History of Shahjahan in Hindi

History of Shahjahan in Hindi – चुनौतियां, विद्रोह, उत्तराधिकार का युद्ध

History of Shahjahan in Hindi – दोस्तों, आज हम मुगल वंश के एक महत्वपूर्ण शासक शाहजहाँ के बारे में पढ़ेंगे, शाहजहाँ के संबंध में हम उसके परिचय, उसके प्रारंभिक जीवन और चुनौतियों, उसके समय हुए विद्रोह, उसका साम्राज्य विस्तार, उसके द्वारा किये गए निर्माण और कई महत्वपूर्ण बिंदु, उसके अंतिम दिनों में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष के दौर के महत्वपूर्ण बिंदु के बारे में पढ़ेंगे।

पिछले आर्टिकल में हमने पढ़ा था की जहाँगीर का सबसे बड़ा पुत्र खुसरो था, परंतु वह अपनी विद्रोही प्रवर्ति के कारण कैद कर लिया जाता है और बाद में खुर्रम द्वारा उसकी जेल में ही हत्या करवा दी जाती है, बाद में खुर्रम ही शाहजहाँ के नाम से प्रसिद्ध होता है।

इस तरह से खुसरो की मृत्यु के बाद, खुर्रम अर्थात शाहजहाँ ही जहाँगीर का वास्तविक उत्तराधिकारी बन कर सामने आता है और शासक बनता है, हालांकि उसे प्रारंभिक समय में कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें हम आगे पढ़ेंगे।

शाहजहाँ का परिचय 

शाहजहाँ का जन्म 5 जनवरी 1592 को हुआ था, उसके पिता का नाम जहाँगीर और माता का नाम जगत गोसाईं था, जो एक राजपूत कन्या थी और उदय सिंह की पुत्री थी।  

उसके बचपन का नाम खुर्रम था और इसी नाम से वह काफी प्रचलित भी रहा था, परंतु जहाँगीर ने उसे जब दक्षिण विजय के क्रम में अहमदनगर के अभियान पर भेजा और वहाँ पर उसने जीत प्राप्त की, तब जहाँगीर उसे “शाहजहाँ” नामक उपाधि देता है।  

उसके पिता की मृत्यु 1627 में होती है, परंतु उसका राज्याभिषेक 24 फरवरी, 1628 में होता है, इन 4-5 महीनों के अंतराल में वह शासक क्यों नहीं बन पाता है इसके बारे में हम अभी आगे उसके प्रारंभिक संघर्ष में पढ़ेंगे। 

शाहजहाँ ने राज्याभिषेक के समय एक उपाधि धारण की थी जिसका नाम अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ऐ-सानी” था। 

जहाँगीर की पत्नी नूरजहां के भाई आसफ खां की पुत्री अरजुमन्द बानो बेगम से शाहजहाँ का विवाह हुआ था, हालांकि उसकी कई पत्नियां थी, परंतु सबसे चर्चित पत्नी अरजुमन्द बानो बेगम थी, इन्हीं को मुमताज़ महल के नाम से भी जाना जाता है और कई बार इनके बारे में पढ़ा होगा। 

शाहजहाँ का विवाह अरजुमन्द बानो बेगम से 1612 में होता है, और अरजुमन्द बानो बेगम को 14 बच्चे होते हैं, जिसमे से 7 बच्चों की मृत्यु हो जाती है और 7 बच्चे जीवित बचते हैं, जिनमे 4 पुत्र और 3 पुत्रियां थी। 

14वें बच्चे को जन्म देने में प्रसव पीरा के दौरान अरजुमन्द बानो बेगम की 1631 में मृत्यु हो जाती है और इसी मृत्यु के शोक में 1632 में ताजमहल का निर्माण शुरू होता है जो 1653 में खत्म होता है अर्थात लगभग 22 वर्षों में इसका निर्माण पूरा होता है और मुमताज़ महल के ही मकबरे के रूप में ताजमहल को जाना जाता है। 

पुत्र  पुत्री 
दारा शिकोह  जहाँआरा 
औरंगज़ेब  रोशनआरा 
मुराद बक्श  गौहनआरा 
शाह शुजा
History of Shahjahan in Hindi – शाहजहाँ का इतिहास

इनकी सबसे बड़ी संतान इनकी पुत्री जहाँआरा थी और पुत्र में सबसे बड़ा पुत्र दारा शिकोह था।

बाद में ये चारो पुत्र शासक बनने के लिए आपस में संघर्ष करते हैं, दारा शिकोह के विचार जहाँआरा से काफी मिलते थे इसलिए जहाँआरा ने दारा शिकोह को समर्थन दिया था, रोशनआरा ने औरंगज़ेब को समर्थन दिया था, गौहनआरा ने मुराद बक्श को समर्थन दिया था और शाह शुजा को उसकी किसी भी बहन ने समर्थन नहीं दिया था। 

History of Shahjahan in Hindi
History of Shahjahan in Hindi – शाहजहाँ और मुमताज़ महल

शाहजहाँ का प्रारंभिक जीवन ऐंव चुनौतियां 

बादशाह बनने से पहले शाहजहाँ एक शहज़ादे के रूप में जहाँगीर की सेवा में था और जहाँगीर के कहने पर उसने कई जगह सूबेदार के पद को ग्रहण किया, कई लड़ाईयों का नेतृत्व किया और जीत भी हासिल करी।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण मेवाड़ विजय थी, मेवाड़ पर अभियान करके राणा परिवार को संधि के लिए विवश करना शाहजहाँ के लिए एक महत्वपूर्ण जीत रही थी और उसने जहाँगीर के समय मेवाड़ को मुगलो के अधीन कर दिया था और इसके अलावा दक्षिण भारत के क्रम में उसने अहमदनगर को भी जीता था, इस प्रकार उसने राजा बनने से पहले भी अपनी अच्छी प्रतिभा का परिचय दिया था। 

1623 में जब शाहजहाँ को लगने लगा की जहाँगीर के शासन में नूरजहां का प्रभाव ज्यादा है और उसके अपने शासक बनने पर खतरा है, तो उसने 1623 में विद्रोह कर दिया था, इस विद्रोह के बाद जहाँगीर और शाहजहाँ के संबंध ख़राब हो जाते है, परन्तु बाद में वह जहाँगीर से माफ़ी मांग लेता है और जहाँगीर उसे माफ़ कर देता है और मृत्यु से पहले अपना उत्तराधिकारी भी चुन लेता है। 

1627 में जब जहाँगीर की मृत्यु हो जाती है तब शाहजहाँ दिल्ली और आगरा के आसपास मौजूद नहीं था, ऐसे में दरबारियों के पास एक अच्छा मौका था की शाहजहाँ के विकल्प में किसी और को राजा बनाया जाए। 

इस क्रम में दरबारियों ने खुसरो के बड़े पुत्र दाबर बक्स को बादशाह घोषित कर दिया क्यूंकि वहाँ पर राजा के लायक और कोई व्यक्ति नहीं था। 

दूसरी ओर क्यूंकि नूरजहां ने अपनी पुत्री लाड़ली बेगम का विवाह जहाँगीर के पुत्र शहरयार से करवाया था, तो नूरजहां चाहती थी की शहरयार शासक बने और नूरजहां के भाई आसफ खां की पुत्री का विवाह शाहजहाँ से हुआ था तो वह चाहता था की शाहजहाँ शासक बने। 

ये दोनों ही आगरा में मौजूद नहीं थे इसलिए नतीजा यह हुआ की दाबर बक्स को मूलरूप से बादशाह बना दिया गया। 

दाबर बक्स 4 महीनों के लिए बादशाह के पद पर रहा, परंतु इसे बलि के बकरे के रूप में जाना जाता है क्यूंकि इसके बदले में दरबारियों ने अपने हितों को साधने की कोशिश की थी। 

आसफ खां को यह बात पसंद नहीं आयी क्यूंकि वह अपने दामाद को शासक बनते हुए देखना चाहता था इसलिए उसने तुरंत अपने दामाद अर्थात शाहजहाँ को सूचना भेजी की आप आगरा वापस आ जाइये। 

इस क्रम में पत्राचार के माध्यम से ही शाहजहाँ ने आसफ खां को एक सूचना भेजी की जितने भी हमारे विरोधी है उनकी हत्या करवा दी जाए, परिणामस्वरूप शाहजहाँ के कहने पर आसफ खां ने सारे राजकुमारों और उत्तराधिकारियों की हत्या कर दी और शाहजहाँ के लिए पूरा साम्राज्य बच जाता है। 

इसके अलावा जब जहाँगीर की मृत्यु के बाद जहां आगरा और दिल्ली के क्षेत्र में दाबर बक्स को राजा घोषित कर दिया गया था वहीं लाहौर में शहरयार ने खुद ही अपने आप को राजा घोषित कर दिया था, परंतु जैसे ही शाहजहाँ राजा बनता है इन सब की हत्या करवा दी जाती है।

शाहजहाँ अपने ससुर आसफ खां के कार्य से बहुत खुश होता है और उसको 7000 जात और सवार के साथ एक वज़ीर का पद प्रदान करता है। 

यह शाहजहाँ का प्रारंभिक जीवन था, जिसमे उसको कुछ समय के लिए एक छोटा संघर्ष भी करना पड़ा अपने आप को बादशाह बनाने के लिए और यह लगभग 4-5 माह का संघर्ष रहा था, लेकिन वह इस संघर्ष में प्रत्यक्ष रूप से लड़ाई नहीं लड़ पाया क्यूंकि उसकी जरूरत ही नहीं पड़ी और आसफ खां ने ही उसके काम को आसान कर दिया था। 

प्रारंभिक विद्रोह 

शासक बनने के साथ ही शाहजहाँ को कुछ क्षेत्रों में विद्रोह का सामना करना पड़ा, आइये उन विद्रोहों पर दृष्टि डाले:

बुन्देलखण्ड का विद्रोह ( 1628 – 1635 )

जैसा की हमने पहले भी पढ़ा है की बुन्देलखण्ड के शासक वीर सिंह बुंदेला ने अबुल फज़ल की हत्या करवाने में जहाँगीर की सहायता करी थी, इसके परिणामस्वरूप जहाँगीर और बुन्देलखण्ड के बीच बहुत अच्छा संबंध था। 

परंतु वीर सिंह बुंदेला की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जुझर सिंह बुन्देलखण्ड का शासक बनता है और शाहजहाँ के साथ उसके अच्छे संबंध नहीं थे। 

जुझर सिंह ने शाहजहाँ से अलग होकर विद्रोह का नेतृत्व कर लिया और तब शाहजहाँ ने विद्रोह को दबाने के लिए सैनिको को भेजा इसके साथ वह पीछे से खुद भी पहुंचा, अंततः जुझर सिंह को संधि करनी पड़ी और वह मुगलों की सेवा करने के लिए तैयार हो जाता है। 

खानजहाँ लोदी द्वारा विद्रोह ( 1628 – 1631 )

दक्षिण भारत में खानजहाँ लोदी एक अफगान सरदार था जो मुगलो के ही अधीन था, शाहजहाँ के समय वह विद्रोह घोषित करते हुए अहमदनगर चले जाता है और वहाँ जाकर खुद को स्वतंत्र घोषित कर देता है। 

इस बात से दुखी होकर शाहजहाँ उसका पीछा करवाता है, कई युद्ध लड़े जाते है, लेकिन अंततः इस विद्रोही को 1631 में मृत्यु दंड दे दिया जाता है। 

पुर्तगालियों की उदण्डता ( 1632 )

पुर्तगाली जो भारत में व्यापारिक कम्पनी के रूप में आये थे, वे शाहजहाँ के समय उदण्डता शुरू कर देते हैं जैसे कई क्षेत्रों में मुग़ल सैनिको को भगाना, खुद से ही कर ( tax ) वसूलना, कर ( tax ) को बचाना, यहाँ तक की भारतीय महिलाओं से विवाह करना, जबरदस्ती उन पर ईसाई धर्म थोपना इस तरह के कार्य करने लगते है। 

यह सूचना जब शाहजहाँ को प्राप्त होती है, तो वह मुग़ल सेना भेजता है और इस मुग़ल सेना द्वारा पुर्तगालियों को दण्डित किया जाता है, कई ईसाइयों की हत्या कर दी जाती है और पुर्तगालियों के क्षमा मांगने पर उन्हें माफ़ कर दिया जाता है। 

यह घटना 1632 में होती है और इसमें हुगली क्षेत्र जिस पर व्यापारिक एकाधिकार पुर्तगालियों द्वारा बनाया जा रहा था उसको पुनः मुग़ल कुचल देते हैं और शाहजहाँ उसे अपने पास ले लेता है और हुगली पर अपना अधिकार कर लेता है। 

सिक्ख संप्रदाय का विद्रोह ( गुरु हरगोविन्द )

सिक्ख गुरु अर्जुन देव की हत्या जहाँगीर के द्वारा होने के बाद, सिक्खों और मुगलों के बीच के संबंध तनावपूर्ण हो जाते हैं और यह तनावपूर्ण संबंध शाहजहाँ के समय भी देखने को मिलता है। 

हालांकि इस बार जो तनावपूर्ण संबंध बनते है वे कोई बड़े कारण को लेकर नहीं बनते है, एक बार शाहजहाँ शिकार करने जाता है, शिकार करने के क्रम में उसका बाज़ उड़कर सिक्खों के पास चले जाता है, सिक्ख उस बाज़ को देने से मना कर देते हैं और केवल एक बाज़ के लिए दोनों के बीच संघर्ष शुरू हो जाता है। 

उस समय गुरु हरगोविन्द सिक्खों के गुरु थे, जो उस समय मुगलों की बात नहीं स्वीकारते हैं जिसके कारण यह संघर्ष चलते रहता है, बाद में एक और कारण बनता है की एक डाकू द्वारा मुगलों के दो घोड़े चुरा लिए जाते हैं और वो घोड़े ले जाकर गुरु हरगोविन्द को दक्षिणा के रूप में भेंट कर दिए जाते है। 

गुरु हरगोविन्द ने इन घोड़ो को स्वीकार कर लिया और इन घोड़ो के वजह से भी मुगलों और सिक्खों के बीच संघर्ष होता है, तो इस प्रकार से यह संघर्ष लम्बा चलता रहता है और जब तक गुरु हरगोविन्द जी की मृत्यु नहीं हुई थी तब तक यह संघर्ष छोटे-मोटे रूप में चलता रहा था। 

तो ये कुछ ऐसे क्षेत्र रहे जहां पर शाहजहाँ को प्रारंभिक विद्रोह का सामना करना पड़ता है।

साम्राज्य विस्तार 

शाहजहाँ शासक बनने के बाद सिर्फ इन संघर्षों और विद्रोहों में ही व्यस्त नहीं था बल्कि उसने अपने साम्राज्य को भी विस्तार देने का प्रयास किया, जिसमे उसने दक्षिण भारत और भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत पर ध्यान दिया था, आइये देखें:

दक्षिण अभियान 

इसमें सबसे महत्वपूर्ण अहमद नगर का अभियान है, जहाँ पर उसने 1629 में चढ़ाई की और बाद में चल कर अहमदनगर के शासक को अधीनता स्वीकार करने के लिए भी विवश कर देता है और अहमदनगर को जीत कर पुनः अपने साम्राज्य में मिला लेता है, हमने पहले यह भी पढ़ा था की उसने शहज़ादे के रूप में भी अहमदनगर पर अभियान किया था। 

इसके अलावा उसने गोलकुण्डा और बीजापुर पर भी अभियान किया लेकिन यहाँ वह संघर्ष ज्यादा मजबूती से नहीं रख पाता है क्यूंकि ये वह दौर था जब उसकी पत्नी अरजुमन्द बानो बेगम की 1631 में मृत्यु हो जाती है और वह बार-बार लौट कर उत्तर भारत की ओर वापस आ जाता है। 

थोड़ा सा समय जरूर लगता है लेकिन इन दोनों क्षेत्रों को भी मुगलों के साथ संधि करने के लिए 1636 में बाध्य कर दिया जाता है।

इस प्रकार दक्षिण भारत में पूर्ण विजय गोलकुण्डा और बीजापुर पर तो नहीं हो पाती है परंतु अहमदनगर पर पूर्ण विजय दर्ज की जाती है। 

अपने शासन के समय शाहजहाँ ने अपने पुत्रों को अलग-अलग जगह का सूबेदार बनाया हुआ था और इस दौरान औरंगज़ेब जो शाहजहाँ का पुत्र था और जो बाद में शासक बनता है, उसे मूल रूप से दक्षिण भारत का सूबेदार बनाया गया था। 

औरंगज़ेब 1636-1644 और 1652-1658 तक दक्कन के सूबेदार के रूप में कार्य करता रहा था, यही कारण है की जब औरंगज़ेब खुद शासक बनता है तब वह अपने अंतिम 25 वर्ष भी दक्षिण में बिताने चला जाता है क्यूंकि उसे दक्षिण का अनुभव अच्छा था। 

इसके अलावा एक नीर जुमला जो गोलकुण्डा का वज़ीर था, उसने “कोहिनूर हीरा” लाकर शाहजहाँ को उपहार के रूप में दिया था और शाहजहाँ ने बाद में उसको अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया था, नीर जुमला को मोहम्मद सईद के नाम से भी जाना जाता है। 

कन्धार अभियान 

कन्धार भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत अफगानिस्तान क्षेत्र में था और इस क्षेत्र में ईरान यानी फारस का अधिकार हो चुका था, जहाँगीर के समय ही यह क्षेत्र ईरान व फारसियो के पास चला गया था और यह एक ऐसा सीमा प्रान्त क्षेत्र था जहाँ से किसी के भी भारत में प्रवेश करने के रास्ते बनते थे। 

यही कारण है की मुग़ल हमेशा से ही यही चाहते थे की कन्धार पर उनका अधिकार हो ताकि कोई बाहरी भारत में प्रवेश न कर सके और दूसरी ओर ईरान यहाँ पर खुद का नियंत्रण चाहता था ताकि वे कभी भी भारत में जा सके या भारत से किसी को अपने क्षेत्र में न आने दे सकें, तो हमेशा से ही यह उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत क्षेत्र ईरान और भारत के बीच एक विवाद का विषय बना रहा।  

1622 में फारस के द्वारा इस क्षेत्र को जहाँगीर के समय ही जीत लिया गया था, परंतु जैसे ही शाहजहाँ शासक बनता है, तब 1628 में ही वह कन्धार को अपने अधीन कर लेता है और इस प्रकार शाहजहाँ की सीमा कन्धार तक फैल जाती है। 

परंतु ऐसा नहीं है की वह हमेशा के लिए कन्धार तक अपनी सीमा को बनाये रख पाता है, 1648 तक पुनः कन्धार का क्षेत्र फारस के द्वारा जीत लिया जाता है और कन्धार फारस के अधीन हो जाता है, परंतु शाहजहाँ ने इस क्षेत्र को फिर से जीतने का प्रयास जरूर किया और अपने पुत्र औरंगज़ेब और बाद में दारा शिकोह को इस क्षेत्र में अभियान करने के लिए भेजा लेकिन औरंगज़ेब ऐंव दारा शिकोह दोनों ही इस क्षेत्र को जीतने में सफल नहीं हो पाए थे। 

History of Shahjahan in Hindi – शाहजहाँ से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु 

1. शाहजहाँ के काल को “स्थापत्य कला का स्वर्ण युग” कहा जाता है।

ऐ.ऐ श्रीवास्तव जो एक इतिहासकार है उन्होंने शाहजहाँ के काल को स्वर्ण युग कहा है, हालांकि सभी इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं है क्यूंकि ऐ.ऐ श्रीवास्तव ने शाहजहाँ के पूरे काल को ही स्वर्ण युग की संज्ञा दी है जबकि बाकी इतिहासकारों का कहना है की शाहजहाँ के काल को सिर्फ स्थापत्य कला के क्षेत्र में स्वर्ण युग कहा जाना चाहिए।

शाहजहाँ के काल को स्थापत्य कला का स्वर्ण युग इसलिए कहा जाता है क्यूंकि उसके समय में कई स्थापत्यों का निर्माण किया गया था जैसे:

दिल्ली का लालकिला, हमने आगरा के लालकिले के बारे में भी पढ़ा था जिसका निर्माण अकबर ने करवाया था, लेकिन दिल्ली के लालकिले का निर्माण शाहजहाँ के द्वारा करवाया जाता है, इसके अंदर दीवाने आम और दीवाने ख़ास का निर्माण भी शाहजहाँ के द्वारा करवाया गया था। 

पुरानी दिल्ली में जामा मस्जिद जिसे भारत का सबसे बड़ा मस्जिद कहा जाता है। 

अपनी पत्नी अरजुमन्द बानो बेगम ( मुमताज़ महल ) के मकबरे पर एक विशाल इमारत का निर्माण आगरा में करवाया था जिसे हम ताजमहल के रूप में जानते है। 

इसके अलावा आगरा के किले में उसने एक मोती मस्जिद का निर्माण करवाया था जबकि दिल्ली में एक मोती मस्जिद का निर्माण करवाया गया था उसे औरंगज़ेब ने करवाया था। 

2. उस्ताद ईशा खां ऐंव उस्ताद अहमद लाहौरी ये दो ऐसे कारीगर थे जिनके बारे में यह कहा जाता है की इन्होंने ताजमहल के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

इसमें उस्ताद ईशा खां वास्तुकार ( architect ) के रूप में कार्य कर रहे थे और उस्ताद अहमद लाहौरी प्रमुख मिस्त्री के रूप में कार्य कर रहे थे। 

इसमें ताज़महल के संबंध में बहुत महत्वपूर्ण बात यह है की शाहजहाँ ने इसमें भारतीय हिंदू शैली का इसमें प्रयोग किया, इसके अलावा ईरानी शैली का इसमें प्रयोग किया, इसके अलावा मध्य एशिया की शैली का इसमें प्रयोग किया। 

कई शैलियों को मिलाकर ताजमहल का निर्माण करवाया गया और ताजमहल को बनने में लगभग 22 वर्ष का समय लगा और ताजमहल को बनाने में जो संगमरमर का उपयोग किया गया था वह राजस्थान के मकराना से लाया गया था और पूर्णतः सफ़ेद संगमरमर का उपयोग इसमें किया गया था। 

कई शैलियों को मिलाकर एक अनोखी कलाकृति बनी और यही कारण है की विश्व के 7 आश्चर्यों में पहला स्थान ताजमहल को दिया जाता है। 

3. उसने शाहजहांनाबाद नामक शहर की स्थापना करी थी, जिस प्रकार अकबर ने फतेहपुर सीकरी नामक शहर की स्थापना करी थी और उसी शहर में उसने बहुत सारी इमारतें बनवाई और कई काम करवाए, उसी से प्रेरित होकर शाहजहाँ ने शाहजहांनाबाद नामक शहर की स्थापना करी और यह शाहजहांनाबाद वर्तमान में जो पुरानी दिल्ली है उसी को कहा गया है और शाहजहाँ ने इसी शहर में प्रमुख इमारतों का निर्माण करवाया था। 

1638 में आगरा से राजधानी लेजाकर इसी शाहजहांनाबाद को शाहजहाँ ने बनवाया था। 

4. शाहजहाँ ने एक मयूर सिंहासन का निर्माण करवाया था और इसके प्रमुख कलाकार बे बादल खां थे। 

5. शाहजहाँ के समय जो संगीतज्ञ उसके दरबार में रहते थे वह लाल खां थे, जिसे शाहजहाँ ने “गुण समंदर” की उपाधि दी हुई थी। 

6. शाहजहाँ के समय जो प्रमुख चित्रकार उसके दरबार में रहते थे वह मुहम्मद फ़क़ीर और मीर हासिम थे। 

शाहजहाँ के धार्मिक कार्य 

शाहजहाँ ने सिजदा और पैबोस प्रथा को बंद करवाया था, हमने अकबर वाले आर्टिकल में पढ़ा था की अकबर ने यह प्रथाएं चलवाई थी जिसमे सिजदा का अर्थ होता है की राजा को सर झुकाकर सलाम करना और पैबोस में भूमि पर बैठकर राजा के पैरों को चूमना होता था, इन दोनों ही प्रथाओं को शाहजहाँ ने प्रतिबंधित करवा दिया था और हमने दिल्ली सल्तनत वाले आर्टिकल्स में पढ़ा था की सबसे पहले ये प्रथाएं बलबन के द्वारा चलाई गयी थी। 

शाहजहाँ ने तीर्थ यात्रा कर ( tax ) पुनः लागु किये थे, तो इन करों को लागु करने के बाद कवींद्राचार्य के प्रयासों की वजह से बनारस और इलाहबाद के क्षेत्र का तीर्थ यात्रा कर हटा दिया गया था, कवींद्राचार्य एक दिग्गज और श्रेष्ठ कवि थे।

शाहजहाँ अपने प्रारंभिक समय में कट्टर मुसलमान की भूमिका में नज़र आता है और उसने विवाह से संबंधित नए नियम बनाए, उसने किसी भी मुस्लिम महिला का विवाह हिन्दू से करने से मना कर दिया था और कहा की तभी किसी मुस्लिम महिला का विवाह अन्य धर्म में किया जा सकता है जब वह व्यक्ति इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लेगा तभी उस मुस्लिम महिला का विवाह किसी अन्य धर्म में किया जा सकता है। 

इसके अलावा उसने हिन्दू मंदिरों को शुरुवाती दौर में तुड़वाने का भी प्रयास किया, परंतु बाद में वह दारा शिकोह के प्रभाव में आता है जो की एक महान सहिष्णु ( सहनशील ) शासक के रूप में जाना जाता है और इसके साथ वह जहाँआरा के संपर्क में आता है जो की एक सहिष्णु महिला के रूप में जानी जाती है, जिसके प्रभावस्वरूप शाहजहाँ के कुछ व्यवहार बदल जाते हैं। 

उत्तराधिकार का युद्ध ( 1658 – 1659 )

1658 – 1659 ये दो वर्ष उत्तराधिकार के संघर्ष के रूप में जाने जाते हैं, इसके संबंध में यह कहा जाता है की शाहजहाँ 1657 में बीमार पड़ जाता है और यह खबर फ़ैल जाती है की शाहजहाँ की मृत्यु हो गयी है और इस तरह से जितने भी उसके पुत्र थे, वे राजा बनने के लिए लालाहित हो जाते हैं और इसी क्रम में सभी पुत्रों के बीच जो युद्ध होता है उसे हम उत्तराधिकार का युद्ध कहते हैं। 

1658 में इस युद्ध की परंपरा शुरू हो जाती है, इस समय सभी पुत्र अलग-अलग क्षेत्र में सूबेदार के रूप में कार्य कर रहे थे जैसे शाह शुजा बंगाल क्षेत्र में था, मुराद बक्श गुजरात के क्षेत्र में सूबेदारी कर रहा था, दारा शिकोह सत्ता को प्राप्त करने की स्थिति में था और अभी हमने पढ़ा था की औरंगज़ेब दक्कन के क्षेत्र में था और दक्कन के क्षेत्र से औरंगज़ेब तुरंत आ जाता है गद्दी को प्राप्त करने के लिए।

इस प्रकार सत्ता को प्राप्त करने के लिए कुछ युद्ध होते हैं जिसमें सभी भाइयों के बीच लड़ाई देखने को मिलती है, आइये देखें:

बहादुरपुर का युद्ध ( 24 फरवरी, 1658 )

सबसे पहला बहादुरपुर का युद्ध होता है जो 1658 में ही होता है, इस युद्ध में दारा शिकोह ने शाह शुजा को पराजित किया था।

शाह शुजा बंगाल से युद्ध करने आता है लेकिन दारा शिकोह ने उसे बहादुरपुर के युद्ध में हराकर वापस बंगाल भगा दिया था। 

अब लग रहा था की दारा शिकोह ही गद्दी प्राप्त कर लेगा और वास्तव में उत्तराधिकारी भी वही था क्यूंकि शाहजहाँ का सबसे बड़ा पुत्र दारा शिकोह ही था और शाहजहाँ भी उसे ही अपना उत्तराधिकारी चुन चुका था। 

धरमट का युद्ध ( 15 अप्रैल, 1658 )

इस युद्ध में दारा शिकोह और औरंगज़ेब के बीच लड़ाई हुई, लेकिन इस युद्ध में औरंगज़ेब की सेना के साथ मुराद बक्श की सेना भी जुड़ गयी और इस युद्ध में दारा शिकोह की पराजय हुई और उसे भागना पड़ा था। 

सामूगढ़ का युद्ध ( 29 मई, 1658 )

धरमट के युद्ध में पराजित होने के बाद भी दारा शिकोह ने हार नहीं मानी और फिर से दारा शिकोह और औरंगज़ेब के बीच लड़ाई हुई और दोनों की सेना आमने-सामने हुई। 

इस बार भी दारा शिकोह को पराजय का सामना करना पड़ा और औरंगज़ेब को जीत प्राप्त हुई थी। 

इसी युद्ध के बाद ये तय हो गया था की औरंगज़ेब ही अब मुग़ल वंश का अगला वास्तविक शासक बनेगा। 

देवराई का युद्ध ( 14 मार्च, 1659 )

फिर एक देवराई का युद्ध होता है और इसमें भी दारा शिकोह की हार हो जाती है और औरंगज़ेब को वास्तविक रूप से जीत प्राप्त होती है। 

अगस्त 1659 में दारा शिकोह की हत्या करवा दी जाती है, इस प्रकार औरंगज़ेब इन संघर्षों के युद्धों में से निकलकर सामने आता है। 

जैसे ही औरंगज़ेब शासक बनता है, वह अपने पिता शाहजहाँ को कैद करवाता है और 1658-1666 यह वह दौर था जब आगरा के किले में शाहजहाँ को कैद कर के रखा जाता है और वहाँ से वो खिड़कियों से जीवन भर ताजमहल को निहारता रहा और 1666 में उसकी मृत्यु हो जाती है। 

दारा शिकोह से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिंदु 

1. दारा शिकोह एक बहुत ही सहिष्णु ( सहनशील ) शासक था, उसने हिन्दू ग्रंथों को अच्छे तरीके से पढ़ा, इस्लाम ग्रंथों को पढ़ा और उसने कहा की हिन्दू ऐंव इस्लाम धर्म एक ही ईश्वर को पाने के दो अलग-अलग माध्यम है, इस प्रकार वह पहला और इकलौता ऐसा मुस्लिम शासक था जिसने हिन्दू ग्रंथों का अध्यन किया था।

उसने वेद, उपनिषद सबका अध्ययन किया था और काफी झुकाव उसका हिंदुत्व की तरफ था, यही कारण है की उसको इस्लाम का शत्रु बताते हुए औरंगज़ेब ने उसकी हत्या करवा दी थी। 

2. लेनपूल नामक इतिहासकार ने दारा शिकोह के सहिष्णु विचारों के कारण उसे “लघु अकबर” की संज्ञा दी है। 

3. दारा शिकोह ने उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद करवाया और “सिर्र-ऐ-अकबर” के नाम से फ़ारसी में अनुवाद करवाया और लगभग 52 उपनिषदों का दारा शिकोह ने अनुवाद करवाया था। 

4. शाहजहाँ ने दारा शिकोह के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उसे “शाह बुलंद इक़बाल” की उपाधि दी थी। 

5. दारा शिकोह खुद भी एक बड़ा विद्वान् था, उसने भी कई ग्रंथों की रचना की थी, कई पुस्तकों का रूपांतरण किया था और अनुवाद करके कई अन्य भाषाओं में इनकी रचना करवाई थी। 

History of Shahjahan in Hindi

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई History of Shahjahan in Hindi के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


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