History of Jahangir in Hindi

History of Jahangir in Hindi – शासन, विद्रोह, नूरजहां, कला

History of Jahangir in Hindi – दोस्तों, पिछले आर्टिकल में हमने मुग़ल शासक अकबर के बारे में पढ़ा था, आज हम जहाँगीर के बारे में पढ़ेंगे जो अकबर का पुत्र था और अकबर के बाद एक नए शासक के रूप में आता है। 

जहाँगीर 1605 में अपने पिता अकबर की मृत्यु के बाद शासक बनता है और 1627 तक शासन करता है, इसके शासनकाल को दो भागों में बांटा जाता है पहला है 1605 से लेकर 1611 तक, जिसमें वह स्वतंत्र होकर शासन करता है और दूसरा है 1611 से लेकर 1627 तक, जिसमें वह नूरजहाँ के प्रभाव में आ जाता है और शासन के क्षेत्र में भी नूरजहाँ का प्रभाव दिखाई देने लगता है। 

पृष्टभूमि ( Background  )

दोस्तों, जैसे की हमने पिछले आर्टिकल में पढ़ा था की अकबर के अंतिम दिनों में उसका पुत्र सलीम जो जहाँगीर के नाम से प्रसिद्ध होता है, उसने विद्रोह कर दिया था और विद्रोह करके सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया, परंतु उसने अपना विद्रोह रोक लिया था और जब अकबर की मृत्यु हो जाती है, उससे पहले वह जहाँगीर को सत्ता देकर अपने प्राण त्याग देता है, ऐसे में जहाँगीर ही अकबर का वास्तविक उत्तराधिकारी बनकर सामने आता है। 

हालांकि अकबर के दो और पुत्र भी थे दानियाल और मुराद, जिनकी मृत्यु पहले ही हो चुकी थी, जिसके बाद जहाँगीर ही इकलौता वारिस बचा था जो अकबर का उत्तराधिकारी बन सकता था। 

History of Jahangir in Hindi – जहाँगीर का परिचय 

जहाँगीर का जन्म 30 अगस्त 1569 को हुआ था, उसके पिता का नाम अकबर था और माता का नाम हरकाबाई था जिन्हें जोधाबाई के नाम से भी जाना जाता है, परंतु इतिहास में इन्हें जोधाबाई के नाम से नहीं पुकारा गया है। 

वह युवावस्था से ही शासक बनने के लिए उत्साहित था, लेकिन अकबर की मृत्यु बहुत बाद में हुई जिसके कारण उसने शासक बनने के लिए विद्रोह का सहारा लिया परंतु फिर भी उसे सत्ता अकबर की मृत्यु के बाद ही मिल पाती है। 

उसके बचपन का नाम सलीम था और अकबर ने उसे एक सूफी संत जिनका नाम सलीम चिस्ती था, उनकी दरगाह में जाके मन्नत मांग कर प्राप्त किया था, और उनके नाम पर ही अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम रखा था। 

जहाँगीर ने जब सत्ता प्राप्त की और गद्दी धारण की, तब उसने अपना एक नाम या उपाधि धारण की, वह नाम या उपाधि थी “नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह गाज़ी“। 

उसका राज्याभिषेक 3 नवम्बर 1605 को होता है और नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह गाज़ी की उपाधि धारण करके मुग़ल वंश का अगला शासक बन जाता है। 

जहाँगीर से एक घटना भी जुड़ी है जो अनारकली से प्रेम की घटना है, इसे आपने फिल्मों में भी देखा या सुना होगा की अनारकली और जहाँगीर ( सलीम ) के बीच प्रेम था और अकबर उसका विरोधी था, इस घटना के संबंध में कई कहानियाँ प्रचलित है, परंतु एक असली कहानी जो दिखाई पड़ती है वो यह है की सलीम ( जहाँगीर ) छोटा था यानी 12-13 वर्ष की आयु का और अकबर के दरबार में एक नृत्यांगना थी जिसका नाम था अनारकली। 

सलीम ( जहाँगीर ) का झुकाव अनारकली की तरफ बहुत ज्यादा बढ़ चुका था और वह अपने दिन का अधिकांश भाग अनारकली के साथ बिताना पसंद करता था और इस बात से अकबर चिढ़ता था क्यूंकि वह अपने पुत्र से बहुत स्नेह करता था, परिणामस्वरूप अकबर ने अनारकली को अपने दरबार से बाहर निकलवा दिया और उसे अफगानिस्तान के क्षेत्र की तरफ भारत की सीमा से बाहर भेज देता है और इस तरह से सलीम ( जहाँगीर ) और अनारकली अलग हो जाते हैं। 

बाद में जब अनारकली की मृत्यु हो जाती है, तब सलीम ( जहाँगीर ) उसके मकबरे का निर्माण 1615 में लाहौर में करवाता है और इस मकबरे में उसने लिखवाया है की “अगर मुझे एक दिन की मोहलत मिल जाती अनारकली को देखने की तो मैं कयामत के दिन तक अल्लाह का शुक्र गुज़ार होता“, यह उसने उस मकबरे में लिखवाया है जिससे स्पष्ट होता है की जहाँगीर अनारकली से कितना प्रेम करता था। 

जहाँगीर की कई शादियां हुई थी:

प्रथम पत्नी मानबाई, यह हरका बाई के परिवार से ही संबंधित थी, और उनके भाई की पुत्री थी और मानबाई से जहाँगीर को एक पुत्र प्राप्त हुआ था जिसका नाम खुसरो था। 

मानबाई से जुड़ा एक बिंदु यह भी है की विवाह के बाद जहाँगीर को शराब का सेवन करने की बहुत ज्यादा लत लग गई थी, जिसके कारण वह बहुत दुखी रहती थी और इसी लत से परेशान होकर मानबाई ने आत्महत्या कर ली थी, खुसरो इसी बात से काफी दुखी रहता था की उसकी माँ की मृत्यु का कारण उसका पिता ही था।
द्वितीय पत्नी जहाँगीर का यह विवाह भी एक राजपूत परिवार में हुआ था, उसकी दूसरी पत्नी का नाम था जगत गोसाईं, इससे एक पुत्र हुआ था जिसका नाम खुर्रम था, यही खुर्रम बाद में शाहजहां के नाम से जाना जाता है। 
तृतीय पत्नी यह संबंध वैवाहिक संबंध तो नहीं था, पर यह उसकी पत्नी के समान ही थी जिसका नाम था रुकसाना बानो था, इससे पुत्र हुआ था जिसका नाम शहरयार था। 
चौथी पत्नी चौथी पत्नी का नाम सलमा बानो था, इससे परवेज़ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।
पांचवी पत्नी 1611 में जहाँगीर नूरजहां से विवाह करता है, जो जहाँगीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होता है, नूरजहां की पहले से ही एक बेटी थी जिसका नाम लाड़ली बेगम था, जो नूरजहां के पहले पति से हुई पुत्री थी। 
History of Jahangir in Hindiजहांगीर का इतिहास

जहाँगीर का प्रारंभिक शासन 

प्रारंभिक शासन में जहाँगीर ने अपने करीबी जिन्हें वह पसंद करता था उन्हें अच्छे-अच्छे पद प्रदान किये, जिसमे वीर सिंह बुंदेला भी था जिसकी सहायता से उसने अबुल फज़ल की हत्या करवाई थी, उसे भी एक अच्छा पद दिया।   

खुसरो का विद्रोह 

यह सब देखकर उसका पुत्र खुसरो विद्रोही होने लगता है, और जब जहाँगीर शासक बनता है तब खुसरो की आयु लगभग 20-22 वर्ष हो चुकी थी, उसके मन में यह विचार था की अगर उसका पिता अभी शासक बनता है और लगभग 20 वर्ष भी शासन कर लेता है तो उसे शासन करने का मौका नहीं मिलेगा। 

यही कारण था की खुसरो, जहाँगीर के राजा बनने के एक वर्ष बाद ही 1606 में विद्रोह कर देता है, उसके विद्रोही स्वभाव को देखते हुए जहाँगीर उसे नज़रबंद कर देता है, परंतु वह फिर भी भाग निकलता है ।   

खुसरो भाग कर पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव के पास जाता है, उनका आशीर्वाद लेता है और जहाँगीर के खिलाफ रणनीति बनाने लगता है। 

जहाँगीर की सेना उसका पीछा करती है और भैरावल के मैदान में खुसरो और जहाँगीर का संघर्ष होता है, इसमें खुसरो पराजित हो जाता है और खुसरो को लाकर नज़रबंद करके कैद में रख दिया जाता है। 

जहाँगीर, पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव से काफी नाराज़ था क्यूंकि उन्होंने उसके विद्रोही खुसरो को आशीर्वाद दिया था, जहाँगीर ने पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव से कहा की या तो आप जुर्माने का भुगतान करिए नहीं तो आपको सजा दी जाएगी।

जुर्माने की रकम भरने से गुरु अर्जुन देव ने इंकार कर दिया, परिणामस्वरूप उनको फांसी की सज़ा दे दी गई। 

एक वर्ष के बाद फिर खुसरो उस कैद से निकल जाता है और फिर से वह 1607 में जहाँगीर की हत्या की रणनीति बनाता है, इस बात से जहाँगीर काफी दुखी होता है और इस बार वह कठोर दंड देते हुए खुसरो की दोनों आखें निकलवा लेता है, और इस प्रकार उसे अँधा करके कैद में डाल दिया जाता है और वह कैद में ही लंबे समय तक रहता है।   

बाद में शाहजहाँ ( खुर्रम ) को ऐसा लगता है की क्योंकि खुसरो उसका बड़ा भाई है, तो जब जहाँगीर की मृत्यु होगी तब खुसरो राजा बनने की चेष्टा करेगा, इसलिए शाहजहाँ ( खुर्रम ) कुछ कैदियों की ही सहायता लेता है और कैद में ही गला घोंट कर उसकी हत्या करवा देता है और इस प्रकार 1621 में शाहजहाँ ( खुर्रम ) के कहने पर कैद में खुसरो की हत्या कर दी जाती है। 

दक्षिण विजय 

अहमदनगर जो दक्षिण भारत का प्रमुख क्षेत्र था, वहां का वज़ीर बहुत ही ताकतवर और शक्तिशाली माना जाता था जिसका नाम मलिक अम्बर था। 

मलिक अम्बर के खिलाफ काफी शुरुआती अभियान मुगलों के द्वारा चलाये गए, परंतु मलिक अम्बर ने हार नहीं मानी बल्कि कई अवसर ऐसे आये जब उसने मुगलों को पराजित कर दिया, लेकिन बाद में अहमदनगर में खुर्रम के नेतृत्व में एक सेना भेजी जाती है जो मलिक अम्बर को पराजित कर देती है, इस प्रकार खुर्रम एक अच्छे शासक के रूप में उभर कर आता है। 

इस बात से खुश होकर जहाँगीर ने खुर्रम को “शाहजहाँ” की उपाधि दी। 

अभी आपने जहाँगीर के शासन की प्रारंभिक घटनाओं को पढ़ा, अब जहाँगीर के शासन के दौरान की बहुत महत्वपूर्ण घटना को पढ़ते हैं।  

मेवाड़ विजय 

दोस्तों, हमने पिछले आर्टिकल में पढ़ा था की मेवाड़, चित्तौड़ के क्षेत्र को अकबर भी नहीं जीत पाया था। 

महाराणा प्रताप से अकबर का संघर्ष जरूर हुआ था, परंतु महाराणा प्रताप की मृत्यु तक भी वह पूरे मेवाड़ पर विजय प्राप्त नहीं कर सका था, अकबर केवल चित्तौड़ क्षेत्र पर ही शासन कर रहा था बाकी जो मेवाड़ का क्षेत्र था वह पुनः महाराणा प्रताप के पास चला गया था, हालांकि महाराणा प्रताप की मृत्यु अकबर के ही समय हो जाती है। 

महाराणा प्रताप के बाद उनका पुत्र अमर सिंह शासक बनता है, दूसरी तरह मुगल बादशाह के रूप में अकबर के बाद जहाँगीर शासक बनता है, जहाँगीर को भी पता था की मेवाड़ एक बहुत बड़ा क्षेत्र है और बहुत ही ताकतवर क्षेत्र है, इसलिए वह मेवाड़ को दबाने के लिए शुरुवाती दौर में ही सेना को भेजना शुरू कर देता है। 

अमर सिंह या तो जहाँगीर के सामने अधीनता स्वीकार कर सकते थे जैसा कई और राजपूत राजाओं द्वारा किया गया था और या तो वे उसी प्रकार से संघर्ष करे जैसे की उनके पिता महाराणा प्रताप ने किया था। 

अमर सिंह ने अपने पिता की तरह ही संघर्ष करने का निर्णय लिया और जहाँगीर के साथ संघर्ष किया और संघर्ष करना प्रारंभ किया, शुरुआती संघर्ष में अमर सिंह जहाँगीर की सेना को पराजित भी करते है।

दूसरी ओर, हमने अभी खुसरो के विद्रोह के बारे में पढ़ा था तो उस समय खुसरो के द्वारा शुरू किये गए विद्रोह के कारण जहाँगीर अपनी सेना को मेवाड़ से वापिस बुलाकर खुसरो के खिलाफ लगा देता है। 

बाद में 1613 में एक समय ऐसा आता है की जहाँगीर गुस्से में अपने पुत्र खुर्रम ( शाहजहाँ ) को ही मेवाड़ विजय के लिए भेज देता है, 1613 में जहाँगीर भी अजमेर की यात्रा के लिए गया था और इसी दौरान उसने खुर्रम ( शाहजहाँ ) को मेवाड़ विजय के लिए भेजा। 

खुर्रम ने वहां जाकर बहुत कत्लेआम मचाया, फसलें नष्ट कर दी और किसानों को बहुत प्रताड़ित किया, परिणामस्वरूप अमर सिंह को ऐसा एहसास हुआ की अब उनके पास कोई रास्ता नहीं है और अब संधि कर लेनी चाहिए, अन्ततः अमर सिंह ने खुर्रम के सामने संधि का प्रस्ताव रखा और खुर्रम ( शाहजहाँ ) ने भी यह संधि का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 

मेवाड़ – मुगल संधि ( 1615 )

अन्ततः 1615 में मेवाड़ और मुगलो के बीच चित्तौड़ की संधि हुई, जिसमे कुछ शर्तें थी और यह संधि अन्य राजपूत संधियों से थोड़ी अलग थी, आइये देखें:

1. इसमें उन्होंने माना की वे मुगलों के अधीन हैं। 

2. जैसा की हमने पिछले आर्टिकल में पढ़ा था की कछवाहा राजपूतों ने संधि के क्रम में मुगलों से वैवाहिक संबंध बनाये थे, परंतु मेवाड़ के राजपूतों ने यह निर्णय किया की वे मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध नहीं बनाएंगे, और इस इस संधि के तहत मेवाड़ के राजपूतों और मुगलों के बीच कोई भी वैवाहिक संबंध नहीं बनता है। 

3. अमर सिंह अपने पुत्र करण सिंह को मुगल दरबार यानी जहाँगीर के दरबार में रहने के लिए भेज देते है। 

4. चित्तौड़ का किला जो मुगलों के पास हुआ करता था उसे पुनः अमर सिंह को वापस कर दिया जाता है, अमर सिंह को यह किला इस शर्त पर वापस किया जाता है की वे इस किले की किलाबंदी यानी मरम्मती या उसका घेराव नहीं करवाएंगे। 

इस प्रकार यह एक सम्मानजनक संधि थी राजपूतों की दृष्टि से भी और मुगलों के द्वारा भी काफी अच्छा व्यवहार किया गया था इस राजपूत वंश के साथ, इस प्रकार से यह संधि सफल होती है, परंतु सफल संधि के बीच मेवाड़ का विलय मुगलों के अधीन हो जाता है चित्तौड़ की संधि के तहत। 

इस प्रकार यह घटनाएं राजनितिक घटनाओं से जुडी हुई थी, जो जहाँगीर के समय घटित हुई थी।

जहाँगीर के जीवन एक ऐसा मोड़ आता है जब उसका विवाह नूरजहां से होता है, जो उसके जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है और उसके जीवन को बदल देता है, आइये देखे:

नूरजहां से विवाह ( 1611 )

नूरजहां का वास्तविक नाम मेहरूनिसा था, मेहरूनिसा पहले से ही विवाहित थी और एक विधवा थी जब उसका विवाह जहाँगीर के साथ हुआ। 

उसका पहला विवाह 1594 में अलीकुली बेग से हुआ था, जो मुगलों के अधीन ही था, और उसकी एक पुत्री भी थी जिसका नाम लाड़ली बेगम था। 

अलीकुली बेग ने एक बार एक शेर की हत्या कर दी थी, इस क्रम में खुश होकर जहाँगीर ने उसे “शेर अफगान” की उपाधि दी थी और जहाँगीर को उस समय तक पता भी नहीं था की उसकी पत्नी का नाम मेहरूनिसा है और वह काफी सुंदर भी है। 

वह एक बार नवरोज़ के त्योहार के क्रम में विधवा मेहरूनिसा ( नूरजहां ) को देखता है, उसे देख कर वह उस पर आसक्त हो जाता है और विवाह की इच्छा प्रकट करता है, इस प्रकार विधवा मेहरूनिसा का 1611 में जहाँगीर के साथ विवाह हो जाता है। 

जब विवाह हुआ तब जहाँगीर ने उसे पहले नूरमहल की उपाधि दी अर्थात महल की रौशनी, और फिर बाद में नाम दिया नूरजहां अर्थात पूरे जहाँ की रौशनी यानी जहाँ में सबसे सुंदर। 

विवाह के पश्चात् जितने भी नूरजहां से संबंधित लोग थे उनको दरबार में उच्च पद मिलने शुरू हो जाते हैं और इस प्रकार दरबार में दो गुट बन जाते हैं, एक नूरजहां का गुट था जिसमे उससे संबंधित लोग थे और दूसरा गुट वह था जो जहाँगीर से संबंधित थे या अलग गुट बना कर रहते थे।   

नूरजहां के गुट में उसके पिता मिर्ज़ा गियास बेग थे, उसके पिता को एक अच्छा पद मिला, उसकी माता असमत बेगम जिनके बारे में आपने पढ़ा होगा की गुलाब से इत्र बनाने का अविष्कार इन्होंने किया था, उसका भाई आसफ खां और जहाँगीर का पुत्र खुर्रम ( शाहजहाँ ) भी नूरजहां के गुट में शामिल था, खुर्रम के नूरजहां के गुट में शामिल होने का कारण यह था की नूरजहां के भाई आसफ खां ने अपनी पुत्री का विवाह खुर्रम से कराया था। 

नूरजहां का भाई आसफ खां यह चाहता था की उसका दामाद खुर्रम ( शाहजहाँ ) शासक बने, और वास्तव में खुसरो के बाद वही सबसे योग्य था, इसलिए वह शासक बनने की श्रेणी में भी था, लेकिन बाद में चल कर आसफ खां और नूरजहां के बीच भी विवाद शुरू होता है। 

आसफ खां और नूरजहां के बीच विवाद इसलिए शुरू होता है क्यूंकि नूरजहां ने अपनी पुत्री लाड़ली बेगम का विवाह जहाँगीर के पुत्र शहरयार से करवाया और शहरयार से जैसे ही उसकी पुत्री का विवाह होता है तब नूरजहां चाहती है की शहरयार शासक बने।

इस क्रम में बाद में इस गुट में फूट पड़ जाती है और खुर्रम इस गुट से अलग हो जाता है और आसफ खां भी अपनी बहन का पक्ष लेना छोड़ देता है। 

खुर्रम ( शाहजहाँ ) का विद्रोह ( 1623 )

सबसे पहले जहाँगीर के पुत्र खुसरो ने शासक बनने के लिए उसके खिलाफ विद्रोह किया, बाद में खुर्रम ने भी शासक बनने के लिए जहाँगीर के खिलाफ 1623 में विद्रोह किया और शासक बनने की इच्छा ज़ाहिर की, ये विद्रोह भी आसफ खां के चढ़ाने पे हुआ था। 

खुर्रम के विद्रोह को महाबत खां जो की एक सेनापति था उसने दबा दिया था। 

महाबत खां का विद्रोह ( 1626 )

बाद में सेनापति महाबत खां की भी इच्छाएं बढ़ने लगती है क्यूंकि वो देखता है की नूरजहां के गुट का प्रभाव राजा पे ज्यादा है, इसलिए उसने 1626 में विद्रोह किया, लेकिन इसके विद्रोह को भी दबा दिया जाता है।

बाद में जहाँगीर की 1627 में मृत्यु होने के बाद खुर्रम ( शाहजहाँ ) शासक बन जाता है। 

इस प्रकार हम यह देख सकते है की खुसरो, खुर्रम, महाबत खां ने जहाँगीर के खिलाफ विद्रोह किया, परंतु किसी का विद्रोह सफल नहीं हो पाया था, अंत में जहाँगीर की मृत्यु के बाद ही किसी को सत्ता मिल पाती है। 

जहाँगीर से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण बिंदु 

1. जहाँगीर ने न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए सोने की जंजीर लगवाई थी। 

उसने जनता को न्याय दिलाने हेतु आगरा के किले बाहर एक 60 घंटियों वाली एक सोने की जंजीर लगवाई थी, जिसमे किसी भी प्रजा को किसी भी प्रकार की न्यायिक समस्या है या फिर उसको लगता है की उसके साथ गलत हो रहा है, तो वह आकर न्याय की जंजीर की घंटी को बजा सकता था और सीधे राजा को उस घंटी की आवाज़ सुनाई देती थी और फिर उसकी फ़रियाद सुनी जाती थी और उसके साथ न्याय किया जाता था। 

कहा जाता है की जहाँगीर एक न्याय प्रिय शासक बनने का प्रयास करता था और इसी क्रम में उसने न्याय की जंजीर को अपने आगरा के किले के बाहर लगवाई थी। 

2. जहाँगीर के समय कुछ विदेशी भारत आये थे और उसके दरबार में आये थे जैसे ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम के दूत के रूप में कैप्टन हॉकिन्स, 1608 – 1611 में जहाँगीर के दरबार में आए थे। 

जब कैप्टन हॉकिन्स वहां से चले थे तब वे अकबर का नाम का पत्र लेकर चले थे, परंतु जब वे भारत आये 1608 में तब तक अकबर की मृत्यु हो चुकी थी और जहाँगीर राजा बन गया था, जिसके कारण कैप्टन हॉकिन्स जहाँगीर के दरबार में पहुँचता है। 

जहाँगीर कैप्टन हॉकिन्स के बरताव से काफी खुश होता है और उसे 400 का मनसब प्रदान करता है, मनसब के बारे में हमने पिछले आर्टिकल में पढ़ा था की मनसबदारी व्यवस्था अकबर के द्वारा शुरू की गई थी और उसी के तहत कैप्टन हॉकिन्स को 400 का मनसब प्रदान किया जाता है और कैप्टन हॉकिन्स को “इंग्लिस खां” नामक उपाधि भी दी जाती है।

इसके अलावा सर टॉमस रो, 1615 – 1619 में भारत आए, सर टॉमस रो 1615 में भारत आते हैं और 1616 में जहाँगीर से मुलाकात करते हैं और 1619 तक भारत में रहते हैं।

वो अकेले नहीं आये थे, उनके साथ एक पादरी भी था जिसका नाम एडवर्ड टेरी था और उसके साथ वे जहाँगीर से मुलाकात करते हैं और यह मुलाकात अजमेर में होती है। 

इस प्रकार सर टॉमस रो दूसरे ब्रिटिश होते है जो जहाँगीर के दरबार में आते हैं और जहाँगीर ने उनकी बातों से प्रभावित होकर उनको काफी समय तक रखा, उनको घुमाया और उनकी कई जो मांगे थी उन्हें भी जहाँगीर ने माना था। 

कला ( चित्रकला, स्थापत्य, साहित्य )

जहाँगीर के काल में चित्रकला, स्थापत्य और साहित्य के क्षेत्र में भी काफी उन्नति होती है, आइये देखे:

चित्रकला 

जहाँगीर के काल को चित्रकला का स्वर्णयुग कहा जाता है, और उसने अपनी आत्मकथा तुजुक-ऐ-जहाँगीरी में भी लिखा है की अगर वह किसी चित्र को देखे जिसे बहुत सारे चित्रकारों ने बनाया हो, तो वह यह तक बता सकता है की चित्र का कौनसा भाग किस चित्रकार ने बनाया है और वह अपने आप को चित्रकला का बहुत बड़ा पारखी मानता था। 

इस प्रकार वह चित्रकला के क्षेत्र में खुद रुचि लेता था और चित्रकला को काफी प्रोत्साहन देता था। 

जहाँगीर के समय में महत्वपूर्ण चित्रकार थे मंसूर, जिसको उसने “नादिर-उल-अस्त्र” नामक उपाधि दी थी, मंसूर एक पक्षी विशेषज्ञ था और पक्षियों के चित्र बनाने के लिए वह बहुत ज्यादा लोकप्रिय था। 

इसके अलावा अबुल हसन यह भी एक महत्वपूर्ण चित्रकार थे जो जहाँगीर के दरबार में रहते थे, और इसको जहाँगीर ने “नादिर-उल-जमा” की उपाधि दी थी और वह किसी व्यक्ति विशेष के चित्र बनाने के लिए लोकप्रिय था। 

स्थापत्य 

नूरजहां ने अपने पिता मिर्ज़ा गियास बेग, जिनको जहाँगीर ने “इत्माद-उद-दौलाह” की उपाधि दी थी, उनकी मृत्यु के बाद नूरजहां ने आगरा में एक मकबरे का निर्माण करवाया जिसे “इत्माद-उद-दौलाह का मकबरा” कहा जाता है। 

यह मकबरा पूर्णतः सफ़ेद संगमरमर से निर्मित है और यह भारत में बनने वाला पहला पूर्णतः सफ़ेद संगमरमर से बनने वाला मकबरा है, बाद में चल कर शाहजहाँ ने विशाल पूर्णतः सफेद संगमरमर से बना मकबरा जिसे ताजमहल कहते है, वह बनवाया था अन्यथा पहले यही इत्माद-उद-दौलाह का मकबरा पूर्णतः सफ़ेद संगमरमर से बना था जो की नूरजहां ने बनवाया था। 

इस मकबरे में पित्रादुरा का काम किया गया था, पित्रादुरा एक नकाशीगिरी होती है जिसमे छोटे-छोटे ज़री के काम दीवारों में होते है और इसे पित्रादुरा पद्ति कहा जाता है, इस पद्ति का भी सबसे पहला प्रयोग इत्माद-उद-दौलाह के मकबरे में ही हुआ था। 

इसके अलावा जब जहाँगीर की 1627 में मृत्यु होती है, तब उसका मकबरा शाहदरा, लाहौर में बनवाया जाता है जो की पाकिस्तान में स्थित है। 

History of Jahangir in Hindi
History of Jahangir in Hindiजहांगीर का इतिहासजहांगीर का मकबरा

साहित्य 

जहाँगीर एक उच्च कोटि का लेखक था, और अपने पिता के समान नहीं था जैसा की हमने पढ़ा था की अकबर पढ़ा-लिखा नहीं था। 

उसने अपनी आत्मकथा लिखी जिसका नाम “तुजुक-ऐ-जहाँगीरी” था और यह आत्मकथा उसने फ़ारसी भाषा में लिखी थी। 

जहाँगीर की आत्मकथा में मूल रूप से तीन अध्याय हैं, प्रथम में उसके प्रारंभिक जीवन के बारे में, दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण भाग है वह जहाँगीर ने खुद लिखा है और अपने बारे में काफी विस्तृत जानकारी दी है, परंतु जब उसकी मृत्यु हो जाती है तब उसमे तीसरा अध्याय जोड़ा जाता है जिसमे उसकी मृत्यु के बाद की घटनाओं को लिखा जाता है जिसे मुहम्मद हादी के द्वारा पूरा किया जाता है।

इसके अलावा जहाँगीर ने एक सैन्य सुधार किया था, उसने दो अस्पा एवं सिंह अस्पा नामक प्रथा चलाई थी।

जैसे की हमने पढ़ा था की अकबर द्वारा मनसबदारी व्यवस्था चलाई जाती है, जिसमे पद होते थे और उस पद के अनुसार उसको सेना या घोड़े रखने की अनुमति होती थी और उसकी सीमा निर्धारित की गयी थी। 

जहाँगीर उसी मनसबदारी व्यवस्था में थोड़ा बदलाव लाया और उसका नाम रखा दो अस्पा एवं सिंह अस्पा।

जैसे कोई सवार का पद है और उसे 1000 घोड़े रखने की अनुमति दी गयी है लेकिन उसे दो गुना कर दिया जाए और पद वही रहे और उसे दो गुने घोड़े रखने होंगे तो उसे दो अस्पा कहा जाता था और इसी में अगर इसे तीन गुना कर दिया जाए तो उसे सिंह अस्पा कहा जाता था। 

यह सेना से संबंधित सुधार था जिसे जहाँगीर के समय में किया गया था। 

History of Jahangir in Hindi

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई  History of Jahangir in Hindi के बारे में जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


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