the history of akbar in hindi

The History of Akbar in Hindi – बैरम खां, पर्दा शासन, साम्राज्य विस्तार, नौ रत्न, सुधार कार्य

The History of Akbar in Hindi – दोस्तों, हमने पिछले आर्टिकल में हुमायूँ के बारे में पढ़ा था, आज हम मध्यकालीन भारतीय इतिहास और मुग़ल काल के सबसे महत्वपूर्ण शासक अकबर के विषय में पढ़ेंगे। 

अकबर का शासनकाल 1556 से लेकर 1605 तक का था और उसने लगभग 50 वर्षों तक मुग़ल सत्ता की जड़ों को मजबूत रखा था। 

इस आर्टिकल में हम अकबर के परिचय, उसके प्रारंभिक संघर्ष, वो कैसे एक स्थापित राजा के रूप में आता है, उसने कैसे कई युद्ध लड़के अपने साम्राज्य का विस्तार किया, इन सभी विषयों से संबंधित जानकारी, अकबर के महत्वपूर्ण कार्य जैसे दास प्रथा का समापन, धर्म के क्षेत्र में दीन-ऐ-इलाही धर्म की स्थापना, अकबर के नौ रत्न, उसके प्रशासन से जुड़े हुए विषयों के बारे में पढ़ेंगे, तो चलिए आज के आर्टिकल की तरफ आगे बढ़ते है। 

Contents hide

अकबर का परिचय 

अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 में हुआ था, अकबर के पिता का नाम हुमायूँ था और माता का नाम हमीदा बानो बेगम था जो की हुमायूँ के भाई के गुरु की पुत्री थी और सिया धर्म से संबंधित थी।

हुमायूँ जब पराजित होकर भारत से बाहर भाग कर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के क्षेत्रों में भाग गया था उसी समय अकबर का जन्म अमरकोट के राजा राणा वीरसाल के यहाँ हुआ था। 

अकबर का राज्याभिषेक 14 फरवरी 1556 को हुआ था और कहा जा सकता है की वह 14 वर्ष की आयु में ही राजा बन गया था या उसे राजा बनना पड़ा था, दोनों ही बातें कही जा सकती हैं क्यूंकि उसके पिता हुमायूँ की अचानक मृत्यु से उसका राज्याभिषेक करना पड़ा था। 

जब उसके पिता की मृत्यु दिल्ली में होती है तब वह पंजाब के क्षेत्र में था, इसलिए उसे कालानौर जो की पंजाब का क्षेत्र था वहाँ अपना राज्याभिषेक करना पड़ा था। 

अकबर ने अपने प्रधानमंत्री के रूप में बैरम खां को नियुक्त किया था, जो की उसका संरक्षक भी था और अकबर उसे प्यार से खान बाबा कहकर भी संबोधित करता था, इसके अलावा बैरम खां वज़ीर के पद पर भी स्थापित हुआ था, और बैरम खां के संरक्षण में ही उसका राज्याभिषेक हुआ था और उसका शासन प्रारंभ हुआ था। 

अकबर के बारे में जानने में सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत है अकबरनामा जिसकी रचना अबुल फज़ल ने की है, और अकबरनामा के तीसरे अध्याय को आईने अकबरी के नाम से जाना जाता है और इस आईने अकबरी से अकबर के संबंध में बहुत सारी जानकारी प्राप्त होती है।   

akbar birth place
The History of Akbar in Hindi – अकबर का जन्म स्थान

बैरम खां का संरक्षण ( 1556 – 1560 )

जैसा की हमने पहले बताया की अकबर 14 वर्ष की अल्प आयु में ही राजा बन गया था या उससे बनना पड़ा था क्यूंकि उसके पिता की मृत्यु अचानक हो गयी थी और उसे राजा बनने का मौका मिल गया था। 

अतः वह प्रारंभिक जीवन में ही बैरम खां के संरक्षण में राजा के रूप में शासन करना शुरू कर देता है और शासन संभालने लग जाता है।

पानीपत का द्वितीय युद्ध ( 5 नवंबर 1556 )

जब पंजाब के कालानौर में अकबर राजा बना, तब दिल्ली जो की केंद्र थी वहां की स्थिति यह थी की, आदिल शाह जो की सूर वंश से संबंधित था, वही सूर वंश जिसे अकबर के पिता हुमायूँ ने भारत में वापस सत्ता प्राप्त करने के लिए पराजित किया था। उसी सूर वंश से संबंधित आदिल शाह के सेनापति हेमू ने दिल्ली पर आक्रमण किया और दिल्ली पर कब्ज़ा कर लेता है।  

पंजाब में बैठा अकबर इसकी सूचना प्राप्त करता है और अकबर हेमू को पराजित करने के लिए दिल्ली की तरफ बढ़ता है और पानीपत में अकबर और हेमू का युद्ध होता है इसलिए इसे पानीपत के युद्ध के नाम से जानते हैं, परंतु हमने हमारे बाबर वाले आर्टिकल में बताया था की बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच भी पानीपत का युद्ध हुआ था, इसलिए उसे पानीपत का प्रथम युद्ध कहा जाता है और अकबर और हेमू के बीच हुए युद्ध को पानीपत का द्वितीय युद्ध कहा जाता है। 

पानीपत के द्वितीय युद्ध की पृष्ठभूमि ( background )

जब सूर वंश से संबंधित आदिल शाह के सेनापति हेमू ने दिल्ली पर आक्रमण किया तब दिल्ली पर मुग़ल वंश का एक सूबेदार था जिसका नाम तार्दीबेग था, वह शासन चला रहा था। हेमू ने तार्दीबेग को पराजित कर भागने पर मजबूर कर दिया और हेमू ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। 

इस प्रकार हेमू मध्यकालीन भारत का एकमात्र हिन्दू शासक था जिसने दिल्ली पर अधिकार किया था। हेमू एक नमक व्यापारी था और बहुत ही गरीब परिवार से था परंतु उसके कार्यों को देखते हुए सूर वंश के वंशजों ने हेमू को अपने दरबार में शामिल कर लिया था और बाद में आदिल शाह ने उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसे सेनापति नियुक्त कर दिया था। 

उसने लगातार 22 युद्धों में जीत हासिल करी थी और हेमू एक प्रतापी सेनापति बनकर उभरा था और इसी क्रम में वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वह दिल्ली पर आक्रमण करता है और दिल्ली पर सत्ता स्थापित कर लेता है।  

दिल्ली पर विजय पाने के बाद हेमू ने अपने आप को “विक्रमादित्य की उपाधि दी और विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाला वह भारत का 14वां शासक था। 

हेमू ने तार्दीबेग को जब हराया तो वह पंजाब भाग कर अकबर के पास पहुँचता है और अकबर को यह सूचना देता है की दिल्ली पर हेमू ने कब्ज़ा कर लिया है और हेमू बहुत ही ताकतवर शासक है और शायद अब हम उससे नहीं जीत पाएंगे।

इस सूचना को पाकर अकबर थोड़ा परेशान और गुस्से में आ जाता है और इस गुस्से का यह असर होता है की बैरम खां ने तार्दीबेग की हत्या कर दी क्यूंकि वह नकारात्मक बातें कर रहा था और यह बता रहा था की हम लोग अब दिल्ली पर पुनः अधिकार नहीं कर सकते हैं और तार्दीबेग की हत्या करने के बाद अकबर और बैरम खां हेमू से युद्ध करने के लिए दिल्ली की तरफ बढ़ते हैं और पानीपत के क्षेत्र में होता है द्वितीय पानीपत का युद्ध। 

पानीपत में हेमू और अकबर के बीच भीषण युद्ध 

अंत में 5 नवंबर 1556 को हेमू और अकबर के बीच पानीपत का द्वितीय युद्ध होता है और अकबर का मूल सेनापति बैरम खां ही होता है। 

हेमू पूरी तरह से इस युद्ध में जीत रहा होता है, परंतु हाथी पर बैठे हेमू की आँख पर तीर लग जाता है, और जैसे ही उसके आँख में तीर लगता है वह हाथी पर बने हौदे पर गिर जाता है। 

हेमू के गिरने के बाद सेना को पता चलता है की हेमू मारा गया और सेना में भगदड़ मच जाती है और हेमू को पकड़ कर अकबर के पास लाया जाता है और फिर बैरम खां उसे मृत्यु दंड देता है और उसका सर काट देता है। 

इस प्रकार प्रकार द्वितीय पानीपत के युद्ध में हेमू की हार होती है और अकबर को विजय प्राप्त होती है और पुनः दिल्ली पर मुग़ल सत्ता आ जाती है और 1556 में फिरसे एक बार ऐसा लगा था की दिल्ली से मुग़ल सत्ता बाहर हो जायगी परंतु इस युद्ध से दिल्ली पर मुग़ल सत्ता फिर से स्थापित हो जाती है और जो अकबर सिर्फ पंजाब में शासन कर रहा था, अब वह दिल्ली का बादशाह बन जाता है। 

बैरम खां की मृत्यु ( 1560 )

बैरम खां से कुछ लोगों ने जलना शुरू कर दिया था, खासकर महिला वर्ग जिसे “हरम दल” भी कहा जाता था, हरम शाही महिलाओं के रहने के लिए अलग स्थान होता था, इसके अलावा कुछ दरबारी भी बैरम खां से जलते थे, इसका कारण यह था की बैरम खां का प्रभाव प्रशासन के ऊपर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था और ऐसे में अकबर का प्रभाव कम और बैरम खां का प्रभाव ज्यादा दिखने लग गया था। 

एक कारण यह भी था की बैरम खां सिया मुसलमान था और अधिकांश दरबारी जो थे वो सुन्नी मुसलमान थे इसलिए भी दरबारी उससे जलते थे।

दूसरी ओर अकबर ने भी कई बार ऐसे अवसर देखे जब उसे लगा की वह चाहता कुछ और है और बैरम खां करता कुछ और है, ऐसे में बैरम खां से भी दूरीयाँ धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। 

बैरम खां से जुड़े कुछ बिंदु 

1. अकबर को कुछ सरदारो ने खासकर सिया और सुन्नी मुसलमानों का मुद्दा उठा कर के और इसके अलावा अकबर की धाय माँ जिसने उसका लालन-पालन और देखभाल किया था, जिसका नाम माहम अनगा था उन्होंने अकबर को बैरम खां के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया था। 

अकबर को भी यह महसूस होने लगा की बैरम खां अपनी सीमा से अधिक हमारे मामले में हस्तक्षेप करता है और अब जब मैं बड़ा हो गया हूँ, इसलिए मैं योग्य हूँ अपने प्रशासन को चलाने के लिए और अब मुझे बैरम खां की सहायता की आव्यशकता नहीं है। 

2. ऐसी स्थिति में अकबर ने बैरम खां को एक संदेश पहुँचाया की तुम मक्का चले जाओ, उस समय बैरम खां अपने राज्य से बाहर एक अभियान के लिए गया था और अकबर ने सीधा वहीं उसके पास बाहर ही यह संदेश पहुँचाया था और बैरम खां को वहीं पर यह सूचना दी गयी की आप मक्का के लिए चले जाएं, आपको वापस दरबार में आने की जरुरत नहीं है।

बैरम खां ने अकबर का यह संदेश स्वीकार कर लिया और उसने मक्का जाने का निर्णय लिया। 

परंतु उसके मक्का जाने के क्रम में उस पर मुगलो की सेना हमला कर देती है और अकबर की सेना और बैरम खां के बीच एक युद्ध होता जिसे तिलवाड़ा का युद्ध के नाम से जाना जाता है, इस युद्ध में बैरम खां की हार हो जाती है। 

3. बैरम खां को पकड़ लिया जाता है और क्यूंकि वह अकबर का संरक्षक रहा था और उसने अकबर की बहुत सहायता करी थी, इसलिए अकबर उसे तीन विकल्प देता है। 

पहला विकल्प यह था की बैरम खां को किसी राज्य का सूबेदार बना दिया जाए।

दूसरा विकल्प दिया गया की बैरम खां एक सुरक्षा सलाहकार के रूप में कार्य करें। 

तीसरा विकल्प यह था की बैरम खां मक्का की यात्रा पर चले जाए और वहीं अपना पूरा जीवन व्यतीत करें। 

क्यूंकि बैरम खां बहुत ही प्रभावशाली पद पर रह चुका था जो की प्रधानमंत्री तथा वज़ीर का पद था, इसलिए वह किसी छोटे पद को स्वीकार नहीं करना चाहता था क्यूंकि उसे लगता था की वह उसके सम्मान के विपरीत का पद है और ऐसे में उसने मक्का जाने के विकल्प को चुना और तय किया की वह मक्का चला जायगा। 

4. जब वह मक्का जाने लगा तब रास्ते में पाटन, गुजरात में उसके ऊपर कुछ लोगों ने आक्रमण कर दिया, और वो मुबारक खां था जिसने बैरम खां पर आक्रमण किया था।

मुबारक खां एक अफगान मुसलमान था, जिसके पिता की हत्या मच्छीवाड़ा के युद्ध में बैरम खां ने कर दी थी और वह कई दिनों से इस अवसर में था की कब उसे बैरम खां की हत्या करने का अवसर प्राप्त हो और पाटन, गुजरात में उसको यह मौका मिला और वहाँ उसने बैरम खां की हत्या कर दी। 

यह सूचना जैसे ही अकबर को मिली, उसने बैरम खां की पत्नी और पुत्र को अपने संरक्षण में लेने का निर्णय लिया और उसने बैरम खां की विधवा सलीमा बेगम से विवाह कर लिया, सलीमा बेगम अकबर के चाचा की पुत्री यानी हुमायूँ की भतीजी थी जिससे बैरम खां ने विवाह किया था। 

सलीमा बेगम समाज की ठोकरें न खाएं इसलिए अकबर ने सलीमा बेगम से विवाह करा, इसके अलावा बैरम खां के पुत्र अबदुरहीम को अकबर ने शिक्षा-दीक्षा दिलवायी और अपने दरबार में रखा, बाद में उसने उसे “खान-ऐ-खाना” की उपाधि दी और वह अकबर के नौ रतनो में भी शामिल हुआ। 

इस प्रकार बैरम खां का पतन 1560 में हो जाता है। 

पर्दा शासन / पेटीकोट शासन ( 1560 – 1564 )

पर्दा शासन से यह तात्पर्य है की महिलाओं की प्रधानता का बढ़ना, इसमें शासन व्यवस्था में महिलाओं का प्रभाव ज्यादा होता है, इसे पेटीकोट शासन के नाम से भी संभोदित किया जाता है। 

इस समय में शासन पर अकबर की धाय माँ यानी माहम अनगा, उसके पुत्र आधम खां, पुत्री जीजी अनगा इन सब का प्रभाव बहुत ज्यादा था, और इस क्रम में हरम दल के अधिक प्रभावशाली होने के कारण ही इस काल को पर्दा शासन या पेटीकोट शासन के नाम से जाना जाता है। 

जिसके कारण अकबर स्वतंत्र रूप से शासन नहीं कर सका था। 

इस दौरान आधम खां जो अकबर की धाय माँ यानी माहम अनगा का पुत्र था, उसने 1561 में मालवा पर आक्रमण किया और इस क्रम में उसने काफी धन लूटा, परंतु लूट का जो भी धन था उसने उस धन को राजकीय कोष में जमा करने की जगह स्वयं ही उस धन का अधिकांश भाग अपने पास रखा। 

अकबर ने आधम खां को चेतावनी दी की वह सारा धन राजकीय कोष में जमा करवाए, परंतु आधम खां ने अकबर की ही हत्या करवाने का प्रयास किया, इस बात से दुखी होकर अकबर ने 1562 में आधम खां की हत्या करवा दी अर्थात उसे मृत्यु दंड दे दिया। 

इस शोक में आधम खां की माँ यानी अकबर की धाय माँ जिनका नाम माहम अनगा था वह भी 1562 में ही मृत्यु को प्राप्त हो गई। 

इस प्रकार अकबर के ऊपर से 1562 के आते-आते पर्दा शासन का प्रभाव कम होने लगा था और इसके उपरांत 1564 तक पर्दा शासन का पूरी तरह से अंत हो जाता है। 

अकबर का साम्राज्य विस्तार 

इस क्रम में अकबर ने अपने साम्राज्य विस्तार के ऊपर हमेशा ध्यान रखा और अपने साम्राज्य विस्तार को प्रश्रय देना शुरू किया, इस क्रम में न केवल उसने स्थानीय और अगल-बगल के क्षेत्रों को बल्कि राजपूत राजाओं को, इसके अलावा उत्तर भारत और उत्तर पश्चिम भारत के राजाओं को और दक्षिण भारत के राजाओं को पराजित करने का प्रयास किया, आइये अकबर के उन अभियानों पर दृष्टि डालें:  

मालवा 

अकबर ने मालवा पर 1561 में अभियान चलाया और इसका नेतृत्व उसने सौंपा था धाय माँ के पुत्र आधम खां को, उस समय मालवा का शासक बाज़बहादुर था।

आधम खां ने वहां अभियान किया और बाज़बहादुर को पराजित कर के वहां की राजधानी जिसका नाम सारंगपुर था, वहां अधिकार कर लिया और ढेर सारा धन लूटा, जिस धन में से उसने अधिकांश भाग अपने पास रख लिया था। 

चुनार  

1561 में ही अकबर ने चुनार पर अभियान किया और आसफ खां, जो उसका दूसरा प्रमुख सेनापति था उसके नेतृत्व में उसने चुनार के किले को जीता। 

गोंडवाना 

अकबर के महत्वपूर्ण आक्रमणों में गोंडवाना, जो उत्तर प्रदेश का क्षेत्र था, यह अकबर का महत्वपूर्ण आक्रमण माना जाता है। 

यहाँ पर मात्र 3 वर्ष का बालक जिसका नाम वीरनारायण था वह शासन कर रहा था, हालांकि वास्तविक शासक वीरनारायण की माता थी, जिनका नाम दुर्गावती था, क्यूंकि उनका जन्म दुर्गाष्टमी को हुआ था इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया था और वह 16 वर्षों से वहां एक संरक्षिका के रूप में शासन कर रही थी। 

जब वह बालक तीन वर्ष का था तभी से वो एक संरक्षिका के रूप में वहां शासन करना शुरू करती हैं और एक बहुत अच्छा शासन स्थापित करती है। 

परंतु अकबर को उसके सेनापति आसफ खां ने बहुत बढ़काया और गोंडवाना पर आक्रमण कर दिया। 

1564 में गोंडवाना पर आक्रमण किया गया और मुगलों ने किले पर अपना अधिकार कर लिया, इस युद्ध में दुर्गावती बहुत वीरता के साथ लड़ी और लड़ते-लड़ते जब उन्होंने देखा की मुगलों के जीत हो जाएगी और वो घायल भी हो गई थी, तब उन्होंने अपने सेनापति को कहा की मेरी हत्या कर दो ताकि मैं एक शहीद के रूप में मरू परंतु उनके सेनापति ने यह करने से मना कर दिया, तो उन्होंने 24 जून 1564 को खुद ही अपने सीने में तलवार मारी और युद्ध भूमि में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। 

रानी दुर्गावती की कहानी इतिहास में बहुत ही प्रेरणादायक मानी जाती है और जिस दिन उन्होंने अपने प्राण त्यागे यानी 24 जून 1564 को, इस दिन को “बलिदान दिवस” के रूप में भी मनाया जाता है। 

राजस्थान के राजपूत राज्य 

अकबर के शासन काल में अकबर और राजपूतों का एक अलग ही संबंध देखने को मिलता है। 

अकबर ने राजपूतों पर तीन तरीके से अधिकार किये थे, पहला यह था जिसे हम वैवाहिक संबंध के रूप में जानते है, अकबर ने राजपूत राजाओं के यहाँ विवाह किया, जिसके कारण संधिपूर्ण संबंध बन गए। 

दूसरा, जहाँ विवाह तो नहीं किया पर वहां के राजपूत राजाओं ने स्वेक्षा से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।

तीसरा, वे राजपूत राजा थे जहाँ अकबर ने युद्ध लड़ा और उनको पराजित करके अपने साम्राज्य में मिला लिया। 

इस तरह से अधिकांश राजपूत राज्यों को अकबर ने अपने साम्राज्य में मिला लिया और इसका मूल कारण यह था की अकबर को पता था की भारत जैसे विशाल साम्राज्य पर शासन करने के लिए यह आवश्यक है की सबसे बड़ी गंभीर चुनौती थी की राजपूतों को अपने अधीन किया जा सके क्यूंकि उन्हें बिना अधीन किये पूरे भारत पर साम्राज्य स्थापित करना काफी कठिन था। 

आमेर 

इसी क्रम में अकबर ने 1562 में आमेर, जयपुर में यात्रा की, वहां के राजा भारमल जिसे बिहारीमल के नाम से भी संबोधित किया जाता है, उसने स्वेक्षा से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और अपनी पुत्री हरका बाई जिसे जोधा बाई के नाम से भी संबोधित किया जाता है, उसका विवाह अकबर से करवा दिया। 

जोधा बाई का नाम कहानियों में काफी प्रचलित रहा है, परंतु उनका वास्तविक नाम हरका बाई था। 

राजा भारमल ने न केवल अपनी पुत्री का विवाह अकबर से करवाया, इसके साथ-साथ उन्होंने अपने पुत्र भगवान दास और अपने पोते मान सिंह को भी अकबर के साथ भेज दिया और वो दोनों अकबर की सेना में शामिल हो गए और एक अच्छे पद पर अकबर के यहाँ सेवा देते रहे और बाद में चलकर मान सिंह सबसे प्रमुख सेनापतियों में शामिल रहा और अकबर के दरबारियों में शामिल रहा। 

इस प्रकार से सबसे पहले कछवाहा राजपूतों जो जयपुर से संबंधित थे, उनसे अकबर के वैवाहिक संबंध स्थापित हुए।  

मेवाड़ 

उस समय चित्तौड़, मेवाड़ पर राजा उदय सिंह का शासन था, प्रारंभ में अकबर का संघर्ष राजा उदय सिंह के साथ नहीं हुआ, परंतु बाद में 1567 में अकबर ने उस क्षेत्र पर आक्रमण किया। 

राजा उदय सिंह अपना क्षेत्र छोड़कर भाग जाते हैं, इसका परिणाम यह होता है की अकबर वहां काफी लूटमार करता है और काफी हत्यायें करता है और चित्तौड़ पर अपना शासन स्थापित कर लेता है। 

परंतु 1572 में राजा उदय सिंह के बाद उनके पुत्र राणा प्रताप आतें है और वे पुनः अपने किले पर अधिकार कर लेते हैं, परिणामस्वरूप 1576 में अकबर और राणा प्रताप के बीच एक बहुत ही महत्वपूर्ण युद्ध होता है जिसे “हल्दीघाटी का युद्ध” कहा जाता है। 

हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की ओर से लड़ने वाले सेनापति थे मान सिंह जो राजा भारमल के पोते थे और आसफ खां जो पहले से ही अकबर का प्रमुख सेनापतियों में था और दूसरी तरफ राणा प्रताप की ओर से लड़ने वाले सेनापति थे हकीम खां। 

हकीम खां जो एक मुस्लिम सेनापति था वह एक हिन्दू शासक राणा प्रताप की ओर से लड़ रहा था और दूसरी तरफ एक हिन्दू सेनापति मान सिंह जो मुस्लिम शासक अकबर की तरफ से लड़ रहा था। 

दोनों गुटों के बीच भीषण युद्ध होता है, और अंत में अकबर को जीत प्राप्त हो जाती है और राणा प्रताप को अपना क्षेत्र छोड़ना पड़ता है, परंतु कुछ समय बाद राणा प्रताप अपना चित्तौड़ का साम्राज्य पुनः प्राप्त कर लेते हैं। 

1597 में राणा प्रताप की मृत्यु हो जाती है, परंतु तब तक वे अपने काफी साम्राज्य को जीत चुके थे और उनके बाद उनका पुत्र अमर सिंह शासक बनता है और अकबर के शासनकाल में चित्तौड़ पर कभी भी पूरी तरह से कब्ज़ा नहीं हो पाता है और मेवाड़ का संघर्ष अकबर के पुत्र जहांगीर तक जारी रहता है। 

इसके अलावा अन्य राजपूत राज्यों ने जैसे मेरता, रणथम्बोर, कलिंजर, मारवाड़, बीकानेर इन सभी ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी और देखते ही देखते जो प्रमुख राजपूत राज्य थे, वे अकबर के साम्राज्य में विलीन हो गए। 

गुजरात 

गुजरात पर 1572 में अकबर ने स्वयं आक्रमण किया था और इस आक्रमण में अकबर ने जीत प्राप्त करी और सूरत क्षेत्र को जीत लिया था, वहां पर मुज्जफर खां का शासन चल रहा था और जैसे ही अकबर वहां से वापस लौटा पुनः वहां पर विद्रोह हो गया।

विद्रोह को दबाने के लिए 1573 में वह पुनः तेज़ी से वापस पहुंचा और विद्रोह को दबा दिया था।

गुजरात के संबंध में एक घटना यह भी है कि इसी गुजरात अभियान के समय अकबर ने खंभात की खाड़ी में पहली बार समुद्र के दर्शन किये थे अर्थात अकबर ने पहली बार समुद्र देखा था और इसके अलावा वह पुर्तगालियों यानी यूरोपियों से भी मिला था। 

बिहार – बंगाल 

1574 – 1576 के क्रम में बिहार में दाऊद खां कर्रानी नाम का एक शासक था, जिसने अपने साम्राज्य को विस्तार करने का निर्णय लिया था या साम्राज्य का विस्तार कर रहा था। 

उसको पराजित करने के लिए अकबर और उसका सेनापति मुनीम खां गए और आक्रमण करके उन्होंने दाऊद खां को हराया और वहां से भगा दिया और बिहार और बंगाल के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। 

इसके अलावा अकबर ने उत्तर पश्चिम भारत के क्षेत्र जो वर्तमान में पाकिस्तान और अफगानिस्तान का क्षेत्र है उस क्षेत्र में काबुल, कश्मीर, सिंध, बलूचिस्तान, कान्धार और पूर्वी भारत में उड़ीसा पर भी अभियान चलाके इन जगहों पर विजय प्राप्त करी और अपना अधिकार कर लिया। 

इस प्रकार देखते ही देखते अकबर ने अपने क्रमिक वर्षों में कई महत्वपूर्ण लड़ाइयां लड़ी और उनमे जीत प्राप्त करके उसने अपना साम्राज्य का विस्तार करना शुरू कर दिया और अंतिम समय में देखा जाए तो उसने दक्षिण भारत को भी जीतने का प्रयास किया, आइयें देखते है दक्षिण भारत में अकबर के अभियान। 

दक्षिण भारत 

दक्षिण भारत में अकबर ने खानदेश, दौलताबाद, अहमदनगर और असीरगढ़ को जीता था। 

इस क्रम में उसने सबसे पहले खानदेश को जीता, परंतु जो अहमदनगर था वह सबसे महत्वपूर्ण था क्योंकि उसे दक्षिण भारत में एक प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है, यहाँ का नेतृत्व चाँद बीबी कर रही थी, जिसे हराकर अकबर ने अहमदनगर को जीत लिया था। 

असीरगढ़ में अकबर ने 1601 में आक्रमण किया था, असीरगढ़ बहुत ही धनाढ्य क्षेत्र था और कहा जाता है की उसके किले की चाबियाँ तक सोने की बनी होती थी और ये अकबर का अंतिम युद्ध साबित होता है, उसने अंतिम लड़ाई 1601 में असीरगढ़ के विरुद्ध करी और अकबर ने असीरगढ़ पर जीत दर्ज करी। 

इस प्रकार अकबर दक्षिण भारत के अधिकांश भाग पर जीत प्राप्त करने में सफल रहा। 

1601 तक अकबर अपनी लड़ाइयों में व्यस्त रहा, परंतु अपने अंतिम दिनों में अपने पुत्र के विद्रोह के कारण वह दुखी हो जाता है। 

akbar personal armour
The History of Akbar in Hindi – अकबर का व्यक्तिगत कवच

The History of Akbar in Hindi – अकबर से संबंधित प्रमुख वर्ष 

वर्षवर्ष से संबंधित बिंदु
1542अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 में हुआ था, अकबर का जन्म अमरकोट के राजा राणा वीरसाल के यहाँ हुआ था।
1556अकबर का राज्याभिषेक 14 फरवरी 1556 को हुआ था, और मात्र लगभग 14 वर्ष की आयु में उसे राजा बनना पड़ा था।
1560बैरम खां, जो अकबर का संरक्षक था और अकबर उसे प्यार से खान बाबा कहकर भी संबोधित करता था, 1560 में बैरम खां की एक अफगान द्वारा हत्या कर दी जाती है।
1562अकबर ने दास प्रथा के अंत की घोषणा करी थी और दास प्रथा जो चली आ रही थी उसे समाप्त करता है और इसके अलावा पर्दा शासन से भी अकबर बहुत हद तक स्वतंत्र हो गया था, परंतु पूर्णतः वह पर्दा शासन से 1564 में स्वतंत्र होता है।
15631562 में जब अकबर का विवाह आमेर, जयपुर के कछवाहा राजपूत शासक राजा भारमल की पुत्री हरका बाई से हो जाता है, जिन्हें जोधा बाई के नाम से भी जाना जाता है। 
 
जब राजपूतों से अकबर के वैवाहिक संबंध बन जाते है, तो उसकी प्रवर्ति थोड़ी उदारवादी हो जाती है और वह हिंदुओं के प्रति उदार नीति अपनाता है। 
 
अकबर हिंदुओं के ऊपर तीर्थयात्रा कर ( tax ) की समाप्ति कर देता है अर्थात वह हिंदुओं के ऊपर जो धार्मिक यात्रा के दौरान जो कर ( tax ) वसूला जाता था अकबर उसकी समाप्ति कर देता है।
1564अकबर ने जजिया कर ( tax ) की समाप्ति कर दी थी, जजिया कर ( tax ) वह कर होता था जो गैर मुस्लिम लोगों से मुस्लिम शासक द्वारा लिया जाता था। 
 
जैसे की हमने आपको बताया, क्यूंकि अकबर का विवाह एक हिन्दू परिवार से होता है तो हिंदू समाज के प्रति अकबर में सहानुभूती आती है और वो ऐसी प्रथाओं को धीरे-धीरे तोड़ना शुरू करता है जो हिंदू और मुस्लिम समाज में दूरियां पैदा करती थीं। 
 
कहा जाता है मध्यकालीन भारतीय इतिहास में विशेष रूप से अकबर वह शासक था, जिसने हिंदू और मुस्लिम एकता को बढ़ाने का काम किया था।
1571अकबर ने आगरा में एक फतेहपुर सीकरी नामक शहर की स्थापना की थी और वहां पर उसने कई महलों का भी निर्माण करवाया था।
1573एक बुलंद दरवाजा का भी निर्माण उसने फतेहपुर सीकरी में करवाया था, इसके संबंध में यह कहा जाता है की जब वह गुजरात अभियान करके वापस आया तब उसने बुलंद दरवाजे का निर्माण फतेहपुर सीकरी में अपनी विजय को दिखाने के लिए करवाया था।
1575अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी में एक इबादत खाने का निर्माण करवाया, इबादत खाना एक ऐसा भवन होता था जिसमें इस्लाम धर्म के विभिन्न धर्म गुरु आते थे और किसी विषय पर विचार विमर्श करते थे और वाद-विवाद करते थे और अंतिम निष्कर्ष निकाल कर राजा को बताते थे।

अकबर वाद-विवाद में बैठा करते थे, धार्मिक चीज़ों के ज्ञान को लेने का प्रयास करते थे, इस प्रकार वे सीखने का प्रयास करते थे।
1578इस इबादत खाने में केवल मुस्लिम धर्म गुरुओं को ही प्रवेश करने की आज्ञा थी और इस तरह से वह केवल इस्लाम धर्म के बारे में जान पा रहा था।

इसलिए अकबर ने इबादत खाने को सभी धर्मों के लिए खोल दिया।
1579 इबादत खाने में सभी धर्मों के धर्म गुरु आने लगे जैसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, जैन आदि ये सब धर्म गुरु किसी विषय पर वाद-विवाद करते और अपने-अपने धर्म को श्रेठ दर्शाने लगे।

ऐसे में अकबर समझ नहीं पाता था की वो किस धर्म के मूल बिंदु को माने।

इसलिए उसने एक नया मार्ग निकाला और महजर की घोषणा की, इसमें यह था की राजा को धार्मिक अधिकार मिल गए थे।

जहाँ तक पहले धर्म गुरुओं को ये अधिकार था की वे किसी बिंदु की धार्मिक व्याख्या कर सकें, परंतु महजर की घोषणा के बाद राजा को यह अधिकार हो जाता है की वो किसी बिंदु के धार्मिक पक्ष को बता सके।

उदाहरण के लिए जैसे किसी विषय पर सभी धर्मों के धर्म गुरु वाद-विवाद कर रहे हैं, परंतु कोई भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा है, ऐसे में महजर के अनुसार राजा को ये अधिकार है की वो ये फ़ैसला लेगा की कौन सा तर्क सबसे अच्छा है।

इस प्रकार अकबर ने धार्मिक अधिकार अपने दायरे में ले लिए थे, जो की इससे पहले किसी भी राजा द्वारा नहीं किया गया था, पहले जितने भी राजा थे वे धार्मिक गुरुओं को ही महत्व देते थे धार्मिक विषयों की व्याख्या के लिए, परंतु अकबर अब स्वयं को ही धार्मिक विषयों का श्रेष्ठ बनाता है।
1580अकबर ने दहसाला बन्दोबस्त लागू किया।
1582अकबर ने एक नए धर्म की स्थापना की जिसे “दीन-ऐ-इलाही” के नाम से जाना जाता है।

दीन-ऐ-इलाही एक ऐसा धर्म था, जिसमें अकबर ने सारे धर्मों की अच्छाईयों को मिला कर एक धर्म बनाने का प्रयास किया था, मतलब सभी धर्मों के लिए उसके दरवाज़े खुले थे।

परंतु इस धर्म के जो नियम थे वो थोड़े अलग थे और कठिन थे, जैसे राजा को ही अपना गुरु मानना है, अपनी पगड़ी उतार कर राजा के चरणो में रख देना है और फिर राजा आपकी पगड़ी उठा कर आपके सर पर दुबारा रख देंगे।

परिणाम यह निकलता है की न तो इस्लाम धर्म वाले इस को स्वीकार कर पा रहे थे और न ही कोई अन्य धर्म वाले इस को स्वीकार कर पा रहे थे।

इसका कारण यह निकल कर यह आया की अकबरनामा के अनुसार मात्र 18 लोगों ने ही इस धर्म को स्वीकार किया था और उसमें से एक मात्र हिंदू था जिसका नाम बीरबल था, जो अकबर के नौ रत्न में से एक थे।

इसके अलावा दीन-ऐ-इलाही धर्म को स्वीकार करने के लिए दिवस भी निर्धारित किया गया था की रविवार के दिन ही इस धर्म में प्रवेश लिया जा सकता था।
1583अकबर ने एक इस्लामिक पंचांग ( calender ) शुरू किया था जिसका नाम इलाही संवत्
1585अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी से अपनी राजधानी लाहौर परिवर्तित कर दी थी और उसके बाद उसका समय दक्षिण भारत में अभियान करते हुए बीता।
1601दक्षिण भारत के असीरगढ में अकबर ने अपने जीवन की अंतिम लड़ाई लड़ी, जहाँ उसने विजय प्राप्त की और बहुत सारा धन भी प्राप्त किया।
1605अकबर की मृत्यु 1605 के अक्टूबर माह में हो जाती है और आगरा के पास सिकंदरा में उसको दफ़ना दिया जाता है।
The History of Akbar in Hindi – History about Akbar in Hindi

अकबर द्वारा किये गए सुधार 

अकबर ने हर क्षेत्र में सुधार करने का प्रयास किया था, आइये उन सुधारों पर दृष्टि डालें:

सैन्य व्यवस्था में सुधार 

सैन्य व्यवस्था में अकबर ने एक नई व्यवस्था लागू की थी, जिसका नाम मनसबदारी व्यवस्था था। 

मनसबदारी व्यवस्था

मनसबदारी व्यवस्था, मध्य एशिया की एक व्यवस्था थी जिसे चंगेज़ खां ने अपनी सेना में लागू किया था, उसी तरह की व्यवस्था अकबर ने भी अपनी सेना में लागू करने का प्रयास किया था। 

इसमें वास्तव में किसी एक व्यक्ति के लिए दो-तीन कार्यों को एक साथ समायोजित किया था और ये एक सैन्य पद था, इसमें यह होता था की मनसब के तहत किसी भी व्यक्ति को यह मनसब प्रदान किया जाता था। 

मनसब के अंतर्गत दो बातें आ जाती थी पहली थी जात और दूसरी सवार, जात से यह तात्पर्य होता था की उस व्यक्ति का पद क्या है और उसका वेतन कितना होगा अर्थात उस व्यक्ति के पद की गरिमा को दिखाया जाता था और जितना बड़ा पद होता था उसे उतने ही घोड़े रखने या सेना रखने की अनुमति मिलती थी और घोड़े के साथ-साथ अन्य जानवर भी उसकी सेना में रहते थे। 

The History of Akbar in Hindi – मनसबदारी व्‍यवस्‍था

पद के साथ सेना जुड़ी हुई रहती थी और मनसब की श्रेणी बनीं हुई थी जैसे छोटा मनसब उसके पास छोटी सेना होगी और बड़ा मनसब उसके पास बड़ी सेना होगी और ये मनसब राजा को सहयोग करते थे जब भी किसी युद्ध का समय होता था या जब भी राजा को जरुरत होती थी। 

ये जो सैन्य का विभाजन था एक श्रेणीबद्ध रूप में, उसी सैन्य विभाजन को ही मनसबदारी व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। 

घोड़े दागने की प्रथा एवं हुलिया लिखने की प्रथा 

अकबर ने कुछ ऐसे सुधारों को भी लागू किया था जो अलाउद्दीन खिलजी ने शुरू किया था जैसे घोड़े दागने की प्रथा तथा सैनिको के हुलिया लिखने की प्रथा, इन प्रथाओँ के बारे में हमने आपको हमारे खिलजी वंश वाले आर्टिकल में भी बताया था। 

इस प्रथा में घोड़ो को दागा जाता था ताकि उनकी पहचान करी जा सके और बार-बार एक ही घोड़े को पेश न किया जा सके इसलिए ऐसी प्रथायें चलाई गई थी। 

इसके अलावा अकबर ने एक और प्रथा चलाई थी जो बलबन ने चलाई थी जिसका नाम था सिजदा और पैबोस, सिजदा में दरबार में आने पर राजा के सामने सर को झुकाना होता था और पैबोस में झुककर राजा के कदम चूमने होते थे। 

इस प्रकार अकबर ने बलबन की प्रथा को भी शुरू किया और अलाउद्दीन खिलजी की भी जो प्रारंभिक प्रथा थी जो सैन्य व्यवस्था से जुड़ी हुई थी उसको भी अकबर ने शुरू किया था अर्थात उसने अपने से पहले पुराने राजाओं से भी बहुत कुछ सीखा और अपने शासनकाल में जोड़ने का प्रयास किया और अच्छा राजा या शासक वही होता है जो अपने बीते हुए इतिहास से बहुत कुछ सीखता है और वास्तव में इतिहास पढ़ने का मतलब भी यही होता है हम अपने बीती हुई घटनाओं को पढ़कर न केवल उसे जाने बल्कि उससे कुछ अच्छी चीजे सीखें। 

समाज में सुधार 

अकबर के समाज को लेकर किये गए सुधार कार्य:

दास प्रथा पर अंत 

अकबर ने 1562 में दास प्रथा पर प्रतिबंध लगाया था, जैसे की फिरोज़ शाह तुगलक के समय दासों का चलन बहुत ज्यादा था लेकिन अकबर ने यह प्रथा समाप्त कर दी थी। 

बहुविवाह पर रोक 

उसने बहुविवाह पर भी रोक लगाई थी, जिसमे एक व्यक्ति एक से अधिक विवाह नहीं कर सकता था परंतु खुद अकबर ने ही एक से अधिक विवाह कर रखे थे इसलिए लोगों ने भी उसकी बात को नहीं माना और बहुविवाह पर रोक लगाने के साथ-साथ उसने यह भी घोषणा की थी की एक व्यक्ति दूसरी शादी तभी करे जब पहली पत्नी बच्चे को जन्म देने में अशक्षम हो। 

विधवा विवाह को प्रोत्साहन

उसने विधवा विवाह को प्रोत्साहन दिया और उसने खुद बैरम खां की विधवा से विवाह किया था हालंकि वह उसकी चचेरी बहन लगती थी, परंतु उसने उससे विवाह किया था। 

इस प्रकार उसने विधवा विवाह को प्रोत्साहन देने का भी प्रयास किया। 

बाल विवाह पर रोक 

उसने बाल विवाह पर रोक लगाने का निर्णय लिया और उसके लिए सुधारात्मक उपाय भी किये और उसने एक घोषणा करवाई कि उसके राज्य में 16 वर्ष से कम आयु के लड़के और 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह नहीं कराया जा सकता है, तो इस प्रकार अकबर ने एक विवाह के लिए एक न्यूनतम सीमा तय करी थी। 

सती प्रथा पर रोक 

उसने सती प्रथा पर भी प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी, जिसमे किसी महिला के पति की मृत्यु के बाद, महिला अपने पति के अंतिम संस्कार में उसकी चिता पर स्वयं भी जल कर आत्मत्याग कर देती थी। 

इसके अलावा राजपूतों में जो छोटी बच्चियों की हत्या, जो जन्म के साथ कर दी जाती थीं जिसे बाल हत्या कहा जाता है, उस पर भी उसने रोक लगाने की घोषणा की थी।

अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन 

अकबर ने अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन देना शुरू किया था यानी की आज भी हम जो सामाजिक कुप्रथाओं से लड़ रहे हैं, उन सारी सामाजिक कुप्रथाओं को रोकने का प्रयास अकबर ने किया था हालांकि वह पूर्णतः सफल नहीं हो पाया था क्यूंकि अगर वह सफल हो गया होता तो आज के समय में ये सारी सामाजिक कुप्रथाओं नहीं होती परंतु उसने अपने स्तर पर ये सारे प्रयास किए। 

ये बातें उसकी प्रशंसा में कहीं जाती है की अकबर एक महान शासक था, इसका एक कारण यह भी है की उसने सामाजिक सुधारों से जुड़े कई ऐसे कार्य किये थे। 

इसके अलावा समाज में जो वैश्यालय होते थे, जिसकी वजह से उसे यह लगता था की इन वैश्यालो से समाज में बुरा असर पड़ता है, तो उसने वैश्यालो को समाज से दूर स्थापित करने का निर्णय दिया और उस क्षेत्र का नाम उसने शैतानपुरी रखवाया ताकि वहां अच्छे या समझदार लोग न जाएं। 

इसलिए उसने शैतानपुरी नाम से वैश्यालो को समाज से दूर स्थापित करने का निर्देश दिया।   

भूमि सुधार 

भूमि से संबंधित सुधार भी अकबर के समय कई किये गए, जैसे:

जब्ती प्रणाली 

जब्ती प्रणाली, भू-राजस्व वसूली की प्रणाली थी अर्थात लगान को लेने की प्रक्रिया की प्रणाली थी। 

दहसाला बन्दोबस्त 

प्रारंभ में अकबर ने जो प्रणाली चलाई थी वह जब्ती प्रणाली थी, परंतु बाद में 1580 में उसने एक टोडरमल व्यवस्था अपनाई, वो टोडरमल जो अकबर के नौ रतनो में से एक थे, इस व्यवस्था को दहसाला बन्दोबस्त कहा जाता है, इसे टोड रमली व्यवस्था से भी संबोधित किया जाता है।  

दहसाला बन्दोबस्त में यह होता था की जैसे एक किसान के खेत से पिछले दस वर्षों में उपजे अनाज की गणना करी जाती थी और पिछले दस वर्षों का एक औसत निकाला जाता था और उसी औसत का भाग ऋण के रूप में लिया जाता था या लगान के रूप में वसूल लिया जाता था। 

इस प्रक्रिया से न तो किसान पर ज्यादा दबाव पड़ता था और न ही राजा को बहुत अतिरिक्त आय की जरुरत पड़ती थी, इस प्रकार दोनों पक्षों के लिए यह एक बेहतर व्यवस्था थी, इसमें किसानों की भी समस्या सुनी जाती थी ताकि एक उचित मात्रा में लगान लिया जा सके और यही चीज़ अंग्रेजों ने नहीं की थी, जिसके कारण भारतीय व्यवस्था बर्बाद हो गयी थी। 

इस प्रकार दहसाला बन्दोबस्त दस वर्षों की व्यवस्था को देखते हुए लगान निर्धारण की व्यवस्था थी, इसलिए इसका नाम दहसाला बन्दोबस्त पड़ गया था। 

अकबर के प्रमुख निर्माण कार्य 

अकबर एक निर्माता के रूप में भी जाना जाता है क्यूंकि उसने स्थापत्य कला के क्षेत्र में निर्माण कार्य को बहुत प्रोत्साहित किया।

1. आगरा का लाल किला – अकबर ने आगरा के लाल किला बनवाया था, ज्यादातर हम सबने दिल्ली के लालकिले के बारे में पढ़ा है, परंतु वह अकबर के पोते शाहजहां ने बनवाया था।    

2. इलाहाबाद का किला 

3. लाहौर का किला 

ये तीन प्रमुख किले है जिन्हे अकबर के द्वारा बनवाया गया था। 

4. फतेहपुर सीकरी – 1571 में अकबर ने आगरा में फतेहपुर सीकरी नामक शहर का निर्माण करवाया था और उसे राजधानी भी बनाया था। 

फतेहपुर सीकरी में अकबर ने कुछ प्रमुख निर्माण कार्य करवाए जैसे:

5. दीवाने ख़ास 

6. पंचमहल 

7. जोधाबाई का महल – अकबर ने अपनी पत्नी जोधाबाई के लिए एक महल का निर्माण करवाया था। 

8. बुलंद दरवाज़ा – गुजरात विजय से लौटने के क्रम में बुलंद दरवाज़ा का निर्माण करवाया था और बुलंद दरवाज़ा फतेहपुर सीकरी में प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है। 

9. हुमायूँ का मकबरा – दिल्ली में अकबर ने अपने पिता के मकबरे का निर्माण करवाया था। 

अकबर का चित्रकला से संबंध 

चित्रकला की रुचि अकबर के समय से ही शुरुआत लेती है, जो अकबर के पुत्र जहांगीर के काल में जाकर काफी विस्तृत हो जाती है। 

अब्दुर समद, दसवंत, बसावन ये तीन चित्रकार अकबर के दरबार में रहा करते थे और प्रमुखतः चित्रकारी के लिए काफी प्रचलित थे और ये तीनों अकबर के दरबार के प्रमुख चित्रकार थे। 

अकबर का संगीत से संबंध

अकबर संगीत में खुद रुचि लेता था और नगाड़ा जो की वाद्य यंत्र था उसे वह खुद भी बजाया करता था और नगाड़ा बजाने में वह अपने आप को निपूर्ण मानता था। 

इसके अलावा तानसेन जो उसके दरबारी संगीतज्ञ थे, जो की अकबर के नौ रतनो में भी शामिल थे।

इसके साथ बैजू बावरा, बाज़ बहादुर, बाबा रामदास आदि भी अकबर के समकालीन संगीतज्ञ थे, जो अकबर के समय से ही जुड़े हुए थे।  

अकबर के नौ रत्न 

नौ रत्नों से तात्पर्य यह है की नौ विशेष व्यक्ति जो अलग-अलग कला में निपूर्ण थे, वे अकबर के दरबार में रहते थे, उनको ही नौ रत्न कहकर संबोधित किया जाता है, आइये उन्हें देखें:

बीरबल 

बीरबल नौ रत्नों में बहुत महत्वपूर्ण थे, और एक बहुत अच्छे बुद्धिजीवी व्यक्ति थे, जो अकबर के दरबार में शामिल थे। 

उनका वास्तविक नाम महेश दास था, अकबर ने खुश होकर उन्हें “कविराज” की उपाधि दी थी, परन्तु वे अकबर के दरबारी कवि नहीं थे। 

बीरबल एक मात्र हिन्दू थे जिसने अकबर द्वारा बनाये गए धर्म दीन-ऐ-इलाही को अपनाया था, दीन-ऐ-इलाही को कुल 18 लोगों ने अपनाया था, जिसमे एक बीरबल थे जो एक मात्र हिन्दू थे।  

बीरबल काफी चतुर थे और अकबर को कई बार अच्छी सलाह भी दिया करते थे, परंतु युसुफजाई कबीले से युद्ध में लड़ते समय बीरबल की मृत्यु हो गई। 

क्यूंकि बीरबल अकबर के बहुत करीब थे, इसलिए बीरबल की मृत्यु के बाद अकबर बहुत दिनों तक काफी शोक में रहता है। 

तानसेन 

तानसेन एक संगीतज्ञ के रूप में काफी चर्चित थे और ये दरबारी संगीतज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। 

उनका वास्तविक नाम रामतनु पाण्डेय था, उनके गुरु का नाम हरिदास था।

कहा जाता है की, जब तानसेन ने अपने गुरु हरिदास के बारे में अकबर को बताया वे मेरे गुरु है और वे मुझसे भी ज्यादा अच्छा गाते है, जिसके कारण अकबर के मन में जिज्ञासा हुई की गुरु हरिदास को दरबार में बुलाया जाए और बार-बार गुरु हरिदास को निमंत्रण भेजा गया, परंतु उन्होंने दरबार में आने से मना कर दिया, परिणामस्वरूप अकबर को स्वयं ही उनके पास पहुंचना पड़ा। 

गुरु हरिदास ने अकबर से कहा की मैं सिर्फ अपने ईश्वर के सामने भजन गाता हूँ।

अकबर के दरबार में आने से पहले तानसेन ग्वालियर के रीवा राज्य के राजा रामचंद्र के दरबार में रहते थे और वहीं अपना संगीत गाया करते थे, बाद में वहां पर अकबर की विजय के बाद तानसेन को अकबर को सौंप दिया गया था और फिर तानसेन आजीवन ही अकबर के दरबार में रहे थे और कहा जाता है की बाद में वो अकबर के व्यवहार और इस्लाम धर्म से काफी प्रभावित हुए और इस्लाम धर्म को बाद में स्वीकार भी कर लिया था। 

उसके संगीत को सुनकर अकबर ने उनको “कंठ आवरण भवानी विलास” की उपाधि दी थी। 

इसके अलावा तानसेन ने अपनी तरफ से कई नई कृतियाँ, राग भी बनाये जैसे मियां की टोड़ी, मियां की मल्हार, मियां की सारंग, दरबारी कान्हड़ा आदि ये कुछ ऐसे राग थे जिनकी रचना पहली बार तानसेन के द्वारा करी गई थी। 

अब्दुरहीम खानखाना  

अब्दुरहीम खानखाना, बैरम खां का पुत्र था, जो बाद में जाकर अकबर के दरबार में रहता है और अकबर उसको शिक्षा-दीक्षा दिलवाता है। 

अब्दुरहीम शिक्षा के क्षेत्र में काफी अनुभवी व्यक्ति था और वह कवि एवं साहित्यकार के रूप में दरबार में रहा करता था। 

जब अकबर ने अनुवाद विभाग की स्थापना करी थी, तो उस अनुवाद विभाग में कई पुस्तकों का दूसरी भाषाओं में अनुवाद अब्दुरहीम खानखाना ने किया था। 

गुजरात विजय के क्रम में उसने गुजरात को जीता था, इसलिए अकबर ने उसे “खानखाना” की उपाधि दी थी, इस प्रकार खानखाना की उपाधि बैरम खां को भी मिली थी और उसके पुत्र अब्दुरहीम को भी मिली थी। 

अबुल फज़ल 

अबुल फज़ल, अकबरनामा के रचयिता के रूप में काफी जाने जाते हैं, और अकबर के सबसे प्रिय व्यक्तियों में से एक थे। 

वे एक इतिहासकार, दर्शन, साहित्यकार के विद्वान के रूप में अकबर के दरबार में रहा करते थे। 

उन्होंने अकबरनामा की रचना की थी जिसका तीसरा अध्याय आईने अकबरी के नाम से जाना जाता है। 

जब अकबर से उसका पुत्र सलीम रुष्ट हो जाता है तो अकबर, अबुल फज़ल से सलाह लेते है, परंतु सलीम को ऐसा लगता था की अबुल फज़ल उसके पिता को उसके खिलाफ भड़काते है। 

इसका परिणाम यह होता है की जब अबुल फज़ल दक्षिण से लौट कर आगरा जा रहे होते है, तो रास्ते में ही सलीम के कहने पर वीर सिंह बुंदेला द्वारा अबुल फज़ल की 1602 में हत्या कर दी जाती है और इस हत्या से भी अकबर काफी दुखी हो जाता है। 

फैज़ी  

फैज़ी, अबुल फज़ल का ही बड़ा भाई था, और इन दोनों के पिता शेख मुबारक काफी बड़े विद्वान थे।

इन दोनों के पिता शेख मुबारक ने ही 1579 में जो अकबर ने महजर की घोषणा की थी, उसका प्रारूप ( format ) तैयार किया था। 

फैज़ी भी एक विद्वान व्यक्ति था, और इसे अकबर ने अपने राजकवि के रूप में दर्जा दिया हुआ था, इसके अलावा फैज़ी ने कई ग्रंथो का भी दूसरी भाषाओं में अनुवाद किया था। 

मान सिंह 

मान सिंह भी प्रमुख नौ रत्नों में से एक थे, जो की सैन्य नियंत्रण की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माने जाते थे। 

ये कछवाहा राजा भारमल के पौत्र यानी पोते थे एवं भगवान दास के पुत्र थे, क्यूंकि अकबर ने राजा भारमल की पुत्री हरका बाई से विवाह किया था जो जोधा बाई के नाम से भी जानी जाती है, तो राजा भारमल ने अपने पुत्र भगवान दास और अपने पोते मान सिंह को अकबर की सेवा में भेज दिया था। 

मान सिंह के ही नेतृत्व में अकबर ने कई लड़ाइयां जीती थी और इसके अलावा हल्दीघाटी युद्ध में जो महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुआ था उसमे भी अकबर की सेना का नेतृत्व मान सिंह ने ही किया था। 

इस प्रकार मान सिंह अकबर के साहसी सेनानायक के रूप में उसके नौ रत्नों में शामिल थे। 

टोडरमल 

टोडरमल को भूमि सुधार की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, अकबर के दरबार में रहने से पहले टोडरमल, शेरशाह सूरी के दरबार में थे और शेरशाह सूरी के शासनकाल के समय वे वहां भी भूमि सुधार का कार्य देखते थे। 

बाद में जब वे अकबर के दरबार में आये, तो अकबर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और फिर उन्हें भूमि सुधार की व्यवस्था के अंतर्गत शामिल किया।

टोडरमल के प्रयासों के वजह से दहसाला बन्दोबस्त व्यवस्था या टोडरमल व्यवस्था लागू हो पाई थी। 

मुल्ला दो प्याज़ा 

इनके संबंध में यह कहा जाता है की इन्हे खाने में दो प्याज पसंद थे, जिसकी वजह से इनका नाम मुल्ला दो प्याज़ा पड़ गया था। 

ये बुद्धिमान थे और वाक्पटुता थे अर्थात हाज़िरजवाबी व्यक्ति थे, जिसके कारण मुल्ला दो प्याज़ा को अकबर पसंद करते थे। 

हकीम हुमाम 

ये भी अकबर के नौ रत्नों में से एक थे, और अकबर ने इन्हें रसोईघर का नेतृत्व दिया था, अकबर इन पर बहुत विश्वास करते थे।   

इनके माध्यम से रसोईघर में पका हुए खाने को अकबर ग्रहण करता था।

इस प्रकार ये प्रमुख नौ व्यक्ति थे, जो नौ रत्नों के रूप में अकबर के दरबार में रहते थे और सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं थी। 

अकबर की मृत्यु 

अकबर बहुत ही लम्बे समय तक जीवित रह गया था, और जो उसका पुत्र सलीम था जो अकबर का बहुत दुलारा था, वो बड़ा हो गया था और वह राजा बनना चाह रहा था। 

सलीम अपने पिता की वजह से अपने राजा बनने की चाह को पूरा नहीं कर पा रहा था, इसका परिणाम यह निकलता है की वो अपने पिता के विरुद्ध ही अभियान छेड़ना शुरू कर देता है, हालांकि उसने किसी प्रकार का युद्ध तो नहीं किया, परंतु कई जगह वह राजा के विरुद्ध कार्य करता था जैसे, राजा की बातों को नहीं मानना, राजा के पक्ष में न होकर विपक्ष में बातें करना। 

इस प्रकार अकबर को बहुत दुख होता है, जिस पुत्र को उसने सलीम चिस्ती की दरगाह में जाके दुआ मांग कर प्राप्त किया था, वह सलीम जो जहांगीर के नाम से भी जाना जाता है, वह उसके विरुद्ध हो जाता है, इसके बाद से अकबर दुखी रहने लगता है। 

इस दौरान एक महत्वपूर्ण घटना घटती है, 1602 में सलीम के कहने पर वीर सिंह बुंदेला द्वारा अकबर के बहुत ही प्रिय अबुल फज़ल की हत्या कर दी जाती है, जिसके कारण अकबर बहुत ही परेशान रहने लगता है और वह इस हत्या से काफी दुखी था, और अपने पुत्र के व्यवहार से भी काफी दुखी था।

अंत में अकबर की मृत्यु 1605 के अक्टूबर माह में हो जाती है और उसे आगरा के पास सिकंदरा में दफना दिया जाता है।

अकबर से जुड़े बिंदु 

1. अकबर एक अनपढ़ शासक के रूप में जाना जाता है, परंतु सबसे योग्य शासकों में भी शामिल किया जाता है। 

2. अकबर को संगीत के क्षेत्र में नगाड़ा बजाना बहुत पसंद था। 

3. विनसेट स्मिथ नामक एक इतिहासकार है, वो कहते है की दीन-ऐ-इलाही धर्म शुरू करना अकबर का सबसे मूर्खतापूर्ण कार्य था और ये कार्य अकबर का मूर्खता का स्मारक है।

क्यूँकि बाक़ी सारे कार्य तो उसने सही किए थे पर ये एक कार्य जो उसने शुरू तो किया था किंतु जितना उसने सोचा था उतना यह कार्य सफल नहीं हो पाया था।

The History of Akbar in Hindi

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा दी गई The History of Akbar in Hindi के बारे में जानकारी आपके लिए बहुत उपयोगी होगी और आप इससे बहुत लाभ उठाएंगे। हम आपके बेहतर भविष्य की कामना करते हैं और आपका हर सपना सच हो।

धन्यवाद।


यह भी पढ़े: History of Humayun in Hindi

यह भी पढ़े : History of Babur in Hindi

यह भी पढ़े : history of sher shah suri in hindi

यह भी पढ़े : शेर शाह सूरी का प्रशासन

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow us on Social Media