुत्र कुतुब खां को भी हुमायूँ की सेवा में भेज दिया था और इस संधि से खुश होकर वापस लौट आता है और फिर वह “दीन पनाह” का निर्माण करवाता है और अपने भोग विलास के जीवन में व्यस्त हो जाता है।

बहादुर शाह से संघर्ष 

बहादुर शाह, गुजरात के क्षेत्र का शासक था, जो एक शक्तिशाली प्रतिद्वंदी के रूप में उभर रहा था और 1535-1536 के बीच हुमायूँ उसे पराजित करने के लिए गुजरात क्षेत्र के लिए निकल पड़ा, परंतु जब हुमायूँ बहादुर शाह को पराजित करने के लिए जाता है तब बहादुर शाह चित्तौड़ में महारानी कर्णवती से युद्ध करने के लिए पहुँचा हुआ होता है।

महारानी कर्णवती विक्रमजीत की संरक्षिका थी, बहादुर शाह और चित्तौड़ के बीच युद्ध होने वाला था, तब महारानी कर्णवती ने हुमायूँ को एक पत्र लिखा की आप मेरे भाई जैसे है और हमें बहादुर शाह के ख़िलाफ़ मदद पहुँचाइए। 

परंतु बहादुर शाह ने भी हुमायूँ को एक पत्र लिखा की मैंने इन ग़ैर मुस्लिमों के विरुध एक जिहाद छेड़ा है और आप भी मुस्लिम हैं, और इस जिहाद में मेरा साथ देंगे और हमसे युद्ध नहीं करेंगे।

इस वजह से हुमायूँ को दोनो में से किसी एक की बात सुननी थी और अंत: वह महारानी कर्णवती की मदद नहीं करता है।

बहादुर शाह जब चित्तौड़ से जीत कर वापस लौटता है तब उसका संघर्ष हुमायूँ से होता है और हुमायूँ मालवा और गुजरात के क्षेत्र पर अधिकार कर लेता है और इसके साथ हुमायूँ दो क़िले माण्डू और चम्पानेर को भी जीत लेता है, यहाँ पर वह बहुत सारा धन भी प्राप्त करता है। 

हुमायूँ धन लेकर वापस लौट जाता है और अपने भाई को यहाँ शासन करने के लिए अधिकार सौंप देता है, परंतु वह बहादुर शाह को मारने में असफल हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप बहादुर शाह अपनी शक्ति का विस्तार कर के एक वर्ष के अंदर ही मालवा और गुजरात के क्षेत्र को दुबारा स्वतंत्र कर देता है।

ये हुमायूँ की कुछ गलतियाँ थी, एक तो वह किसी युद्ध में जीतता नहीं था, वहाँ पर वह संधि कर लेता था और एक जगह वह जीत भी गया था परंतु वहाँ लम्बे समय तक उस जीते हुए भाग को बचा नहीं पाया, ये हुमायूँ के कुछ प्रारंभिक संघर्ष थे, अब हम हुमायूँ के महत्वपूर्ण युद्ध की ओर दृष्टि डालते है: 

चुनारगढ़ की विजय 

1538 में हुमायूँ के पास सूचना पहुँची की बिहार क्षेत्र में शेर खां एक महत्वपूर्ण शक्तिशाली राजा के रूप में उभर रहा है जो की मुग़ल सत्ता को चुनौती दे सकता है, इसलिए गुजरात से आने के बाद उसने बिहार क्षेत्र की तरफ अभियान चलाया और इस क्रम में वह फिर से 1538 में चुनारगढ़ के क़िले में पहुँच गया।

इस बार हुमायूँ ने कोई गलती नहीं की और चुनारगढ़ के किले पर अपना अधिकार कर लिया और तब तक शेर खां वहाँ से आगे बढ़कर बंगाल की तरफ चले गया था और उसने अपने पुत्र कुतुब खां जिसे उसने हुमायूँ की सेवा में सौंप दिया था उसे भी शेर खां ने वापस बुला लिया था।

चुनारगढ़ के किले को जीतकर हुमायूँ बहुत ज़्यादा आत्मविश्वास से भर गया और आगे बढ़ गया यह सोच के की वह शेर खां को हरा देगा  और दूसरी तरफ़ महमूद लोदी की मृत्यु हो गयी थी और वहाँ का शासन पूरी तरह से शेर खां के पास आ गया था। 

चुनारगढ़ के किले से आगे बढ़कर हुमायूँ ने बंगाल क्षेत्र को भी जीत लिया और उसपे अपना अधिकार कर लिया, परंतु जब हुमायूँ बंगाल को जीत रहा था तब उसे एक सूचना मिली की उसके भाई हिन्दाल, जिसे उसने मेवात का क्षेत्र शासन करने के लिए दिया था उसने आगरा में जाके अपने आप को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया है और कुछ विश्वासी लोग जो हुमायूँ के थे उनकी हत्या कर दी है।

जैसे ही हुमायूँ को यह ख़बर मिली, तो वह बंगाल से वापस लौटने लगा, और आपने G.T ( Grand Trunk ) रोड का नाम सुना होगा, हुमायूँ उसी रास्ते से वापस लौटने लगा, वापस आने के क्रम में बिहार में गंगा नदी और कर्मनाशा नदी के क्षेत्र में एक चौंसा नामक क्षेत्र में शेर खां हुमायूँ का इंतज़ार कर रहा था कि हुमायूँ चौंसा आये और वह उससे युद्ध करे क्यूंकि हुमायूँ ने उसके चुनारगढ़ के किले पर अधिकार करा था।

चौंसा का युद्ध

हुमायूँ के वापस आने के क्रम में हुमायूँ और शेर खां के बीच चौंसा का युद्ध 1539 में होता है, जब हुमायूँ और उसकी सेना चौंसा पहुंची, जहाँ शेर खां उसका इंतज़ार कर रहा था तो दोनों सेनायें एक दूसरे के विरुद्ध खड़ी हो गई, परंतु किसी सेना ने कोई भी आक्रमण नहीं किया। 

ऐसा करते-करते बहुत महीने बीत जाते है, लेकिन दोनों सेनाओं में से कोई भी आक्रमण नहीं करता है, शेर खां अच्छे मौके की तालाश कर रहा था, वह बारिश का मौसम आने का इंतज़ार कर रहा था। 

जैसे ही बारिश का मौसम आया, गंगा नदी और कर्मनाशा नदी में बहुत पानी भर गया और रातों-रात शेर खां ने हुमायूँ के सेना पर आक्रमण कर दिया, जिसकी वजह से हुमायूँ को भागना पड़ा और कहा जाता है की वह घोड़े सहित नदी में कूद गया और एक निजाम नामक भिस्ती ( चमड़े के थैले में पानी लाने-लेजाने वाला व्यक्ति ) ने उसकी जान बचाई नहीं तो वह मर गया होता।    

इस प्रकार शेर खां को जीत प्राप्त होती है और वह हुमायूँ को पराजित कर देता है और इसी जीत के उपलक्ष में उसने “शेरशाह” की उपाधि धारण करी, और तभी से उसे “शेरशाह सूरी” के नाम से जाना जाता है। 

कन्नौज / बिलग्राम का युद्ध 

हुमायूँ की यात्रा फिर से आगे बढ़ते हुए दिल्ली की तरफ बढ़ती है, परंतु शेरशाह उसको फिरसे पराजित करने के लिए उसका पीछा करता है, क्यूंकि चौंसा के युद्ध के बाद शेरशाह का मनोबल बहुत बढ़ा हुआ होता है। 

हुमायूँ और शेरशाह के बीच फिरसे कन्नौज क्षेत्र में 1540 में युद्ध होता है, जिसे बिलग्राम के युद्ध से भी जाना जाता है, इस युद्ध में शेरशाह हुमायूँ को पराजित कर देता है और हुमायूँ वहां से भाग जाता है और वहां से भाग के वह भारत के पश्चिमी क्षेत्रों से होते हुए सीधा सिंध भाग जाता है और सिंध में जाकर शरण लेता है। 

इस प्रकार शेरशाह के पास खुला अवसर था और उसने दिल्ली और आगरा पे अपना अधिकार कर लिया और यही वो समय था जब उसने भारत से पूरी तरह मुग़ल साम्राज्य की समाप्ति कर दी थी।

यह भी पढ़े : history of sher shah suri in hindi

यह भी पढ़े : शेर शाह सूरी का प्रशासन

हुमायूँ का निष्कासित जीवन ( 1540 – 1555 )

History of Humayun in Hindi – शेरशाह सूरी से पराजित होने के बाद जब हुमायूँ भारत से भाग जाता है तब वह 1540 से लेकर 1555 तक 15 वर्षों तक अपना समय भारत के बाहर ही व्यतीत करता है।  

जब हुमायूँ भारत से बाहर चला गया तब उसके भाई हिन्दाल के साथ उसके सबंध अच्छे थे और उसके बाकी दोनों भाइयों कामरान और अस्करी के साथ उसके संबंध अच्छे नहीं थे। 

हिन्दाल के एक गुरु थे जिनका नाम गुरु मीर अली अकबर था और उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम हमिदाबानू बेगम था, जिससे हुमायूँ ने 1541 में विवाह कर लिया, बाद में हुमायूँ को इसी से एक पुत्र की प्राप्ति होती है, जिसे हम अकबर के नाम से जानते है।

वहाँ पर रहकर हुमायूँ ने कई बार अपने भाइयों से संपर्क किया और सहायता की मांग की, लेकिन कामरान और अस्करी किसी भी तरह से हुमायूँ की सहायता नहीं करना चाहते थे और इसी बीच उसे ईरान के एक शाह के द्वारा एक प्रस्ताव प्राप्त होता है कि अगर तुम सिया धर्म को स्वीकार कर लेते हो तो मैं तुम्हारा साम्राज्य वापस हासिल करने में तुम्हारी मदद करूँगा। 

हुमायूँ ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और ईरान के शाह की सहायता से काबुल और कांधार का क्षेत्र जो उसने अपने भाई कामरान को दिया था उन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया, उसके भाई ने उससे कई बार फिर से संघर्ष किये जिसके कारण वह अपने भाइयों से बहुत परेशान हो जाता है, और कहा जाता है की उसने अपने भाई कामरान की आँखें निकलवा ली और उसे मक्का भेज दिया, और बाद में उसने अपने दूसरे भाई अस्करी को भी जेल में कैद करवाया और बाद में उसे निकल के उसे भी मक्का की यात्रा पर भेज दिया। 

इस प्रकार उसे अपने दो भाइयों से छुटकारा मिल गया था, परंतु उसका एक और भाई हिन्दाल जो उसका सहयोगी था वह 1551 में एक युद्ध के दौरान मृत्यु को प्राप्त हो गया था और इस प्रकार 1555 में जब वह भारत वापस आता है, उससे पहले ही उसके सारे भाई समाप्त हो चुके थे और अपने भाइयों से उसको छुटकारा मिल चुका था क्यूंकि वह अपने भाइयों के कारण बहुत परेशान रहा था। 

हुमायूँ की पुनः भारत विजय 

ईरान के शाह की सहायता से उसने काबुल और कांधार तो जीत लिया था और जब उसे पता चला की शेरशाह सूरी की मृत्यु हो चुकी है, शेरशाह के पुत्र इस्लामशाह की मृत्यु हो चुकी है और शेरशाह के वंशजों में इतना सामर्थ्य नहीं है कि वे अपना साम्राज्य संभाल पाएं, तो वह फिर से भारत की तरफ बढ़ने का प्रयास करता है और भारत के पश्चिमी क्षेत्रों से होकर भारत के आंतरिक प्रदेशो में प्रवेश करना शुरू कर देता है।

1555 में भारत वापस आने के क्रम में हुमायूँ ने पंजाब के मच्छीवारा में अफगानो के विरुद्ध एक युद्ध किया, शेरशाह सूरी अफगान थे, उनकी मृत्यु के बाद बहुत अफगान बचे हुए थे और वे सारे अफगान सरदार आपस में ही संघर्ष करते रहते थे क्यूंकि शेरशाह तो मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे और अब कौन राजा बनेगा इस पर ही वे सारे अफगान सरदार आपस में ही संघर्ष करते रहते थे और अपने अलग-अलग गुट बना लिए थे। 

हुमायूँ के लिए ये एक अच्छा मौका था की अफगानो की आपसी कलह का फायदा उठाया जाए और भारत में पुनः आक्रमण करके अपनी गद्दी वापस हासिल कर सके और पंजाब के मच्छीवारा में उसने युद्ध किया और अफगानो को हराके पंजाब को जीत लिया।  

हुमायूँ अब पंजाब से आगे बढ़ना शुरू कर देता है और इसकी सूचना दिल्ली में राज कर रहे सूर वंश के शासक सिकंदर सूर को मिल जाती है और वह खुद हुमायूँ से युद्ध करने के लिए आ जाता है।

22 जून 1555 को सिकंदर सूर और हुमायूँ के बीच सरहिन्द का युद्ध होता है, जिसमे हुमायूँ को जीत प्राप्त होती है, और वह सिकंदर सूर को पराजित कर देता है, सिकंदर सूर को पराजित करने का मतलब सूर वंश की समाप्ति हो जाती है और आसानी से उसने पुनः दिल्ली और आगरा पर अपना अधिकार कर लिया। 

हुमायूँ की मृत्यु 

1555 में हुमायूँ ने भारत पर पुनः अधिकार तो कर लिया था परंतु वह इतना भाग्यशाली नहीं था, जिस दीन पनाह का उसने निर्माण करवाया था, 1556 के जनवरी माह में उसी दीन पनाह के पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर लुढ़कते-पुढ़कते हुमायूँ की मृत्यु हो गई। 

इसलिए इतिहासकारों ने उसे “भाग्यहीन हुमायूँ” कहकर भी संभोदित किया है क्यूंकि वह अपने जीवन में जीतते हुए कई बार असफल हुआ और जब वास्तव में सफल हुआ तो उसकी मृत्यु हो जाती है और अपनी सफलता का सुख नहीं भोग पाता है। 

हुमायूँ से जुड़े कुछ अन्य बिंदु 

1. हुमायूँ ने “दीन पनाह” का निर्माण करवाया था। 

2. हुमायूँ ज्योतिष विद्या में बहुत विशवास रखता था और वह ज्योतिष विद्या के अनुसार हफ्ते के सातों दिन सात अलग रंग के कपड़े पहनता था क्यूंकि वह सोचता था की हर दिन अलग रंग के कपडे पहनने से उसका भाग्य उसका साथ देगा, परंतु हुआ उसके विपरीत भाग्य ने उसका साथ नहीं दिया और दीन पनाह के पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर लुढ़कते-पुढ़कते उसकी मृत्यु हो जाती है। 

3. एक लेनपूल नामक इतिहासकार ने हुमायूँ के सन्दर्भ में ये लिखा है की, “हुमायूँ अपने जीवन में यहाँ से वहाँ लुढ़कते-पुढ़कते जाता रहा और अंतिम दिनों में भी उसकी मृत्यु लुढ़कते-पुढ़कते ही हो गई”। 

History of Humayun in Hindi

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई History of Humayun in Hindi के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


यह भी पढ़े : History of Babur in Hindi

यह भी पढ़े : lodi vansh ka sansthapak

यह भी पढ़े : history of sher shah suri in hindi

यह भी पढ़े : शेर शाह सूरी का प्रशासन

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow us on Social Media