khizr khan sayyid vansh

khizr khan sayyid vansh

khizr khan sayyid vansh – ख़िज़्र खां ने सैयद वंश की स्थापना की थी।

तैमूर लंग के बार बार आक्रमणो और धन लूटे जाने की वजह से तुगलक वंश के नीव बहुत कमज़ोर पड़ गयी थी, और साथ ही साथ तैमूर ने ख़िज़्र खां को लाहौर क्षेत्र में शाशन करने के लिए छोड़ दिया था।

ख़िज़्र खां ने अपनी सत्ता को बढ़ाने के लिए तुग़लक़ वंश को ख़त्म कर दिया और सैयद वंश की स्थापना की।

दिल्ली सल्तनत में सैयद वंश से पहले तीनों वंश तुर्क मुसलमान वंश थे पर ये वंश तुर्क मुसलमान वंश नहीं था।

सैयद वंश ( 1414-1451 )

  1. खिज्र खां (1414-1421)
  2. मुबारक शाह (1421-1434)
  3. मुहम्मद शाह (1434-1443)
  4. आलम शाह (1443-1451)
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खिज्र खां (1414-1421)

ख़िज़्र खां ने सैयद वंश की स्थापना की थी।

तैमूर ने उससे प्रसन्न हो कर लाहौर के क्षेत्र की सूबेदारी उसको सौंपी थी।

उसने दिल्ली में उस समय शाशन स्थापित करने का प्रयास कर रहे दौलत खां लोदी को हराकर दिल्ली में अपनी सत्ता स्थापित कर ली।

सैयद वंश अपने आप को पैगंबर यानी हजरत मुहम्मद के वंशज मानते थे।

ख़िज़्र खां तैमूर के वंशज शारुख के प्रतिनिधि के रूप में शाशन करता था।

उसने कभी अपने आप को सुल्तान की उपाधि नहीं दी थी और इसके बदले उसने “रैयत-ऐ-आला” नामक उपाधि धारण कर रखी थी।

मुबारक शाह (1421-1434)

ख़िज़्र खां ने तो सुल्तान की उपाधि नहीं ली थी परन्तु उसके पुत्र ने सुल्तान की उपाधि ली थी, और साथ ही साथ उसने शाही नमक उपाधि भी ली थी।

ये पहला ऐसा सुल्तान था जिसने हिन्दू रईसो को दरबार में जगह दी थी।

उसके दरबार में एक इतिहासकार रहता था जिसका नाम था अहमद सरहिंदी, उसने मुबारक शाह के ऊपर एक पुस्तक की रचना की थी, उस पुस्तक का नाम था “तारीख-ऐ-मुबारक़शाही“।

उसने मुबारकाबाद नामक नगर की स्थापना की थी।

उसने भटिण्डा और दोआब क्षेत्र में हुए विद्रोहों को सफलतापूर्वक दबाया था।

इसके वज़ीर द्वारा इसकी हत्या करवा दी जाती है।

मुहम्मद शाह (1434-1443)

मुबारक शाह के बाद उसका भतीजा मुहम्मद शाह अगला सुल्तान बना।

मुहम्मद शाह का वास्तविक नाम मुहम्मद बिन फरीद खान था।

ये बहलोल लोदी की मदद मांगता है और उस वज़ीर की हत्या करवा देता है जिसने मुबारक शाह को मरवाया था।

उसने बहलोल लोदी को “खाने-खाना” की उपाधि दी थी।

आलम शाह (1443-1451)

अल्लाउदीन आलम शाह सैयद वंश का अंतिम शासक था।

आलम शाह का वज़ीर था जिसका नाम हमीद खान था।

उसके हमीद शाह से मतभेद होने के कारण वह दिल्ली छोड़कर बदांयू चले गया और वही उसकी मृत्यु हो जाती है।

उसके वजीर ने दिल्ली का राजपाठ बहलोल लोधी को सौंप दिया।

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धन्यवाद।


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