Mughal Dynasty in Hindi

Mughal Dynasty in Hindi ( 1526-1857 ) 👑 – उत्तर मुग़ल काल

Mughal Dynasty in Hindi – दोस्तों, पिछले मुग़ल शासकों के आर्टिकल्स में हमने मुग़ल काल के प्रारंभिक शासकों के बारे में पढ़ा, की कैसे बाबर द्वारा मुग़ल वंश की स्थापना करी जाती है और प्रारंभिक मुग़ल शासकों द्वारा इस को समृद्ध रूप दिया जाता है और एक विशाल साम्राज्य की स्थापना मुगलों द्वारा भारत में कर दी जाती है।

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में मुग़ल वंश ही सबसे विस्तृत रूप से पढ़ा जाता है। 

प्रारंभिक मुग़ल शासक काफी शक्तिशाली होते हैं, और काफी हद तक उनका साम्राज्य विस्तृत चलता रहता है, परंतु जब 3 मार्च 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु हो जाती है, तो उसके बाद जो उसके वंशज आते हैं, वे उतने शक्तिशाली नहीं हो पाते हैं और न ही वे साम्राज्य को आगे ले जा पाते हैं। 

इन्हीं असक्षम मुग़ल वंशजों अर्थात औरंगज़ेब के बाद के शासकों के अध्यन को हम उत्तर मुग़ल काल कहते हैं। 

तो चलिए हम उत्तर मुग़ल कालीन शासकों के बारे में जाने, लेकिन उससे पहले हम थोड़ा मूलभूत जानकारी प्रारंभिक मुग़ल काल के शासकों के बारे में जान लेते है, जिन्होंने मुग़ल वंश की नीव रखी और उसे मजबूत रूप दिया।

प्रारंभिक मुग़ल काल ( 1526 – 1707 ) – Mughal Dynasty in Hindi

शासक शासन काल संबंधित बिंदु
बाबर 1526 – 1530यह मुग़ल वंश के संस्थापक थे, 1526 में इन्होंने प्रथम पानीपत के युद्ध के दौरान विजय प्राप्त करने के बाद मुग़ल वंश की स्थापना करी।

मुग़ल वंश की स्थापना के बाद वह ज्यादा दिनों तक शासन नहीं कर पाए थे क्यूंकि 1530 में इनकी मृत्यु हो गई थी।  
हुमायुँ  1530 – 1556 ( 1540 – 1555, भारत से बाहर का पराजित जीवन ) इनका शासन काल दो चरणों में विभाजित होता है, क्यूंकि उसके शासनकाल के दौरान वह शेरशाह सूरी से पराजित होता है।

जिसकी वजह से वह 1540 से 1555 तक गद्दी पर नहीं बैठता है और बीच के 15 वर्ष वह भारत से बाहर ही अपना जीवन व्यतीत करता है।

वह फिर दुबारा 1555 में वापस आता है और अपना साम्राज्य वापस जीत लेता है, परंतु 1556 में उसकी मृत्यु हो जाती है। 
अकबर 1556 – 1605 हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य पर शेर शाह सूरी के वंशज का सेनापति हेमू कब्ज़ा कर लेता है, जिसकी वजह से हुमायूँ के पुत्र अकबर को 1556 में पानीपत का द्वितीय युद्ध करना पड़ता है। 
जहाँगीर 1605 -1627 जहाँगीर को सलीम के नाम से भी जाना जाता है, 1611 में नूरजहाँ से विवाह होने के बाद, उसके वास्तविक सत्ता का सुख नूरजहां के हाथों में रहा। 
शाहजहाँ 1627 – 1657 इसके काल को स्थापत्य कला का स्वर्ण युग कहा जाता है क्यूंकि इसके काल में इसने कई किलों, स्मारकों का निर्माण करवाया जिसमे दुनिया के सात अजूबों में से एक ताज़महल भी शामिल है। 

इसको इसके अंतिम वर्षों में इसके पुत्र औरंगज़ेब द्वारा 1658 में बंदी बना लिया जाता है, और कैद में रहते-रहते उसकी 1666 में मृत्यु हो जाती है। 
औरंगज़ेब 1658 – 1707 यह बहुत ही क्रूर और कट्टर मुस्लिम शासक बनकर सामने आता है।

यह अपने शासनकाल के प्रारंभिक 25 वर्ष उत्तर भारत और अंतिम 25 वर्ष दक्षिण भार
Mughal Dynasty in Hindi

दोस्तों, यह प्रारंभिक मुग़ल शासकों की सिर्फ मूलभूत जानकारी है क्यूंकि हमें उत्तर मुग़ल काल को समझने से पहले मुग़ल वंश के प्रारंभिक शासकों के बारे में पता होना चाहिए, आप इन प्रारंभिक मुग़ल शासकों की विस्तृत जानकारी हमारे पिछले मुग़ल शासकों के आर्टिकल्स में पढ़ सकते हैं। 

Mughal Dynasty in Hindi
Mughal Dynasty in Hindi – प्रारंभिक दौर 1526-1707 तक मुगल साम्राज्य, परंतु औरंगज़ेब की 1707 में मृत्यु के बाद, उत्तर मुगल काल के दौर में मुगल साम्राज्य घटता ही चले गया

उत्तर मुग़ल काल ( 1707 – 1857 ) – Mughal Dynasty in Hindi

3 मार्च 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद, उत्तर मुग़ल काल 1707 में प्रारंभ होता है और 1857 में जब बहादुर शाह जफ़र 1857 की क्रांति जो उस समय अंग्रेजों के विरुद्ध हुई थी, उसमे वे भाग जाते हैं और उन्हें पराजय का सामना करना पड़ता है। 

बहादुर शाह जफ़र की पराजय के बाद अंग्रेजों द्वारा उन्हें रंगून ( म्यांमार ) में कैद में भेज दिया जाता है, और वहीं उनकी मृत्यु हो जाती है और इससे उत्तर मुग़ल काल का अंत हो जाता है। 

इसी 1707 से 1857 की क्रांति तक के समय को “उत्तर मुग़ल काल” कहा जाता है। 

उत्तर मुग़ल काल के शासक 

उत्तर मुग़ल काल के क्रम में कई शासक आए और इन शासकों को कुछ अलग-अलग नामों से भी पुकारा गया और उस दौरान कुछ अन्य राज्य भी स्वतंत्र होकर बनने लगे थे। 

आइये हम इन शासकों के बारे में और इनके कार्यों के संबंध में पढ़ें, परंतु उससे पहले हम इनके क्रमों पर दृष्टि डालते है:

शासक शासन काल अन्य नाम
बहादुर शाह ( 1707 – 1712 ) शाहे बेखबर
जहाँदार शाह ( 1712 – 1713 )  लम्पट मुर्ख
फर्रूखशियर ( 1713 – 1719 )  घृणित कायर
रफ़ी-उद-दरज़ात ( 1719 )  
रफ़ी-उद-दौला ( 1719 )  
मुहम्मद शाह ( 1719 – 1748 )  रंगीला बादशाह
अहमद शाह ( 1748 – 1754 )
आलमगीर द्वितीय ( 1754 – 1758 )
शाह आलम द्वितीय ( 1759 – 1806 )
अकबर द्वितीय ( 1806 – 1837 )
बहादुर शाह द्वितीय / जफ़र ( 1837 – 1857 ) 

चलिए दोस्तों अब हम इन उत्तर मुग़ल कालीन शासकों के बारे में और इनसे जुडी घटनाओं के बारे में थोड़ा विस्तार में जानें:

बहादुर शाह प्रथम ( 1707 – 1712 )

औरंगज़ेब के तीन पुत्र थे मुअज्जम, आज़म और कामबक्श। 

औरंगज़ेब ने अपने तीनो पुत्रों में वसीहत के माध्यम से विभाजन का निर्णय लिया था, परंतु जैसा की मुगलों में राजा बनने के लिए आपस में युद्ध की जो प्रथा चली आ रही थी, वैसा ही औरंगजेब के तीनो पुत्रों में भी हुआ। 

औरंगज़ेब के तीन पुत्रों में से एक पुत्र मुअज्जम अपने बाकी दो भाइयों को पराजित करके राजा बन जाता है और वह बहादुर शाह के नाम से राजा बनता है।

उत्तराधिकार का युद्ध 

मुअज्जम ने बहादुर शाह के नाम से अपने आप को राजा की गद्दी पर स्थापित कर लिया और अपने दोनों भाइयों को अपने आधीन करने के लिए उसने दो युद्ध लड़े। 

पहला युद्ध आगरा के पास जजाऊ का युद्ध लड़ा गया, जिसमे मुअज्जम और आज़म के बीच युद्ध हुआ और मुअज्जम को विजय प्राप्त हुई। 

दूसरा युद्ध दक्षिण भारत में बीजापुर का युद्ध लड़ा गया, जिसमे मुअज्जम और कामबक्श के बीच युद्ध हुआ और मुअज्जम को विजय प्राप्त हुई। 

इस प्रकार उसने अपने भाइयों के साथ दो युद्ध लड़े और स्वयं को सर्वश्रेष्ट राजा बनाया और बहादुर शाह के नाम से शासन करता है। 

यह राजा बनने के बाद केवल 5 साल ही जीवित रह पाता है, इसके साथ ही उसे ख़फ़ी खां के द्वारा “शाहे बेखबर” की उपाधि दी गयी थी। 

बहादुर शाह ने अपने पिता औरंगज़ेब की असहिष्णु नीतियां जैसे की हिन्दुओं के साथ कट्टरता, भारतीय शासकों के साथ कड़ा व्यवहार, धार्मिक नीतियां, राजपूत नीतियां, इन सभी को बदलते हुए सहिष्णु नीतियां अपनायी जैसे भारतीय शासकों के साथ जैसे मराठा, सिख, राजपूत एक मिलीजुली नीति अपनायी। 

कहा जाता है की औरंगज़ेब की जब मृत्यु होती है तब सिक्खों के दसवें गुरु गोविंद सिंह के साथ मुगलों की संधि हो गयी थी, परंतु औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद गुरु गोविंद सिंह की हत्या हो जाती है जिसके बाद सिक्खों के प्रमुख बंदा बहादुर से मुगलो के संबंध ख़राब हो जाते हैं। 

अन्य भारतीय शासकों के साथ बहादुर शाह के समय में मुगलो के संबंध ठीक रहते हैं।

जहाँदार शाह ( 1712 – 1713 ) 

बहादुरशाह के चार पुत्र थे और उन चारों पुत्रों में भी उत्तराधिकार का युद्ध हुआ। 

उस समय एक शक्तिशाली सामंत था, जिसका नाम जुल्फिकार खां था उसने जहाँदार शाह का साथ दिया था, जिसके कारण बाकी तीनों भाइयों को हराते हुए सबसे कमज़ोर पुत्र ही शासक बन जाता है और इसे “लम्पट मुर्ख” भी कहा जाता है।   

शासक बनते ही जहाँदार शाह ने जुल्फिकार खां को वज़ीर का पद प्रदान किया और वज़ीर बनने के बाद वास्तविक सत्ता जुल्फिकार खां ही चलाने लग जाता है। 

इस दौरान जहाँदार शाह, लालकुवरि नामक वैश्या के साथ संबंध के कारण चर्चा में रहता है, जिसके कारण वह राजपाठ में ज्यादा रुचि नहीं रखता है और वास्तविक सत्ता जुल्फिकार खां ही चलाता है। 

इसके समय में भी बंदा बहादुर को छोड़कर अन्य भारतीय शासकों के साथ मुगलों के संबंध अच्छे थे। 

यह केवल एक वर्ष शासन करता है और उसका पूरा शासन उसके वज़ीर के द्वारा चलाया जाता था और साथ ही साथ वह किसी भी प्रकार से संस्कारी नहीं था।

इस क्रम में सय्यद बंधुओ का दौर शुरू होता है, सय्यद बंधु दो भाई होते हैं और ये सय्यद बंधु फर्रूखशियर का साथ देते हैं और फर्रूखशियर जहाँदार शाह को मारने में सफल हो जाता है। 

फर्रूखशियर ( 1713 – 1719 )

औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद से ही मुग़ल दरबार में दो व्यक्तियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था जिन्हे सय्यद बंधु कहा जाता था, उनका प्रभाव यहाँ तक बढ़ गया था की वे राजाओं का निर्माण करने लगे। 

इसको शासक बनाने में सबसे बड़ा सहयोग सय्यद बंधुओ का होता है, जो भारतीय क्षेत्र के दो मुस्लमान भाई अब्दुल्लाह खां ऐंव हुसैन खां थे, जिनके पास वज़ीर समान शक्ति थी अर्थात सैन्य शक्ति थी, जिसके सहयोग के कारण फर्रूखशियर सत्ता प्राप्त करता है, इसे “घृणित कायर” के नाम से भी जाना जाता है। 

फर्रूखशियर ने शासक बनने के साथ सय्यद बंधु को इनाम स्वरुप अब्दुल्लाह खां को वज़ीर का पद प्रदान किया और हुसैन खां को मीर बक्शी बनाया जो सैन्य संबंधी कार्यों को संभालता था। 

इसके समय बंदा बहादुर को 1716 में दिल्ली में फांसी दे दी जाती है और 1717 में अंग्रेजों को फर्रूखशियर ने शाही फरमान दिया था और इसे अंग्रेजी कंपनी के लिए “मैग्नाकार्टा” कहा जाता है। 

शाही फरमान के तहत इसने अंग्रेजों को साल के 3000 की कीमत के बदले बंगाल क्षेत्र में मुक्त व्यापार करने की अनुमति दी थी। 

फर्रूखशियर ने राजस्थान के राजा जयसिंह को “सवाई” की उपाधि दी थी और “सवाई राजा जय सिंह” के नाम से उन्हें जाना जाता है। 

फर्रूखशियर जब सय्यद बंधुओ के सहयोग से शासक बनता है तब बाद में उसे लगता है की सय्यद बंधु उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहें हैं इसलिए बाद में वह इन सय्यद बंधुओ को हटाना चाहता था, परंतु सय्यद बंधुओ ने फर्रूखशियर की ही हत्या करवा दी और वे नए शासकों का चयन करते है। 

रफ़ी-उद-दरज़ात ( 1719 ) 

फर्रूखशियर की हत्या करवाने के बाद सय्यद बंधु रफ़ी-उद-दरज़ात को शासक बनाते हैं, सय्यद बंधु ने रफ़ी-उद-दरज़ात को फरवरी 1719 में बादशाह घोषित किया और जून 1719 तक उसकी फेफड़े की बीमारी से मृत्यु हो जाती है। 

रफ़ी-उद-दौला ( 1719 ) 

इसके बाद सय्यद बंधु रफ़ी-उद-दौला को बादशाह बनाते है और इसकी भी मृत्यु फेफड़े की बीमारी से सितम्बर 1719 में ही हो जाती है। 

यह दोनों कुछ महीनों के लिए शासक बनते है और दोनों की बिमारियों की वजह से जल्दी मृत्यु हो जाती है और इन दोनों को भी शासक सय्यद बंधुओ के योगदान से बनाया जाता है। 

इसी कारण से सय्यद बंधुओ को शासक निर्माता के रूप में भी जाना जाता है। 

मुहम्मद शाह ( 1719 – 1748 )

अब सय्यद बंधु मुहम्मद शाह को शासक बनाते हैं, परंतु मुहम्मद शाह को ये आभास था की जैसा की सय्यद बंधुओ ने मुझसे पहले के शासकों के साथ किया, यह वे मेरे साथ भी कर सकते है, इसलिए मुहम्मद शाह ने धोखे से सय्यद बंधुओ की ही हत्या करवा दी थी। 

इसे “रंगीला बादशाह” के नाम से भी जाना जाता है, इसके शासन काल में मुग़ल शासन टूटने की स्थिति में पहुँच जाता है और बहुत सारे क्षेत्र मुग़ल शासन से अलग होने लग जाते हैं। 

मुहम्मद शाह के समय मुग़ल शासन से अलग होने वाले क्षेत्र और उनके संस्थापक:

1. बंगाल – मुर्शिदकुली खां 

2. हैदराबाद – चिनकिलिच खां, इसे निज़ाम-उल-मुल्क के नाम से भी जाना जाता है। 

3. अवध – सआदत खां 

4. कर्नाटक – सादुतुल्ला खां 

इन सभी लोगों ने मुहम्मद शाह के समय अपने आप को और अपने क्षेत्रों को मुगलों से अलग करना शुरू कर दिया था। 

मुहम्मद शाह के समय ईरान क्षेत्र का शासक नादिर शाह भारत पर आक्रमण करता है, नादिर शाह शुरू में एक चरवाहा था बाद में चलकर वह फारस का शासक बनता है। 

1736 में फारस का शासक बनने के बाद 1739 में वह भारत पर आक्रमण करता है, नादिर शाह को उसके आक्रमणों के कारण “ईरान का नेपोलियन” भी कहा जाता है। 

मुहम्मद शाह उस समय एक कमजोर शासक के रूप में सामने आता है और नादिर शाह आक्रमण करते हुए दिल्ली पहुँच जाता है और लगभग 57 दिनों तक दिल्ली में रुकता है और बहुत सारा कत्लेआम मचाता है और बहुत सारा धन लूटता है।

वह अपने साथ कोहीनूर हीरा और शाहजहाँ का तख़्त-ऐ-हाउस जिसे मयूर सिंहासन के नाम से भी जाना जाता है और बहुत सारा खज़ाना लूट कर ले जाता है, उसका उद्देश्य धन लूटना ही था, शुरू में वह पंजाब क्षेत्र से ही लौट जाता है, परंतु मुहम्मद शाह के एक सहयोगी के बुलाने पर ही वह दुबारा आता है और दिल्ली आकर खूब सारा धन लूटता है और कत्लेआम मचाता है। 

अहमद शाह ( 1748 – 1754 )

ईरान वापिस जाने के बाद नादिर शाह की मृत्यु हो जाती है और उसके बाद ईरान का शासक अहमद शाह अब्दाली बनता है। 

अहमद शाह अब्दाली भी नादिर शाह के कार्यों से प्रेरित होता है और वह भारत पर 7 बार आक्रमण करता है और वह अपना पहला आक्रमण 1748 में मुग़ल शासक अहमद शाह के समय करता है। 

आलमगीर द्वितीय ( 1754 – 1758 )

इसके समय एक बहुत महत्वपूर्ण घटना हुई थी, प्लासी का युद्ध जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौलाह के बीच हुआ था, उस समय आलमगीर द्वितीय मुग़ल बादशाह था। 

शाह आलम द्वितीय ( 1759 – 1806 )

जब आलमगीर द्वितीय की मृत्यु होती है, तब शाह आलम द्वितीय बिहार के क्षेत्र में होता है और वह वहीं स्वंय को राजा घोषित कर देता है, परंतु उसी समय दिल्ली में शाहजहाँ तृतीय भी अपने आप को राजा घोषित कर देता है, दोनों में लड़ाई होती है और शाह आलम द्वितीय की जीत होती है। 

इसके समय दो महत्वपूर्ण युद्ध हुए थे पहला 1761 में पानीपत का तृतीय युद्ध जो ईरान शासक अहमद शाह अब्दाली और मराठाओं के  बीच हुआ था, जिसमें मराठाओं की हार हुई थी और मराठाओं का मुगलों को हटाकर भारत में शासन करने का सपना टूट जाता है। 

दूसरा 1764 में बक्सर का युद्ध जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय, बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजा-उद-दौलाह तीनों ने मिलकर लड़ा था, जिसमे अंग्रेजों को विजय प्राप्त हुई थी।

बक्सर के युद्ध के बाद शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजा-उद-दौलाह और अंग्रेजों के बीच 1765 में इलाहबाद की संधि होती है। 

शाह आलम द्वितीय को बाद में अँधा बना दिया जाता है और वह एक अंधे शासक के रूप में लंबे समय तक कार्य करता रहता है। 

इसी क्रम में 1803 में ब्रिटेन के सैन्य अधिकारी लॉर्ड लेक के प्रयासों से यह घोषित हो जाता है शाह आलम द्वितीय अब अंग्रेजों के संगरक्षण में हैं।

अकबर द्वितीय ( 1806 – 1837 )

अब भारत में मुगलों की स्थिति काफी खराब हो गई थी और अंग्रेज उनके साथ काफी अनैतिक व्यवहार कर रहे थे, तब अकबर द्वितीय राजा राम मोहन रॉय को बुलाते हैं और कहते हैं की आप ब्रिटेन जाइए और हमारी तरफ से ब्रिटेन की महारानी को संदेश दीजिए कि हमारी स्थिति ठीक नहीं है। 

इसी क्रम में अकबर द्वितीय, राजा राम मोहन रॉय को “राजा” की उपाधि देते हैं। 

Mughal Dynasty in Hindi – शाह आलम द्वितीय और अकबर द्वितीय का मकबरा

बहादुर शाह द्वितीय ( 1837 – 1857 ) 

इन्हे बहादुर शाह जफ़र के नाम से भी जाना जाता है, कहा जाता है की मुगलों की स्थिति इतनी ख़राब हो गई थी की उनकी राज्य की सीमा बहुत छोटी हो गई थी और उन्हें उनके लालकिले से भी बाहर निकला जा रहा था। 

इसी क्रम में अंग्रेजों के खिलाफ 1857 की क्रांति शुरू होती है और क्रांतिकारियों के कहने पर मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र, जो अब बूढ़े भी हो चुके थे, वे क्रांति का नेतृत्व करने के लिए तैयार हो जाते है। 

परंतु अंग्रेजों के सामने जब क्रांतिकारी नही टिक पाते हैं, तो बहादुर शाह जफ़र पराजित हो जाते हैं। 

बहादुर शाह जफ़र के पराजित होने पर उन्हें अंग्रेजों द्वारा पकड़ लिया जाता है और उन्हें रंगून ( म्यांमार ) की जेल में भेज दिया जाता है और वहीं 1862 में उनकी मृत्यु हो जाती है।

इस प्रकार से पूरे मुग़ल वंश की समाप्ति हो जाती है।  

जब मुगलों की पूरी तरह से समाप्ति हो जाती है तब ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया द्वारा 1 नवंबर, 1858 को विधवत और कानूनी रूप से ये मान लिया जाता है की मुगलों की सत्ता समाप्त हो गई है और उसे ब्रिटेन का अंग मान लिया जाता है।  

Mughal Dynasty in Hindi

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई Mughal Dynasty in Hindi के बारे में  जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।


यह भी पढ़े: Aurangzeb History in Hindi

यह भी पढ़े: History of Shahjahan in Hindi

यह भी पढ़े: History of Jahangir in Hindi

यह भी पढ़े: The History of Akbar in Hindi

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *